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Sunday, 24 January 2016

पानी – राकेश रोहित

लघुकथा
पानी 
– राकेश रोहित

"पानी पी लूँ?" उसने विनम्रता से पूछा।
"पानी के लिए पूछते हैं! पीने के लिए ही तो रखा है। जरूर पीजिए!" कहते हुए वे थोड़ा गर्व से भर गये। "यही तो हमारी सभ्यता- संस्कृति है। पानी हम सबको पिलाते हैं। अरे हमारे गांव में तो...! " उन्होंने एक लंबी कहानी शुरू की।
पानी पीकर पीने वाले ने राहत की सांस ली और कृतज्ञता से कहा- "धन्यवाद साहब, बहुत जोर की प्यास लगी थी।"
उनकी कहानी जारी थी। पीने वाला सलाम कर चला गया।
उसके जाते ही उन्होंने मुँह में चुभल रहा मसाला कोने में थूका और मेज के ड्राअर से मिनरल वाटर की बोतल निकाल कर पानी पीने लगे।
"गट- गट- गट!"
उनके चेहरे पर तृप्ति साफ दिख रही थी।

पानी / राकेश रोहित

Sunday, 24 October 2010

संप्रेषण - राकेश रोहित

लघुकथा
                              
                                                               संप्रेषण
                                                               
                                                                    - राकेश रोहित 


        परदे पर कोई  भावप्रवण दृश्य चल रहा था. वह भावातिरेक में बुदबुदाया, " सिनेमा संप्रेषण का सशक्त माध्यम साबित हो सकता है." अचानक इंटरवल हो गया. परदे पर एक रील चमकने लगी- " धूम्रपान निषेध." और वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके सिगरेट के धुंए से मुझे खांसी हो रही थी. ooo

आँसू - राकेश रोहित

लघुकथा 

                              आँसू 
                                                                  
                                                                     - राकेश रोहित

         वह शायर नहीं था, पर उसकी झील- सी आँखों में डूब गया. ... और उसकी झील- सी आँखें समंदर बन गईं, जिनसे हर वक्त नमक रिसता रहा.  ooo

Saturday, 16 October 2010

सात आदमी को छूओ - राकेश रोहित

लघुकथा 
                             सात आदमी को छूओ 
                                                                         - राकेश रोहित 

        यह प्रार्थना का समय था. स्कूलों की घंटियां बज चुकी थीं और बच्चे कतार में खड़े थे. मैंने उन्हें देखा. और मुझे वितृष्णा हुई उस भाव के प्रति जिसमें दुनिया को बचा लेने की गंध थी. तभी मेरे सामने एक छोटा बच्चा आ गया; दबे कदम, धीरे-धीरे. और प्रार्थना होती देख वह असहज हो गया. उसका चेहरा परेशान हो रहा था. वह थोड़ा हटकर एक कोने में खड़ा हो गया, जहां प्रार्थना से अलग एक बच्ची खड़ी थी. बच्ची ने अपने बस्ते को संभाला और उसे देख मुस्कराई. फिर उसने बच्चे से कुछ कहा.  बच्चे ने चौंक कर पीछे देखा, पर वहां कोई न था. बच्ची खुश हो गई. उसने अपनी नन्हीं हथेलियों से हल्की ताली बजाई और बोली - " छका दिए, सात आदमी को छूओ... सात आदमी को छूओ!"  बच्चा भी अचानक प्रसन्न हो आया था. उसे प्रायश्चित करना था - झूठ को सच समझने का, सात आदमी को छूकर. उसने बच्ची से शुरुआत की और उसे छूकर चिल्लाया- एक! फिर वह दौड़ गया. सामने दो बच्चे कांच की गोली से खेल रहे थे ... दो-तीन, उसने गिना. मैं उनके पास आ रहा था और मुझे लग रहा था जैसे मैं उसे खेल में शामिल हो गया हूँ. एक खुशी मेरे अंदर फूट रही थी. बच्चा सड़क पर इधर-उधर दौड़ रहा था. उसने कागज चुन रहे दो बच्चों को गिना. चार-पांच. अब सड़क पर कोई न था और बच्चा इधर-उधर देखता परेशान हो रहा था. मुझे लगा अब वह मुझे छूएगा और तब केवल एक की कमी रह जाएगी. मैंने अपनी चाल कम कर दी ताकि वह मुझे छू सके. तभी एक लड़का सर पर टोकरी रखे साग बेचता उधर से निकला. उसने उसे छूआ - छ:, और फिर मेरे पीछे दौड़ कर वह मुझे छू कर चिल्लाया - सात! दूर खड़ी बच्ची खिलखिलाकर हँस पडी. एक उत्फुल्लता उसके चेहरे पर थी. सात आदमी को छूओ, उसने तालियां बजाकर कहा. अब यह खेल मुझे जारी रखना था. पर मैं धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था. बच्चे धीरे से कक्षा में लौट रहे थे. और खेल का सिरा मुझ तक खिंचता-खिंचता टूट  गया था. एक खिन्नता मेरे आगे खन्न से बिथर गई थी. सामने धूप तेज हो रही थी और एक आवाज अब भी मेरे पीछे थी- सात आदमी को छूओ. ooo 

Thursday, 14 October 2010

हस्तांतरण - राकेश रोहित

लघुकथा 
                                                  हस्तांतरण 
                                                                 - राकेश रोहित 


        वर्षा के जमे पानी में मेरी नाव तैर रही  थी. मैं  उसे  देखने  में  मग्न था. तभी  पास  का  एक  बच्चा  पानी  में उछलता-कूदता आगे बढ़ा. उसने हाथ बढ़ाकर नाव को उठा लिया और किनारे लाकर फिर से तैरा  दिया. नाव तैरती रही. अब वह ताली बजकर हँस रहा था और मैं गुमसुम खड़ा था.              ooo

समझौता – राकेश रोहित

लघुकथा                                                                
                    समझौता       
                                                                  – राकेश रोहित                                

        वे लड़ते हुए अचानक ठहर गए. "यहां कोई देख लेगा," उनमें से एक ने कहा. "चलो हम मैदान में चलें."            ooo                                                                                                                                                                                                                                                                                                           

Tuesday, 12 October 2010

स्वर्ग से दूर - राकेश रोहित

लघुकथा

                                  स्वर्ग से दूर
                                                                     - राकेश रोहित

      " शादी के बारे में तुम्हारा विचार क्या है?" लड़के ने पूछा तो लड़की ने कहा, "कुछ खास नहीं. मैं इसे जरूरी नहीं समझती प्रेम के लिए."

      "अफ़सोस तुम ऐसा सोचती हो, फिर भी मैं तुमसे प्यार करता हूँ."

      "... और जब स्वप्न-स्वर्ग में उन्होंने वर्जित फल चखे तो लड़की शादी करना चाहती थी और लड़के का विचार बदल गया था!                                                                                                                         ooo

स्वप्न - राकेश रोहित

लघुकथा
                                  
                              स्वप्न 
                                                                - राकेश रोहित 

        औरत को अचानक भान हुआ, यह खूबसूरत दुनिया उसके लिए बनी है और प्रतिपल को उसको हिस्सेदारी अपेक्षित है. उसकी आँखें खुल गईं.

        पुरुष ने कहा, "प्रिये, तुम कितना सुन्दर स्वप्न देख लेती हो," और वह मुस्करा कर उसकी बांहों में सो गई. ooo                                                                                                                                                                            

Monday, 11 October 2010

ईश्वर ने शोक मनाया - राकेश रोहित


लघुकथा 


                             ईश्वर ने शोक मनाया 
                                                                         - राकेश रोहित

        ईश्वर ने शोक मनाया. वह ईश्वर, ईश्वर नहीं है. हमारे मोहल्ले में रहता है और हरी सब्जियां बेचता है. हम सब उसे ईश्वर से ज्यादा हरी सब्जी से जानते हैं. मैं उसे ज्यादा  नहीं जानता, पर इतना अवश्य कि ईश्वर है और हैं सब्जियां हरी-हरी. लेकिन एक शाम वह मेरे पास पहुंचा- "सब्जियां खरीद लीजिए भइया, हरी है."

      मुझे अचरज हुआ. मेरे पास कभी नहीं आता था वह. मैंने कहा- "ईश्वर तुम मुझे नहीं जानते लेकिन मेरी मजबूरी समझ सकते हो. मुझे खाना बनाना आता नहीं. पका-पकाया लाता हूँ, वही खाता  हूँ." पर वह बोले जा रहा था - "खरीद लीजिए हरी हैं. एक भी नहीं बिकीं. मोहल्ले में किसी ने नहीं खरीदा. आज मोहल्ले में शादी है.  सभी दावत में शरीक होंगे. इधर मेरी माँ मर गई है. वही बोती, वही उगाती थी सब्जियां. मैंने सोचा आज भर बेच दूं कि फिर इतनी हरी न होगी सब्जियां."

        मुझे दुःख हुआ कि उसने शोक नहीं मनाया और बेचने चला आया सब्जियां. मैंने देखा उसके चेहरे की रंगत उतर रही थी और खतरे में था  सब्जियों का हरापन. उधर चुप थे पर्यावरण विशेषज्ञ और मंत्रीगण. मैं ना करता रहा पर ईश्वर छोड़ गया मेरे घर हरी सब्जियां, फिर वह कभी पैसे लेने नहीं आया. अब भी रखी हैं वे हरी सब्जियां कि जब न होंगी सब्जियां और न होगा ईश्वर, मैं दराज से निकालूँगा सूखी भिन्डी कि कहूँगा था इसमें हरापन, कि था कभी ईश्वर! जिसने शोक मनाया. ईश्वर ने शोक मनाया. ooo

Friday, 8 October 2010

मेरा नाम क्या है - राकेश रोहित

लघुकथा
                            मेरा नाम क्या है
                                      - राकेश रोहित
यह एक आम बात थी, उसका एक नाम था. और अकसर वह खुद को अपने उसी नाम से पहचानता था. इसलिए जब मैंने उसे पुकारा वह रुकने से पहले ठिठका, चौंका और चिल्लाया, अरे तुम!
मैं ही था, उसने मेरी ओर देखा और और बात शुरू होने से पहले खत्म होने का सिरा ढूंढने लगी. उसकी अंगुलियां अखबार की तहों से खेलने लगी थीं जो कुछ देर पहले मेरे हाथों में लिपटा था.
अच्छा है सस्ता है... वह बोला, यद्यपि यह कोई विज्ञापक जिंगल्स नहीं था पर उसके चेहरे पर उपभोक्ता की-सी चमक महसूस की जा सकती थी, ...साथ-साथ भविष्यफल भी. देखूं मेरे बारे में क्या लिखा है?
उसकी वैयक्तिकता ने मुझे क्षण- भर आहत किया था पर मैं उबर गया क्योंकि उसका मैं कहना कहीं-न-कहीं मेरे होने से जुड़ा था. तुम्हारी राशि क्या है? मैंने पूछा.
राशि! यहीं कहींयानी नाम का पहला अक्षर लिखा होगा. उसके कहने में एक कायम विश्वास था और फिसलन भरा सत्य.
वहां वैसा कुछ न था. केवल राशियां थीं और कुछ विचार. न कोई नाम, न कोई अक्षर जिनका नाम के साथ जुड़ाव हो. मुझे याद आया मैं उनके यदृच्छ चयन में अपना भविष्य पढ़ा करता था. मैंने उसकी ओर देखा, वह हतप्रभ था पर संभल गया, बात दरअसल है कि लोग अपनी राशियां याद रखते हैं और आजकल तो अपना भविष्य भी, उन्हें कुछ ढूंढने की जरुरत नहीं पड़ती.
लेकिन तुम्हारी राशि क्या है? मैंने उसे कुरेदना चाह और डर गया. पर उसके चेहरे पर मेरे विरुद्ध कुछ भी न था एक रहस्यमयता के सिवा. वह फुसफुसाया, मैं अकसर भूल जाता हूँ, मेरी कोई राशि नहीं है. अजीब बात है न! अजीब.
लेकिन तुम्हारा नाम तो है? मेरे स्वर अंधेरी कंदरा में गूंज रहे थे और भटक गये.
      कौन जानता है? संभव है उसका कोई नाम ही न हो या फिर उसके नाम में हो बारह शब्द या उसका नाम हमारी वर्णमाला के किसी भी अक्षर से शुरू नहीं होता हो कि जिसको लिखना असंभव हो और बोलना कठिन. कौन जानता है? कुछ भी हो सकता है! दावे के साथ तो कुछ भी कहना मुश्किल है. संभव है वह उनमें से हो जिनका नाम तो होता है पर कोई भविष्य नहीं. यह एक आम बात है. ooo

Sunday, 3 October 2010

असंवाद - राकेश रोहित

लघुकथा
                                                         असंवाद
                                - राकेश रोहित 

सुबह का तीखा उजास कमरे को हरारत से भर गया था. चादर में लिपटे दायें हाथ को आहिस्ता से सरकाकर मैं टेबुल पर चाय की प्याली ढूंढने लगा. तभी हाथ से कोई ठंडी चीज टकरायी. एक खटका हुआ. मन मारकर मैं दीवाल के सहारे पीठ टिकाकर  बैठ गया. टेबुल पर सो रही घड़ी सुबह के चार बजा रही थी. मेरा मन कड़वाहट से भर गया. भावना आज भी बैटरी बदलना भूल गयी थी.
नींद तो नहीं आ रही थी पर बेड टी न मिलने के कारन सोने का उपक्रम करने लगा. और पहली बार मुझे अहसास हुआ, जागते हुए सोने का अभिनय करना कितना कठिन होता है. आँखें बंद करने के प्रयास में बार-बार भिंच जाती थीं और पलकों पर सिकुडनें पड़ जाती थीं, मैंने उँगलियों से छू कर देखा. कंपकपाती पलकों से अब ऊबन सी होने लगी थी. टेबुल पर पड़ी घड़ी को सीधा करते हुए मैं उठा. बगलवाले कमरे में  लेटी हुई भावना दीवाल को निहार रही थी. मैं उससे मिलने को प्रस्तुत न था, खिड़की से हट गया.
आज खुद चाय बनाऊंगा, ब्रश करते हुए मैंने सोचा. पर किचन में केतली में चाय पड़ी थी. मैं पानी पी चुके गिलास में भरकर सिप करने लगा. चाय ठंडी हो चुकी थी. क्या हो गया है उसे? मैंने आख़िरी बड़ा घूँट भरते हुए भावना के बारे में सोचा.
बिना किसी शोर-शराबे के मैं बड़ी ख़ामोशी से दफ्तर चला आया, पर लंच लाना भूल गया था. वह शायद अब तक सो रही होगी लंच टाइम में मैंने टेबुल पर अनियमित रेखाएं उकेरते हुए सोचा. किसी ने चाय तक के लिए आफर नहीं किया. मुझे भूख महसूस हो रही थी पर घर जाने की इच्छा नहीं थी. वह सोयी होगी. पर हुआ क्या है उसे? मैंने फिर सोचा.
दफ्तर से लौटकर दरवाजे में चाभी डालता हुआ मैं खुद पर हँस पड़ा. भला अब तक क्या सोयी होगी वह? वह दिन में कभी नहीं सोती. मैंने फिर खिड़की से देखा, वह लेटी हुई थी. मैं रसोई से ब्रेड का बड़ा टुकड़ा मुँह में ठूंसता हुआ काफी सहजता से उसके कमरे में चला आया. दरवाजा सरकाने से शायद कुछ आवाज हुई थी, वह हरकत में  आयी और उठकर बैठ गयी. चेहरा अब भी भावविहीन था ज्यों पहली बार कैमरे के सामने खड़ी हो.
क्या हो गया है तुमको? मेरे स्वर से मेरे साथ-साथ वह भी चौंकी. फिर आहिस्ते से बोली, पिताजी नहीं रहे.
ओह! कहकर मैं खामोश होने वाला था कि याद आया, मरनेवाले से मेरा भी कुछ रिश्ता बनता था. तुमने मुझे बताया नहीं? मैंने संवेदना को आगे सरकाया.
सुबह ही फोन आया था, उसने बोलना आरंभ किया.
सुबह की याद से मुझे खीझ होने लगी थी. तभी मैंने देखा उसकी आँखों में आंसू नहीं थे. माँ के मरने पर तो कितना रोयी थी. अब क्या  हो गया है उसे? मैंने साहस कर पूछ ही लिया, रो रही हो?
उसकी निरीह आँखों ने पहले मुझे देखा और अगले पल अपने अजनबीपन को घुटनों से ढंक लिया. घुटनों पर टिकी उसकी गर्दन हिलती हुई सिसकने का आभास दे रही थी. शायद वह रो रही है, अच्छा ही है, मैंने सोचा. घुटनों से आँखें मलने की कोशिश करते हुए उसने पूछा, कितने बज रहे हैं? स्वर कुछ भींगा था.
चार! मैंने बंद घड़ी की ओर देखा और दूसरे कमरे में आकर उसकी बैटरी बदलने लगा. ooo