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Sunday, 3 October 2010

लोकतंत्र में ईश्वर - राकेश रोहित

कविता

लोकतंत्र में ईश्वर

  - राकेश रोहित


एक आदमी
चूहे की तरह दौड़ता था
अन्न का एक दाना मुँह में भर लेने को विकल.
एक आदमी
केकड़े की तरह खींच रहा था
अपने जैसे दूसरे की टाँग.
एक आदमी
मेंढक की तरह उछल रहा था
कुएँ को पूरी दुनिया समझते हुए.
एक आदमी
शुतुरमुर्ग की तरह सर झुकाए
आँधी को गुज़रने दे रहा था.
एक आदमी
लोमड़ी की तरह न्योत रहा था
सारस को थाली में खाने के लिए.
एक आदमी
बंदर की तरह न्याय कर रहा था
बिल्लियों के बीच रोटी बाँटते हुए.
एक आदमी
शेर की तरह डर रहा था
कुएँ में देखकर अपनी परछाईं.
एक आदमी
टिटहरी की तरह टाँगें उठाए
आकाश को गिरने से रोक रहा था.
एक आदमी
चिड़िया की तरह उड़ रहा था
समझते हुए कि आकाश उसके पंजों के नीचे है.
एक आदमी...!

एक आदमी
जो देख रहा था दूर से यह सब,
मुस्कराता था इन मूर्खताओं को देखकर
वह ईश्वर नहीं था
हमारे ही बीच का आदमी था
जिसे जनतंत्र ने भगवान बना दिया था.