Saturday, 5 April 2014

एक कविता नदी के लिए - राकेश रोहित

कविता 
एक कविता नदी के लिए
- राकेश रोहित 

हम सबके जीवन में
नदी की स्मृति होती है
हमारा जीवन
स्मृतियों की नदी है।

नदी खोजते हूए हम
घर से निकल आते हैं
और घर से निकल हम
खोयी हुई एक नदी याद करते हैं।


नदी खोजते हुए हम / घर से निकल आते हैं - राकेश रोहित 

नदी की तलाश में ही कवि निलय उपाध्याय
गंगोत्री से गंगासागर तक हो आए
अब एक नदी उनके साथ चलती है
अब एक नदी उनके अंदर बहती है।

बचपन में कभी
तबीयत से उछाला एक पत्थर*
नदी के साथ बहता है
और
नदी की तलहटी में कोई सिक्का
चुप प्रार्थनाओं से लिपटा पड़ा रहता है।

सभ्यता की शुरुआत में
शायद कोई नदी किनारे रोया था
इसलिए नदी के पास अकेले जाते ही
छूटती है रुलाई
और मन के अंदर
कहीं गहरे दबा प्यार  वहीं याद आता है।

नदी किनारे अचानक 
एक डर हमें भिंगोता है
और गले में घुटता है
कोई अनजाना आर्तनाद


नदी किनारे अचानक / एक डर हमें भिंगोता है - राकेश रोहित 

कुछ गीत जो दुनिया में
अब भी बचे हुए हैं
उनमें नदी की याद है
अब भी नदी की हवा
आकर अचानक छूती है
तो पुरखों के स्पर्श से
सिहरता है मन!

दोस्तों!
इस दुनिया में
जब कोई नहीं होता साथ
एक अकेली नदी हमसे पूछती है -
तुम्हें जाना कहाँ है?


एक अकेली नदी हमसे पूछती है - तुम्हें जाना कहाँ है? / राकेश रोहित
(*एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों - दुष्यंत कुमार)

Sunday, 23 March 2014

असंभव समय में कविता - राकेश रोहित

कविता
असंभव समय में कविता 
- राकेश रोहित 

हर दिन वर्णमाला का एक अक्षर मैं भूल जाता हूँ
हर दिन टूट जाती है अंतर की एक लय
हर दिन सूख जाता है एक हरा पत्ता
हर दिन मैं तुमको खो देता हूँ जरा- जरा!


ऐसे असंभव समय में लिखता हूँ मैं कविता
जैसे इस सृष्टि में मैं जीवन को धारण करता हूँ
जैसे वीरान आकाशगंगा से एक गूँज उठती है
और गुनगुनाती है एक गीत अकेली धरा!!

असंभव समय में कविता / राकेश रोहित 

Monday, 10 March 2014

क्या 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है? / राकेश रोहित

आलेख 
क्या 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है?
- राकेश रोहित 

(हिंदी के महत्वपूर्ण कहानीकार श्री संजीव जी को ग्यारह लाख रूपये का श्रीलाल स्मृति सम्मान 2013, प्रदान किया गया है. उन्हें हार्दिक बधाई! इस अवसर पर उनकी कहानी 'आरोहण' (हंसअगस्त, 1996) पर यह लेख प्रस्तुत है. यह लेख 'हंस' में 'आरोहण'  कहानी के प्रकाशन के उपरांत 'हंस' के दिसंबर 1996 अंक में प्रकाशित हुआ था. लेख के साथ आये संदर्भो को कृपया प्रकाशन वर्ष के साथ ही देखें.)

संजीव / कथा का आरोहण 

हिंदी कहानी पर विचार करते समय मैंने अक्सर यह समझना चाहा है कि मार्क्सवादी मॉडल के विखंडन और और तत्समय के आक्रामक उपभोक्तावाद के सचमुच के कठिन काल में हिंदी कहानी वह कौन-सा स्वरुप अख्तियार कर सकती है, जो उसकी रचनात्मक आँच के साथ-साथ उसकी प्रतिबद्धता को भी सुरक्षित रख पाने में संभव हो. इसके पहले मुझे कहने दीजिए कि हिंदी कहानी में वादाधारित कहानी का जो निर्विवाद दौर आया था, उसमें बाद में मार्क्सवाद की अधकचरी समझ और 'बिहारी' कहानीकारों का जो भी योगदान रहा हो, इसकी शुरुआत एक हद तक संजीव की 'अपराध' कहानी से हुई थी. 'थैंक्यू मिस्टर ग्लाड' के दौर में प्रकशित इस कहानी में यद्यपि तत्कालीन विक्षोभ का प्रतिक्षेपण था पर इसने शायद उन फार्मूलों का भी विकास किया, जहाँ प्रतिबद्धता कहानी से अलग नंगी और कुरूप दिखती थी. यद्यपि 'आपरेशन जोनाकी', 'देवी सिंह कौन', 'सुधीर घोषाल', 'बिरजू तो मारा जायेगा' समकालीन कथा-यात्रा के जीवंत दस्तावेज हैं पर प्रतिबद्धतावादी कहानी की उत्तेजना का स्खलन विजयकांत की 'इंद्रजाल' जैसी कहानियों में साफ-साफ सामने आया. और आप अन्य लघु पत्रिकाओं की तो बात छोड़िये 'जन चेतना के प्रगतिशील कथा मासिक' उर्फ 'हंस' का प्रगतिशील जन भी लाल रंग, लाल सूरज वगैरह के प्रतीक-जाल में उलझा था या आदम-ईव के घेरे में आकर सिमटा था.

ऐसी कहानियाँ भी आईं, जो आजादी के बाद के भारतीय समाज व उसकी चुनौतियों की सच्ची समझ से लिखी गई थीं. पूरा याद करना कठिन हो फिर भी 'हिंगवा घाट में पानी रे', 'चिट्ठी', 'तिरिया चरित्तर', 'कहीं लौटा तो नहीं', 'शोक पर्व', 'अश्लील', 'पिंटी का साबुन', 'टुंड्रा प्रदेश', 'वे वहाँ कैद हैं', 'शामिल बाजा', 'गुप्तदान', 'क्रेमलिन टाइम', 'भैया एक्सप्रेस' आदि कहानियों को देखें. पर ये कहानियाँ अगर चर्चा में होने के बावजूद मुख्यधारा की कहानियाँ नहीं रहीं, तो उस जनवादी क्रांति के अघोषित युद्ध के विराम-काल में एक खामोश-सी कहानी 'आरोहण' (हंस, अगस्त, 1996) क्या हिंदी कहानी का कोई नया प्रस्थान-बिंदु है और क्या इसका श्रेय फिर से संजीव को ही दिया जाना चाहिए?

दिल पर हाथ रखकर बताइए तो जरा समूची हिंदी कहानी में भूप दादा जैसे कितने चरित्र याद आते हैं आपको? उसकी जिजीविषा मुझे अचानक 'भेड़िये' के खारू की याद दिलाती है, पर कितनी खामोश, कितनी निर्दोष. यह जो  भूप दादा का 'आत्मनिर्वासन' है वह निर्मल वर्मा के 'कौव्वे और काला पानी' के आत्मनिर्वासन से कितना अलग है क्योंकि वस्तुतः यह आत्मनिर्वासन है ही नहीं यद्यपि दिखता है. तभी तो भूप दादा इतने आत्मविश्वास से कह सकते हैं- "कौन कहता है अकेला हूँ, यहाँ माँ है, बाबा हैं, शैला है, सोये पड़े हैं सब. यहाँ महीप है, बल्द हैं, मेरी घरवाली है, मौत के मुँह से निकले गये खेत हैं, पेड़ हैं झरना है. इन पहाड़ों में मेरे पुरखों, मेरे प्यारों की आत्मा भटकती रहती है. मैं उनसे बात करता हूँ. मैं अकेला कहाँ हूँ." तो सचमुच के अकेलेपन और पहाड़-सी कठिन जिंदगी में यह जो अपने को अकेला न समझने की जिदभरी समझ है वही शायद इस आक्रामक समय में एक विचार को निरीह न समझने की हिम्मत पैदा कर सकती है. और सबसे मार्के की बात है कि आक्रामकता के विरुद्ध संघर्ष में अकेलेपन के बावजूद एक सदभाव है और वही इस संघर्ष की सबसे बड़ी शक्ति है. सोचिये, अकेलापन है, दुःख है, पर इसके बावजूद न घृणा है, न निरीहता है. एक संबल है सत् का, सही होने का- "(बात) नहीं की, दुःख था, लेकिन देवता जानते हैं जो कभी उनका बुरा सोचा हो मन में. यहाँ जहाँ हूँ, बुरा सोचूँगा भी कैसे? मुझे तो सभी पर दया आती है यहाँ से नीचे देखने पर." 

यह है आरोहण सत् का और सद् का!

जब मैं कहता हूँ कि 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान-बिंदु है तो मेरा मकसद एक नये चरित्र की स्थापना या तलाश से ही निष्कर्ष निकाल लेने की सुविधा का नहीं है बल्कि मेरा जोर यह मानने पर है कि यह कहानी हिंदी कथा-परंपरा के 'डी-स्कूलिंग' का भी सूचक है. न केवल इस मायने में कि यह संजीव की अपनी पूर्व की कहानियों से इतर है बल्कि इसलिए भी कि यह कहानी शायद पहली बार उस  भाषा में लिखी गयी है जहाँ अब तक के अछूत समझे गये विषय, अस्तित्व के संकट की समझ जनवादी तरीके से होती है. ऐसे परिवेश की कल्पना कीजिये, जहाँ के लोगों के लिए यह विश्वास करना कठिन हो कि सरकार पर्वतारोहणके लिए भी पैसा दे सकती है वहाँ अगर संजीव अस्तित्व जैसे कठिन सार्त्रीय विषय की जगह बना लेते हैं, तो इतना तय है कि संजीव ने फिर एक नये कथा-क्षेत्र की सफल तलाश कर ली है. 'तिड़बेनी का तड़बन्ना' से 'आरोहण' तक की यह यात्रा केवल संजीव की यात्रा नहीं वरन हिंदी कहानी की भी यात्रा है.

ऐसी स्थिति में, जब अधिकतर हिंदी कविता अगर राग भोपाली में नहीं है तो केदारनाथ सिंह के स्कूल की है (राजकुमार कुम्भज जैसे कुछेक अपवादों को छोड़कर) और वह भी तब, जब केदारनाथ सिंह सयत्न इसका पाठ्यक्रम लगातार बदलते रहे हैं हिंदी कहानी की यह 'डी-स्कूलिंग' सुखकर भी है और महत्वपूर्ण भी. हिंदी कविता की यह बहुत बड़ी विडंबना है कि जिसने आज के तनाव भरे और आतंककारी समयानुकूल भाषा का विकास मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के दौर में ही कर लिया था, आज के समय में छायालोक की लिजलिजी और दुहरावभरी भाषा में बात करती है. समय का तनाव जो मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय ने अपने समय में अकेले जिया था, वही आज हम सामूहिक रूप से जी रहे हैं, पर मुझे ऐसी कोई कविता बताइए  जो उसी खुरदुरी और चुभने वाली भाषा में लिखी गयी हो. काँटों भरे इस समय में केंचुए-सी कोमलता लेकर आप कविता का क्या करेंगे? माना कि कोमलता अच्छी चीज है और केंचुआ किसानोपयोगी! तो देखिए, अब तक हम निर्विवाद मानते आये थे कि कविता अपने समय की ज्यादा स्फूर्त प्रतिक्रिया करती है और कहानी पकने में समय लेती है पर इस बार क्या करें अगर हम पाते हैं कि कविता ने अपने एक तय विषय-सूची बना रखी है, तो कहानी नये संकट से नये अंदाज से जूझती है, नई भाषा के साथ? अगर आप यह मान लेते हैं कि कुछ नये की तलाश की निर्दोष कामना में कविता 'स्कूल्ड' होती जा रही है, जबकि कहानी ने, देर से ही सही, 'डी-स्कूलिंग' की जरूरत को समझा है तो आप मान लेंगे कि 'आरोहण' वाकई हिंदी कहानी का नया प्रस्थान-बिंदु है.

                                     ('हंसके दिसंबर 1996 अंक में प्रकाशित )

Monday, 10 February 2014

कविता और जादू / राकेश रोहित

कविता 
कविता और जादू 
- राकेश रोहित

कविता है या जादू?

सौ जादू होते हैं कविता में
पर सबसे बड़ा जादू
कविता के बाहर होता है
जब हरे पत्तों पर
कोई पीला फूल खिलता है।

मैं हर बार ताजे रंग लेकर
लौटता हूँ कविता में
मैं जानता हूँ
हर बार जादू बाहर रह जाता है।

हरे पत्तों पर पीला फूल / राकेश रोहित 

Friday, 7 February 2014

हमारे ही बीच का होगा वह, जो सच कहेगा - राकेश रोहित

कविता 
हमारे ही बीच का होगा वह, जो सच कहेगा 
- राकेश रोहित

हमारे ही बीच का होगा वह
जो सच कहेगा
हमारे ही भीतर से आएगा!

देवताओं सी चमक
नहीं होगी उसके चेहरे पर
नहीं होगा,
वह उम्मीद की गाथाओं का रचयिता!
हो सकता है
इंद्रधनुषों की बात करते वक्त भी
उसकी आँखों से
झांक रही हो
रात की थोड़ी बची भूख
और कहीं उसके गहरे अंदर
छूट रही हो
एक नामालूम रुलाई!

एक सामान्य सी सुबह होगी वह
और रोज की तरह का दिन
जब रोज के कामों से
थोड़ा वक्त निकाल कर
जैसे सुस्ताता है कोई पथिक
वह हमसे- आपसे मुखातिब होकर
सरे राह सच कहेगा!

ऐतिहासिक नहीं होगा वह दिन
जब सूरज की तरह
चमकेगा सच
और साफ झलकेगा
भूरी टहनियों पर
हरे पत्तों का साहस।

भूरी टहनियों पर हरे पत्तों का साहस / राकेश रोहित 

Thursday, 23 January 2014

उम्मीद का कोई शीर्षक - राकेश रोहित

कविता
उम्मीद का कोई शीर्षक 
- राकेश रोहित

मैं नष्ट हो रही दुनिया से

एक सहमा हुआ शब्द उठाता हूँ
मैं उसे अपनी सबसे प्यारी कविता में
बची रहने की इच्छा के साथ टांक देता हूँ.


हर असंभव के विरुद्ध एक जुगत की तरह
मैं आसमान को रंग-बिरंगी पतंगों से भर देना चाहता हूँ.



इस नश्वर दुनिया में एक हठ की तरह
मैं हर बार बचा लाता हूँ -
कविता के लिए उम्मीद का कोई शीर्षक!

उम्मीद का कोई शीर्षक / राकेश रोहित 

Monday, 21 October 2013

चिड़िया जब बोलती है - राकेश रोहित

कविता 
चिड़िया जब बोलती है 
- राकेश रोहित 

एक चिड़िया जब बोलती है
एक चिड़िया जब...
बस
इसके बाद सारे शब्द बेमानी हो जाते हैं!

हजार शब्दों में उतारी नहीं जाती
उसकी एक आवाज
एक चिड़िया जब बोलती है
कविताएँ उसको खामोश सुनती हैं!!


चिड़िया जब बोलती है / राकेश रोहित 

Friday, 4 October 2013

पंचतंत्र, मेमने और बाघ - राकेश रोहित

कविता 
पंचतंत्र, मेमने और बाघ 
- राकेश रोहित

पानी की तलाश में मेमने
पंचतंत्र की कहानियों से बाहर निकल आते हैं
और हर बार पानी के हर स्रोत पर
कोई बाघ उनका इंतजार कर रहा होता है.

मेमनों के पास तर्क होते हैं,
और बाघ के पास बहाने.
मेमने हर बार नये होते हैं
और बाघ नया हो या पुराना
फर्क नहीं पड़ता.

जिसने यह कहानी लिखी
वह पहले ही जान गया था -
"मेमने अपनी प्यास के लिए मरते हैं
और ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती!"

ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती / राकेश रोहित 

Friday, 16 August 2013

एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि - राकेश रोहित

कविता 
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि 
- राकेश रोहित 

जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?

अंततः एक कवि को
स्वप्न-द्रष्टा होना होता है।
आश्चर्य नहीं,
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि
वह जानता है बहुत कठिन होता है
अच्छी कविता का जीवन!
आसान नहीं होती राजपथ पर
हजार सपनों से सजे बचपन की राह।

अंधेरे ब्रह्मांड में जो तारों को
हजार सूरज की तरह चमकाता है
कोई नहीं जानता इस कृष्ण- विवर में
कवि इतनी ऊर्जा कहाँ से लाता है?

उम्मीद से भरे शब्द
कवि के लिए
कविता में एक सपना बुनते हैं!
जब दिल देता नहीं साथ,
गहन निराशा में
हम कविता की सुनते हैं।

है ऐसे में सहज यह अचरज
जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?

एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि / राकेश रोहित  

Wednesday, 10 July 2013

मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है - राकेश रोहित

कविता


मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है

- राकेश रोहित 

मुझे लगता है मंगल ग्रह पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में 
कहीं कोई एक कविता धरती के बारे में है!

आँखों से बहे आंसू
जो आँखों से बहे और कहीं नहीं पहुंचे
आवाज जो दिल से निकली और
दिल तक नहीं पहुंची!
उसी कविता की बीच की किन्हीं पंक्तियों में
उन आंसुओं का जिक्र है
उस आवाज की पुकार है.

संसार के सभी असंभव दुःख जो नहीं होने थे और हुए
मुझे लगता है उस कविता में
उन दुखों की वेदना की आवृत्ति है.

पता नहीं वह कविता लिखी जा चुकी है
या अब भी लिखी जा रही है
क्योंकि धरती पर अभी-अभी लुप्त हुई प्रजाति का 
जिक्र उस कविता में है.

मुझे लगता है संसार के सबसे सुंदर सपनों में
कट कर  भटकती  उम्मीद की पतंग
मंगल ग्रह के ही किसी वीराने पहाड़ से टकराती है
और अब भी जब इस सुंदर धरती को बचाने की
कविता की कोशिशें विफल होती है
मंगल ग्रह पर तूफान उठते हैं.

मुझे लगता है
जैसे धरती पर एक कविता
मंगल ग्रह के बारे में है
ठीक वैसे ही मंगल ग्रह पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में
कहीं कोई एक कविता धरती के बारे में है!


मुझे लगता है... / राकेश रोहित 

Friday, 21 June 2013

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य - राकेश रोहित

कविता

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य 
- राकेश रोहित 


सब्जियों का रंग बचाने में
उनका स्वाद छूटता जाता है.

कोई हर दिन, सुबह-शाम
रंगता रहता चीजों को.

जैसे कोई मुरझाये होठों को
रंगता है मुस्कान की तरह!
जैसे कोई परछाई घर से निकलती है
रंगकर अपने को मनुष्य की तरह.


दोस्तों! यदि ऐसे ही बाजार
चुराता रहा जीवन का स्वाद,
एक पीढ़ी पुरातत्वविदों की तरह
चीजों के नाम में चीजों को तलाशेगी.

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य / राकेश रोहित 

Saturday, 3 November 2012

मोड़ - राकेश रोहित

कविता

मोड़ 
- राकेश रोहित 

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.

देखती हैं टिमटिमाती बत्तियाँ
भौंकते हैं कुछ कुत्ते आवारा
घबराकर कोई खिड़की खुली
छोड़ देता है.

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

दम घुटता है खामोशी का इस मोड़ पर
मोड़ भी कुछ कम नहीं परेशान है
मरने से पहले कोई करता है क्या बयान
कि शेष रह जाती उसकी पहचान है!

यूँ तो यह मोड़ भी रहता नहीं खामोश है
है जारी भारी चहल-पहल
महलों का पहरा ठोस है.

पर कोई-ना कोई
यह किस्सा तो जोड़ देता है
हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

मोड़ / राकेश रोहित 


Thursday, 11 October 2012

ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं - राकेश रोहित

कविता 

ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं 
- राकेश रोहित 

हर रोज नया कुछ सीखता हूँ मैं
हर दिन बढ़ता है कुछ ज्ञान
ओ ईश्वर! मैं क्या करूं इतने ज्ञान का
हर दिन कुछ और कठिन होता जाता है जीवन.

पत्तों की तरह सोख सकूँ
धूप, हवा और चाँदनी
फूल की तरह खिलूँ
रंगों की ऊर्जा से भरा.

पकूं एक दिन फल की तरह
गंध के संसार में
फैल जाऊं बीज की तरह
अनंत के विस्तार में.

हरियाली की तरह बिखरा रहूँ
सृष्टि के समवाय में
ना कि ज्ञान की तरह
अपूर्ण, असहाय मैं!

हरसिंगार / राकेश रोहित 

Saturday, 14 July 2012

मेरे अंदर एक गुस्सा है... / राकेश रोहित


मेरे अंदर एक गुस्सा है...
- राकेश रोहित

मेरे अंदर एक गुस्सा है,   गुस्से को दबाये बैठा हूँ
मैं जिस गम के दरिया में डूबा हूँ, उस गम को भुलाये बैठा हूँ.

लहरों ने साहिल पर तोड़ दिये, घरौंदे कितने बचपन के
इन लहरों से मैं सपने की उम्मीद लगाये बैठा हूँ.

दुनिया अनजानी हँसती थी - मंजिल का पता भी भूल गये?
वो क्या जाने मैं कागज की कश्ती बचपन से बनाये बैठा हूँ.

वो रात बड़ी अंधियारी थी, जब तुम आये मेरे घर में
तब से आंगन में सौ-सौ दीपक यादों के जलाये बैठा हूँ.

एक जंग जैसे है दुनिया, एक दिन जीता एक दिन हारा
कुछ मन में छुपाये बैठा हूँ, कुछ सब को बताए बैठा हूँ.


कुछ मन में छुपाये बैठा हूँकुछ सब को बताए बैठा हूँ / राकेश रोहित 

Monday, 7 May 2012

जब बाज़ार में आया प्यार - राकेश रोहित


कविता
जब बाज़ार में आया प्यार
- राकेश रोहित

बाज़ार बेचता है प्यार,
पल-पल बढते हैं खरीदार.
जिसको जैसी हो दरकार,
वैसी ले जायें सरकार!

अगर आपका मन सूना है
तो आपने सही क्षण चुना है
एंड ऑफ सीजनका सेल है,
ऑफर  की है यहाँ भरमार!

बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.

टेडी बीयर या लाल गुलाब
इस प्यार का नहीं जवाब!
बंद पाकेट में, शाकप्रूफ है
देखें कितना सुंदर रूप है!!

जैसी कीमत वैसे रंग,
सदा चलेगा आपके संग.
चाभी के छल्ले में प्यार,
देख हुआ मैं चकित यार!

बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.

बेस्ट बिफोरकी तारीख के साथ
चाकलेट के डब्बे में प्यार,
पोर्सलीन की यह हसीना 
आपको अपलक रही निहार.

सुंदर 'एसएमएस-बुक' है
आपके दिल का है इजहार,
अपनी आँखें हमें दीजिये
हम कर आयेंगे चार!

जब बाज़ार में आया प्यार
हमने देखे रंग हजार!
बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.


जब बाज़ार में आया प्यार / राकेश रोहित

Sunday, 1 April 2012

कविता के अभयारण्य में - राकेश रोहित


कविता 
कविता के अभयारण्य में
- राकेश रोहित

जब कुछ नहीं रहेगा 
क्या रहेगा?
मैं पूछता हूँ बार-बार 
भरकर मन में चिंता अपार
कोई नहीं सुनता...
मैं पूछता हूँ बार-बार.

लोग हँसते हैं 
शायद सुनकर
शायद मेरी बेचैनी पर 
उनकी हँसी में मेरा डर है-
जब कुछ नहीं रहेगा 
क्या रहेगा?

नहीं रहेगा सुख 
दुःख भी नहीं 
नहीं रहेगी आत्मा,
जब नहीं रहेगा कुछ 
नहीं रहेगा भय.

कोई नहीं कहता रोककर मुझे
मेरा भय अकारण है 
कि नष्ट होकर भी रह जायेगा कुछ 
मैं बार-बार लौटता हूँ 
कविता के अभयारण्य में 
जैसे मेरी जड़ें वहाँ हैं.

मित्रों, मैं कविता नहीं करता 
मैं खुद से लड़ता हूँ -
जब नहीं रहेगा कुछ 
क्या रहेगा?

कविता के अभयारण्य में /राकेश रोहित 

Saturday, 3 March 2012

सोयी हुई स्त्री, कविता में - राकेश रोहित


कविता
सोयी हुई स्त्री, कविता में 
- राकेश रोहित

दोस्तों गजब हुआ,  यह अल्लसबेरे...
मैंने पढ़ी एक कविता स्त्रियों के बारे में. 
कविता थी पर सच-सा उसका बयान था,
कविता सोयी हुई स्त्रियों के बारे में थी.

सोये हुए के बारे में बात करना अक्सर आसान होता है
क्योंकि एक स्वतंत्रता-सी रहती है
कथ्य बयानी में,
पता नहीं कवि को इसका कितना ध्यान था
पर कविता में नींद का सुंदर रुमान था.

बात सोये होने की थी
समय सुबह का था
अचरज नहीं कविता में एक स्वप्न का भान था.
मैं पढ़कर चकित होता था
पर यह तय नहीं था कि मैं जगा था.

सुबह-सवेरे देखे  गए सपने की तरह
कविता का अहसास  मेरे मन में है
पर सोचकर यह बार-बार बेचैन होता हूँ -
सोयी हुई स्त्री जब कविता में आती है 
तो क्या उसकी नींद टूट जाती है?

सोयी हुई स्त्री, कविता में / राकेश रोहित

Wednesday, 15 February 2012

पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम - राकेश रोहित


कविता 
पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम
 - राकेश रोहित 

सर्द रातों में
ठंडे पानी के स्पर्श लगता है
जैसे छू रहा हूँ हिमनद से आया बर्फीला जल
जो हजारों वर्ष पहले
बहकर आया होगा किसी नदी में
और फिर बहता ही रहा होगा.

ऐसी छूती है ठंडी हवा
जैसे दक्षिणी ध्रुव से बहकर आयी हवा
पहली बार छू रही होगी
किसी आदिम मानव को.

जैसे पिछली सर्दियों में
हड्डियों के बीच
बची रह गयी सिहरन जाग रही है
वैसे कांपता हूँ इन सर्दियों में.

ऐसे लहकती है आग
इस सर्द रात में
जैसे हमारे पूर्वजों के सांसों की
ऊष्मा भरी है उसमें.

ऐसे नहीं आया यह मिट्टी सना आलू
इसकी मिट्टी में अब भी
उनके  पैरों की छाप है
जो ओस भरी सुबहों में
तलाश लाए थे इसे
हरे पत्तों की जड़ों के नीचे.

भुनता है आलू तो
याद उन्हीं की आती है
जो तलाश लाए होंगे
पहली बार
पत्थरों में छिपी आग.

सूरज से नहीं
वीराने में अंधड की तरह भटकती हवा से नहीं
पहाड़ों पर पिघल रहे ग्लेशियर से नहीं और
नियम की तरह अनवरत घूमती धरती से नहीं
हमसे रचा गया है यह मौसम.

पहले हम हुए,
फिर हुआ मौसम.

पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम / राकेश रोहित