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Monday, 21 October 2013
Saturday, 16 October 2010
सात आदमी को छूओ - राकेश रोहित
लघुकथा
सात आदमी को छूओ
- राकेश रोहित
सात आदमी को छूओ
- राकेश रोहित
यह प्रार्थना का समय था. स्कूलों की घंटियां बज चुकी थीं और बच्चे कतार में खड़े थे. मैंने उन्हें देखा. और मुझे वितृष्णा हुई उस भाव के प्रति जिसमें दुनिया को बचा लेने की गंध थी. तभी मेरे सामने एक छोटा बच्चा आ गया; दबे कदम, धीरे-धीरे. और प्रार्थना होती देख वह असहज हो गया. उसका चेहरा परेशान हो रहा था. वह थोड़ा हटकर एक कोने में खड़ा हो गया, जहां प्रार्थना से अलग एक बच्ची खड़ी थी. बच्ची ने अपने बस्ते को संभाला और उसे देख मुस्कराई. फिर उसने बच्चे से कुछ कहा. बच्चे ने चौंक कर पीछे देखा, पर वहां कोई न था. बच्ची खुश हो गई. उसने अपनी नन्हीं हथेलियों से हल्की ताली बजाई और बोली - " छका दिए, सात आदमी को छूओ... सात आदमी को छूओ!" बच्चा भी अचानक प्रसन्न हो आया था. उसे प्रायश्चित करना था - झूठ को सच समझने का, सात आदमी को छूकर. उसने बच्ची से शुरुआत की और उसे छूकर चिल्लाया- एक! फिर वह दौड़ गया. सामने दो बच्चे कांच की गोली से खेल रहे थे ... दो-तीन, उसने गिना. मैं उनके पास आ रहा था और मुझे लग रहा था जैसे मैं उसे खेल में शामिल हो गया हूँ. एक खुशी मेरे अंदर फूट रही थी. बच्चा सड़क पर इधर-उधर दौड़ रहा था. उसने कागज चुन रहे दो बच्चों को गिना. चार-पांच. अब सड़क पर कोई न था और बच्चा इधर-उधर देखता परेशान हो रहा था. मुझे लगा अब वह मुझे छूएगा और तब केवल एक की कमी रह जाएगी. मैंने अपनी चाल कम कर दी ताकि वह मुझे छू सके. तभी एक लड़का सर पर टोकरी रखे साग बेचता उधर से निकला. उसने उसे छूआ - छ:, और फिर मेरे पीछे दौड़ कर वह मुझे छू कर चिल्लाया - सात! दूर खड़ी बच्ची खिलखिलाकर हँस पडी. एक उत्फुल्लता उसके चेहरे पर थी. सात आदमी को छूओ, उसने तालियां बजाकर कहा. अब यह खेल मुझे जारी रखना था. पर मैं धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था. बच्चे धीरे से कक्षा में लौट रहे थे. और खेल का सिरा मुझ तक खिंचता-खिंचता टूट गया था. एक खिन्नता मेरे आगे खन्न से बिथर गई थी. सामने धूप तेज हो रही थी और एक आवाज अब भी मेरे पीछे थी- सात आदमी को छूओ. ooo
Thursday, 14 October 2010
हस्तांतरण - राकेश रोहित
लघुकथा
हस्तांतरण
- राकेश रोहित
हस्तांतरण
- राकेश रोहित
वर्षा के जमे पानी में मेरी नाव तैर रही थी. मैं उसे देखने में मग्न था. तभी पास का एक बच्चा पानी में उछलता-कूदता आगे बढ़ा. उसने हाथ बढ़ाकर नाव को उठा लिया और किनारे लाकर फिर से तैरा दिया. नाव तैरती रही. अब वह ताली बजकर हँस रहा था और मैं गुमसुम खड़ा था. ooo
समझौता – राकेश रोहित
लघुकथा
समझौता
– राकेश रोहित
वे लड़ते हुए अचानक ठहर गए. "यहां कोई देख लेगा," उनमें से एक ने कहा. "चलो हम मैदान में चलें." ooo
Tuesday, 5 October 2010
लांग शॉट - राकेश रोहित
लघुकथा
लांग शॉट
-राकेश रोहित
वह हँसा जबकि इसमें हँसने जैसा कुछ न था. मैंने केवल इतना कहा था, अजीब मुश्किल है टिकट ही नहीं मिल रहा और उसने मुझे भरपूर देखा, मुस्कराया, फिर बोला, फिल्म चल निकली है! इस सूचना में जिज्ञासा जैसा कुछ था यह उसके हाव-भाव से समझना कठिन था पर शब्द घंटियों की तरह बज रहे थे. वह अपनी रौ में बोलता रहा.
मेरा क्या जाता था! मुफ्त की फिल्म और सीट की सुविधाजनक स्थिति. पास कुछ शब्द अवश्य बिखर रहे थे – आपको यकीन न हो एसिस्टेंट डायरेक्टर मुझसे कह रहा था, ऐसा स्टंट-दृश्य पहली बार किसी फिल्म में आया है. सच कहिये तो मुझको काफी डर लग रहा था- कर पाऊंगा या नहीं. आप जानते हैं यह कितना खतरनाक होता है. कभी-कभी. लेकिन सब कुछ इतनी तेजी में हुआ कि मैं खुद महसूस नहीं सका यानी रोमांच जैसा कुछ. आप समझ रहे हैं! शॉट ओ.के. हुआ तो हीरो ने मेरी पीठ ठोंकी. आप अंदाज नहीं लगा सकते मुझे कितनी खुशी हुई तब. आप अभी देखेंगे कपड़े से लेकर हेयर स्टाइल तक सब हीरो के जैसा है. आप मुझे शायद पहचान नहीं पायें. कैमरा लांग शॉट में हैं न, पर.... और उसके शब्द फुसफुसाकर रह गये. तालियों का एक रेला बह निकला था.
अँधेरे में उसके हाव-भाव महसूसना काफी कठिन था पर वह जिस तरह चुप पड़ गया था उससे मुझे भय था कि कहीं उसकी भूमिका गुजर न गयी हो. अब एक फिल्म में तो इतने सारे लांग शॉट होते हैं. मुझे क्या मालूम था यह सब एक झटके में होगा. मेरा अभीष्ट उस स्टंटमैन को ठेस पहुंचाने का तो कभी न था पर सामने गीतों के बोल तैरने लगे. मैं नायिका के चेहरे के क्लोजअप बटोरने लगा. ooo
Sunday, 3 October 2010
असंवाद - राकेश रोहित
लघुकथा
असंवाद
- राकेश रोहित
सुबह का तीखा उजास कमरे को हरारत से भर गया था. चादर में लिपटे दायें हाथ को आहिस्ता से सरकाकर मैं टेबुल पर चाय की प्याली ढूंढने लगा. तभी हाथ से कोई ठंडी चीज टकरायी. एक खटका हुआ. मन मारकर मैं दीवाल के सहारे पीठ टिकाकर बैठ गया. टेबुल पर सो रही घड़ी सुबह के चार बजा रही थी. मेरा मन कड़वाहट से भर गया. भावना आज भी बैटरी बदलना भूल गयी थी.
नींद तो नहीं आ रही थी पर ‘बेड टी’ न मिलने के कारन सोने का उपक्रम करने लगा. और पहली बार मुझे अहसास हुआ, जागते हुए सोने का अभिनय करना कितना कठिन होता है. आँखें बंद करने के प्रयास में बार-बार भिंच जाती थीं और पलकों पर सिकुडनें पड़ जाती थीं, मैंने उँगलियों से छू कर देखा. कंपकपाती पलकों से अब ऊबन सी होने लगी थी. टेबुल पर पड़ी घड़ी को सीधा करते हुए मैं उठा. बगलवाले कमरे में लेटी हुई भावना दीवाल को निहार रही थी. मैं उससे मिलने को प्रस्तुत न था, खिड़की से हट गया.
“आज खुद चाय बनाऊंगा,” ब्रश करते हुए मैंने सोचा. पर किचन में केतली में चाय पड़ी थी. मैं पानी पी चुके गिलास में भरकर सिप करने लगा. चाय ठंडी हो चुकी थी. “क्या हो गया है उसे?” मैंने आख़िरी बड़ा घूँट भरते हुए भावना के बारे में सोचा.
बिना किसी शोर-शराबे के मैं बड़ी ख़ामोशी से दफ्तर चला आया, पर लंच लाना भूल गया था. “वह शायद अब तक सो रही होगी” लंच टाइम में मैंने टेबुल पर अनियमित रेखाएं उकेरते हुए सोचा. किसी ने चाय तक के लिए आफर नहीं किया. मुझे भूख महसूस हो रही थी पर घर जाने की इच्छा नहीं थी. वह सोयी होगी. “पर हुआ क्या है उसे?” मैंने फिर सोचा.
दफ्तर से लौटकर दरवाजे में चाभी डालता हुआ मैं खुद पर हँस पड़ा. भला अब तक क्या सोयी होगी वह? वह दिन में कभी नहीं सोती. मैंने फिर खिड़की से देखा, वह लेटी हुई थी. मैं रसोई से ब्रेड का बड़ा टुकड़ा मुँह में ठूंसता हुआ काफी सहजता से उसके कमरे में चला आया. दरवाजा सरकाने से शायद कुछ आवाज हुई थी, वह हरकत में आयी और उठकर बैठ गयी. चेहरा अब भी भावविहीन था ज्यों पहली बार कैमरे के सामने खड़ी हो.
“क्या हो गया है तुमको?” मेरे स्वर से मेरे साथ-साथ वह भी चौंकी. फिर आहिस्ते से बोली, “पिताजी नहीं रहे.”
“ओह!” कहकर मैं खामोश होने वाला था कि याद आया, मरनेवाले से मेरा भी कुछ रिश्ता बनता था. “तुमने मुझे बताया नहीं?” मैंने संवेदना को आगे सरकाया.
“सुबह ही फोन आया था,” उसने बोलना आरंभ किया.
सुबह की याद से मुझे खीझ होने लगी थी. तभी मैंने देखा उसकी आँखों में आंसू नहीं थे. माँ के मरने पर तो कितना रोयी थी. अब क्या हो गया है उसे? मैंने साहस कर पूछ ही लिया, “रो रही हो?’
उसकी निरीह आँखों ने पहले मुझे देखा और अगले पल अपने अजनबीपन को घुटनों से ढंक लिया. घुटनों पर टिकी उसकी गर्दन हिलती हुई सिसकने का आभास दे रही थी. “शायद वह रो रही है, अच्छा ही है,” मैंने सोचा. घुटनों से आँखें मलने की कोशिश करते हुए उसने पूछा, “कितने बज रहे हैं?” स्वर कुछ भींगा था.
“चार!” मैंने बंद घड़ी की ओर देखा और दूसरे कमरे में आकर उसकी बैटरी बदलने लगा. ooo
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