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Sunday, 7 October 2018

पत्थर के नीचे दुःख - राकेश रोहित

बोध कथा
पत्थर के नीचे दुःख
- राकेश रोहित

तेज धूप में वहीं थोड़ी छांह थी।

बेटे ने पत्थरों को उठाकर एक जगह रखकर बैठने की जगह बनाने की सोची कि बाप ने बरजा-
"नहीं, नहीं पत्थर मत उठाना उसके नीचे कोई दुख होगा।"

बेटा तब तक पत्थर उठा चुका था और उसके नीचे से एक गहरे काले रंग का बिच्छू निकल कर पेड़ की तरफ भागा।

बेटे ने हड़बड़ाकर उसे रख दिया और दूसरा पत्थर उठाते हुए पूछा-
"पिता इसके अंदर भी दुख होगा?"

"बिच्छू भी हो सकता है।"
बाप ने कहा और चुपचाप गहरी सांस लेता हुआ जमीन पर बैठ गया।


पत्थर के नीचे दुःख 

Sunday, 24 January 2016

पानी – राकेश रोहित

लघुकथा
पानी 
– राकेश रोहित

"पानी पी लूँ?" उसने विनम्रता से पूछा।
"पानी के लिए पूछते हैं! पीने के लिए ही तो रखा है। जरूर पीजिए!" कहते हुए वे थोड़ा गर्व से भर गये। "यही तो हमारी सभ्यता- संस्कृति है। पानी हम सबको पिलाते हैं। अरे हमारे गांव में तो...! " उन्होंने एक लंबी कहानी शुरू की।
पानी पीकर पीने वाले ने राहत की सांस ली और कृतज्ञता से कहा- "धन्यवाद साहब, बहुत जोर की प्यास लगी थी।"
उनकी कहानी जारी थी। पीने वाला सलाम कर चला गया।
उसके जाते ही उन्होंने मुँह में चुभल रहा मसाला कोने में थूका और मेज के ड्राअर से मिनरल वाटर की बोतल निकाल कर पानी पीने लगे।
"गट- गट- गट!"
उनके चेहरे पर तृप्ति साफ दिख रही थी।

पानी / राकेश रोहित

Tuesday, 10 November 2015

सुमन प्रसून - राकेश रोहित

कविता
सुमन प्रसून
- राकेश रोहित

सुमन प्रसून को
क्या सिर्फ कविताओं से जाना जा सकता है
जिसके नीचे लिखा होता है उसका नाम
या कविता पाठ के समय
उसकी उन आँखों को भी पढ़ना होगा
जो ऐसे डबडबाई रहती हैं
जैसे दो छिपली भर जल हो
और उनमें डूब रहा हो चाँद
उदास!

सुमन प्रसून क्या तुम सुनती हो
कभी अपनी ही आवाज?
जहाँ तुम्हारे खुशरंग शब्द भी
अपनी उदासी छुपा नहीं पाते
और ऐसे थरथराते हैं
जैसे बंसवारी में सीटी बजाती गुजर गयी हो हवा
किसी एकांत शाम में किसी अधूरे गीत की तरह
जैसे एक स्वर धीरे- धीरे मन के अंदर फैल गया है
और हम अपने अंदर ही
कोई बंद पड़ी किताब पढ़ रहे हैं!

एक दिन जब दुख का रंग थोड़ा अधिक हरा था
और पृथ्वी गुन रही थी कोई धुन अपने मन में
हवा वीराने में बेसबब भटक रही थी
और एक बेचैन पुकार के बाद भी
गूंजती रह जाती थी अनाम चिड़िया की आवाज
मैने उसे देखा प्राथमिक रंगों से रंगे दृश्य की तरह
ठीक अपने पास के समय से गुजर जाते हुए
क्या वह सुमन प्रसून थी?
क्या उसे पुकार कर उसे जाना जा सकता है?

चित्र / के. रवीन्द्र

Sunday, 18 October 2015

बड़ी बात छोटी बात - राकेश रोहित

कविता
बड़ी बात छोटी बात 
- राकेश रोहित

उसने कहा हमेशा बड़ी बातें कहो
छोटी बातें लोग नकार देंगे
जैसे कहो आकाश से नदियों की होती है बारिश
कि यह जो तुम्हारी आँखों का अंधेरा है
दरअसल वह एक घना जंगल है
कि एक दिन हाथी चुरा ले जाते हैं फूलों की खुशबू
कि संसार की सबसे खूबसूरत लड़की
तुमसे प्यार करती है।

पर इतना बड़ा कुछ नहीं
मुझे कहनी थी कुछ छोटी बात
कि जैसे जब हिल रहे थे पहाड़
तो निष्कंप रही घास की एक पत्ती
कि सारी नदी बह गयी पर एक तिनका
अपनी जगह डोलता रहा
मेरे डूबने के इंतजार में
कि एक छोटा सा दुख लेकर
मैं तुम्हारे जीवन के सबसे छोटे क्षण की
प्रतीक्षा करता रहा
कि इच्छाओं से भरे इस संसार में
मुझे चूमनी थी
ठीक तुम्हारे आँखों के पास वाली वह जगह
जहाँ हर बार एक आँसू आकर
ठिठक जाया करता है।

माफ करना
मैं बड़ी बात कहने से हमेशा डरता रहा
इसलिए कह नहीं पाया कभी
मैं तुमसे प्यार करता हूँ!

(उसी कविता का एक असंलग्न हिस्सा है!)

पर कुछ छोटी बातें कह सकता हूँ तुमसे
जैसे कि मैंने एक कविता लिखी है तुम्हारे लिए!

बड़ी  बात  छोटी बात / राकेश रोहित

Friday, 16 October 2015

एक दिन - राकेश रोहित

कविता
एक दिन
- राकेश रोहित

सीधा चलता मनुष्य
एक दिन जान जाता है कि
धरती गोल है
कि अंधेरे ने ढक रखा है रोशनी को
कि अनावृत है सभ्यता की देह
कि जो घर लौटे वे रास्ता भूल गये थे!

डिग जाता है एक दिन
सच पर आखिरी भरोसा
सूख जाती है एक दिन
आंखों में बचायी नमी
उदासी के चेहरे पर सजा
खिलखिलाहट का मेकअप धुलता है एक दिन
तो मिलती है थोड़े संकोच से
आकर जिंदगी गले!

अंधेरे ब्रह्मांड में दौड़ रही है पृथ्वी
और हम तय कर रहे थे
अपनी यात्राओं की दिशा
यह खेल चलती रेलगाड़ी में हजारों बच्चे
रोज खेलते हैं
और रोज अनजाने प्लेटफार्म पर उतर कर
पूछते हैं क्या यहीं आना था हमको?

इस सृष्टि का सबसे बड़ा भय है
कि एक दिन सबसे तेज चलता आदमी
भीड़ भरी सड़क के
बीचोंबीच खड़ा होकर पुकारेगा-
भाइयों मैं सचमुच भूल गया हूँ
कि मुझे जाना कहाँ है?

चित्र / के. रवीन्द्र 

Sunday, 11 October 2015

कवि का झोला - राकेश रोहित

कविता
कवि का झोला
- राकेश रोहित

कवि के झोले में क्या है?
हर फोटो में साथ रहा
कवि के कांधे पर टंगा वह
खादी का झोला।
कवि के झोले में क्या है!

बहुत कुछ है, अबूझ है
असमझा है
प्रकट से अलग
कुछ गैरजरूरी
कुछ खतो किताबत
कुछ मुचड़े कागज
कुछ अधूरी
अनलिखी कविताएँ!
कवि के झोले में जादू है।

दुनिया विस्मय से देखती है झोले को
विस्मय से कवि देखता है
दुनिया को
जो झोले से बाहर है।

एक दिन जब खूब बज रही थी तालियाँ
कविता पढ़ता हुआ कवि खामोश हो गया
उसे अचानक अपनी चार पंक्तियाँ याद आ रही थी
जो झोले में रखे किसी कागज पर लिखी थी
और जिसे उसने कभी नहीं सुनाया!

दुनिया को खबर नहीं है
जो कवि की कविता में नहीं है
वह कवि के झोले में है!

क्या तुम अपने झोले से बहुत प्यार करते हो कवि?
जब कभी आप पूछेंगे
आपको कवि का आत्मालाप सुनाई देगा!


कवि का झोला / राकेश रोहित 

Saturday, 4 July 2015

अँधेरी खिड़कियों के अंदर का अँधेरा - राकेश रोहित

पुस्तक समीक्षा / पहला उपन्यास

अँधेरी खिड़कियों के अंदर का अँधेरा
- राकेश रोहित

अनिरुद्ध उमट 

अनिरुद्ध उमट उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने अपने कथा शिल्प को लेकर एक खास पहचान बनायी है पर उनके पहले उपन्यास अँधेरी खिड़कियाँ को पढ़ने से ऐसा लगता है कि उनके रचनाकर्म की खासियत उसका शिल्प नहीं वरन वह अनछुआ कथा-क्षेत्र है जो उनकी रचनात्मकता की पहचान भी है और उसकी ताकत भी विवाह की दैविक अवधारणा को धवस्त कर स्त्री पुरूष को उनकी स्वतंत्र इयत्ता में देखने के अर्थों में यह उपन्यास बोल्ड नहीं है क्योंकि यह विवाह को एक सामाजिक संविदा की तरह स्वीकार करने के उपरांत, सपना और यथार्थ की द्वंद्वात्मकता की पड़ताल करता है

अँधेरी खिड़कियाँ में लेखक ने गोरी मेम का एक रूपक रचा है जो प्यार की दैहिक अभिव्यक्ति है यह एक ऐसा सपना है जो बुढिया और उसके पति दोनों को अपनी जकड़न में लिए है एक तरफ बुढिया का पति उसकी तरफ पीठ कर सोते हुए गोरी मेम की तस्वीर और उसके साथ स्वीमिंग पूल में नहाने का सपना देखते मर जाता है तो दूसरी तरफ बुढिया अपने बूढ़े कंठ में बिसरा दी गयी चहक से याद करती है कि उसकी माँ उसे गोरी मेम कहा करती थी और फिर अपने पति के मरने के बाद वही बुढिया सोचती है कि उसके पति दरअसल गोरी मेम को भी नहीं चाहते थे, वे जानते ही नहीं थे कि उनका चाहना क्या है? बुढिया अंत तक यकीन करना चाहती है कि मरने से एक दिन पहले उसके पति उससे छुपकर उसी की तस्वीर देख रहे थे क्योंकि उन्हें हर काम छुप-छुप कर करने की आदत थी इच्छाओं के भटकाव के बीच यह एक भोली आशा और प्यार को पाने की ललक ही है कि पति के पीठ कर सोने के बाद वह बुढिया भी एक करवट सोती रही ताकि कभी वे अपना चेहरा उसकी ओर करें तो उन्हें उसकी पीठ न मिले कंडीशनिंग की इस प्रक्रिया से बुढिया तभी मुक्त होती है जब उसका पुराना प्रेमी उसकी तलाश करता आता है जिसे वह अब भी गोरी मेम लगती है और इस तरह एक स्त्री के रूप में वह फिर रिड्यूस ही होती है जबकि उस प्रेमी की पत्नी यह पूछते-पूछते मरती है कि क्या सचमुच कोई गोरी मेम की तरह लगती है?

इस तरह समाज की अँधेरी खिड़कियों का जो अँधेरा है वह भयानक और अराजक है जहां एक बुढिया की अदम्य वासना और अतृप्त कामना के जरिए उन स्थितयों की पहचान की गई है जो इनकी कारक हैं और लेखक के मैं का भटकाव इसी सन्दर्भ में है बुढिया अपनी देह में इस तरह घिरी है कि अपने अस्तित्व की पहचान खो बैठी है और अपने भटकाव में इस तरह उलझी है कि वह लेखक से जानना चाहती है कि आधी रात के बाद उसके घर से जो रोने की आवाज आती है वह उसी की है या किसी और की? बुढिया के लिए यह अनस्तित्व से अस्तित्व की यात्रा है, और वह अपनी देह से तभी मुक्त होती है जब वह जान पाती है कि वह गोरी मेम नहीं है विवाह रूपी संस्था में पवित्रता और अराजकता के बीच के अवकाश में प्रेम और वासना के द्वंद्व और उससे जूझ रहे स्त्री-पुरूष की तड़प और खासकर स्त्री की अपनी पहचान की बेचैनी को यह उपन्यास बहुत निर्मम तरीके से सामने रखता है

उपन्यास की बुढिया का चरित्र स्मरणीय है और इन अर्थों में सम्पूर्ण कि अन्य  सारे पात्र उसी के चरित्र से अपनी ऊर्जा ग्रहण करते हैं कहानी कहीं-न-कहीं वह और वे में उलझ जाती है कथ्य की जरूरत से परे जाकर भी जटिलता के प्रति रूझान कई बार कथ्य के विस्तार को बाधित और उसकी संभावना को क्षरित करता है कुछ शब्दों के प्रति लेखक का मोह स्पष्ट झलकता है जैसे पूरे उपन्यास में रोना हे मुक्ति है के अर्थों में गला फाड़ने का प्रयोग सौ से भी अधिक बार हुआ है और यह पढ़ते वक्त बहत खटकता है कुल मिलाकर अँधेरी खिड़कियों के अंदर के अँधेरे की दास्तान को जानने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना चाहिए  



पुस्तक परिचय: 
उपन्यास/अनिरुद्ध उमट 
कवि प्रकाशन,
लखोटियों का चौक 
बीकानेर - 334 005
प्रथम संस्करण: 1998
मूल्य: 90 रूपये 

Monday, 1 June 2015

घास हरी नहीं है - राकेश रोहित

कविता
घास हरी नहीं है
- राकेश रोहित

घास हरी नहीं है
उसने कहा।
अगली बार उसने जोर दे कर कहा 
घास हरी नहीं है
वस्तुतः यह पीली हो चुकी है।

यह सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं है
यह हमारे सौन्दर्य बोध से भी जुड़ा है
कि हरी होनी चाहिए घास,
उसने फिर कहा
फिर- फिर कहा!

मैंने एक दिन उसे समझाना चाहा
हाँ पीली पड़ गयी है घास 
और पीले पड़ गये हैं फूल भी
इतनी गर्म है हवा 
कि कुम्हला गये हैं पत्ते 
यह बहुत कठिन दिन है 
उनके लिए जो छांव में नहीं हैं।
हाँ, उसने संयत स्वर में कहा इस बार- 
और यह भी देखिए कि घास भी हरी नहीं है!

हे भाई! 
मैंने उसका कंधा पकड़ झकझोरा 
यह घास हर बार 
आपकी दाढ़ी से तिनके की तरह क्यों अटक जाता है?
बस घास है कि आप हैं
हाँ हरी नहीं है घास
पर यह भी तो देखिए कि खतरे में है हरापन
कि तितलियों के घर उजड़ रहे हैं
कि ओस के अटकने की कोई ओट नहीं बची!
आप हर बार एक ही बात क्यों कहते हैं
कि घास हरी नहीं है?

इस बार मेरी चौंकने की बारी थी
वह फुसफुसा रहा था 
जैसे भय से भरा था,
मैं कहता हूँ कि घास हरी नहीं है
क्योंकि मैं कहना चाहता हूँ 
कि पानी नहीं रहा!
पर आपको क्या लगता है 
मैं जिस स्वर से घास के बारे में कह सकता हूँ
क्या उसी स्वर में सवाल कर सकता हूँ 
कि पानी नहीं रहा? 
कि क्यों पानी नहीं रहा?

आपको क्या लगता है?
क्यों यह घास हरी नहीं है?

चित्र / के. रवीन्द्र 

Friday, 4 October 2013

पंचतंत्र, मेमने और बाघ - राकेश रोहित

कविता 
पंचतंत्र, मेमने और बाघ 
- राकेश रोहित

पानी की तलाश में मेमने
पंचतंत्र की कहानियों से बाहर निकल आते हैं
और हर बार पानी के हर स्रोत पर
कोई बाघ उनका इंतजार कर रहा होता है.

मेमनों के पास तर्क होते हैं,
और बाघ के पास बहाने.
मेमने हर बार नये होते हैं
और बाघ नया हो या पुराना
फर्क नहीं पड़ता.

जिसने यह कहानी लिखी
वह पहले ही जान गया था -
"मेमने अपनी प्यास के लिए मरते हैं
और ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती!"

ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती / राकेश रोहित 

Saturday, 14 July 2012

मेरे अंदर एक गुस्सा है... / राकेश रोहित


मेरे अंदर एक गुस्सा है...
- राकेश रोहित

मेरे अंदर एक गुस्सा है,   गुस्से को दबाये बैठा हूँ
मैं जिस गम के दरिया में डूबा हूँ, उस गम को भुलाये बैठा हूँ.

लहरों ने साहिल पर तोड़ दिये, घरौंदे कितने बचपन के
इन लहरों से मैं सपने की उम्मीद लगाये बैठा हूँ.

दुनिया अनजानी हँसती थी - मंजिल का पता भी भूल गये?
वो क्या जाने मैं कागज की कश्ती बचपन से बनाये बैठा हूँ.

वो रात बड़ी अंधियारी थी, जब तुम आये मेरे घर में
तब से आंगन में सौ-सौ दीपक यादों के जलाये बैठा हूँ.

एक जंग जैसे है दुनिया, एक दिन जीता एक दिन हारा
कुछ मन में छुपाये बैठा हूँ, कुछ सब को बताए बैठा हूँ.


कुछ मन में छुपाये बैठा हूँकुछ सब को बताए बैठा हूँ / राकेश रोहित 

Sunday, 24 October 2010

संप्रेषण - राकेश रोहित

लघुकथा
                              
                                                               संप्रेषण
                                                               
                                                                    - राकेश रोहित 


        परदे पर कोई  भावप्रवण दृश्य चल रहा था. वह भावातिरेक में बुदबुदाया, " सिनेमा संप्रेषण का सशक्त माध्यम साबित हो सकता है." अचानक इंटरवल हो गया. परदे पर एक रील चमकने लगी- " धूम्रपान निषेध." और वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके सिगरेट के धुंए से मुझे खांसी हो रही थी. ooo

आँसू - राकेश रोहित

लघुकथा 

                              आँसू 
                                                                  
                                                                     - राकेश रोहित

         वह शायर नहीं था, पर उसकी झील- सी आँखों में डूब गया. ... और उसकी झील- सी आँखें समंदर बन गईं, जिनसे हर वक्त नमक रिसता रहा.  ooo

संतुलन - राकेश रोहित

लघुकथा 
                                          
                              संतुलन 
                                                                   
                                                               - राकेश रोहित

        लड़की के पांव में जन्म से कुछ लंगड़ापन था. डॉक्टर ने कहा - ठीक हो सकता है, पर खर्च काफी होगा. पिता ने कुछ सोचा, घर के अर्थ-संतुलन के बारे में और धूम-धाम से उसकी शादी कर दी. शादी तो करनी ही थी. अब लड़के वाले पांव का इलाज खुद करवा लेंगे.

        एक दिन लड़की चूल्हे के पास अपना संतुलन  संभाल न सकने के कारण गिर पड़ी और.... ooo

खुशबू - राकेश रोहित

 लघुकथा
              खुशबू
                                                                  - राकेश रोहित 


        "मुझे कल गांव जाना होगा," मैंने अपनी पत्नी को सूचना दी.
        "क्यों ? अभी पिछले सप्ताह तो गए थे."
        "हां, पत्रिका के कवर के लिए फूलों के कुछ स्नैप - शॉट लेने हैं."
       "तो, फूलों के लिए गांव जाओगे! मिस डिसूजा के पास तो एक-से-एक प्लास्टिक के फूल हैं - बिल्कुल असली दीखते हैं."
        "हां ठीक ही तो है, तस्वीर से कौन-सी खुशबू आनी है."- मैंने खुद को समझाया जैसे. ooo 

Saturday, 16 October 2010

सात आदमी को छूओ - राकेश रोहित

लघुकथा 
                             सात आदमी को छूओ 
                                                                         - राकेश रोहित 

        यह प्रार्थना का समय था. स्कूलों की घंटियां बज चुकी थीं और बच्चे कतार में खड़े थे. मैंने उन्हें देखा. और मुझे वितृष्णा हुई उस भाव के प्रति जिसमें दुनिया को बचा लेने की गंध थी. तभी मेरे सामने एक छोटा बच्चा आ गया; दबे कदम, धीरे-धीरे. और प्रार्थना होती देख वह असहज हो गया. उसका चेहरा परेशान हो रहा था. वह थोड़ा हटकर एक कोने में खड़ा हो गया, जहां प्रार्थना से अलग एक बच्ची खड़ी थी. बच्ची ने अपने बस्ते को संभाला और उसे देख मुस्कराई. फिर उसने बच्चे से कुछ कहा.  बच्चे ने चौंक कर पीछे देखा, पर वहां कोई न था. बच्ची खुश हो गई. उसने अपनी नन्हीं हथेलियों से हल्की ताली बजाई और बोली - " छका दिए, सात आदमी को छूओ... सात आदमी को छूओ!"  बच्चा भी अचानक प्रसन्न हो आया था. उसे प्रायश्चित करना था - झूठ को सच समझने का, सात आदमी को छूकर. उसने बच्ची से शुरुआत की और उसे छूकर चिल्लाया- एक! फिर वह दौड़ गया. सामने दो बच्चे कांच की गोली से खेल रहे थे ... दो-तीन, उसने गिना. मैं उनके पास आ रहा था और मुझे लग रहा था जैसे मैं उसे खेल में शामिल हो गया हूँ. एक खुशी मेरे अंदर फूट रही थी. बच्चा सड़क पर इधर-उधर दौड़ रहा था. उसने कागज चुन रहे दो बच्चों को गिना. चार-पांच. अब सड़क पर कोई न था और बच्चा इधर-उधर देखता परेशान हो रहा था. मुझे लगा अब वह मुझे छूएगा और तब केवल एक की कमी रह जाएगी. मैंने अपनी चाल कम कर दी ताकि वह मुझे छू सके. तभी एक लड़का सर पर टोकरी रखे साग बेचता उधर से निकला. उसने उसे छूआ - छ:, और फिर मेरे पीछे दौड़ कर वह मुझे छू कर चिल्लाया - सात! दूर खड़ी बच्ची खिलखिलाकर हँस पडी. एक उत्फुल्लता उसके चेहरे पर थी. सात आदमी को छूओ, उसने तालियां बजाकर कहा. अब यह खेल मुझे जारी रखना था. पर मैं धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था. बच्चे धीरे से कक्षा में लौट रहे थे. और खेल का सिरा मुझ तक खिंचता-खिंचता टूट  गया था. एक खिन्नता मेरे आगे खन्न से बिथर गई थी. सामने धूप तेज हो रही थी और एक आवाज अब भी मेरे पीछे थी- सात आदमी को छूओ. ooo 

Thursday, 14 October 2010

हस्तांतरण - राकेश रोहित

लघुकथा 
                                                  हस्तांतरण 
                                                                 - राकेश रोहित 


        वर्षा के जमे पानी में मेरी नाव तैर रही  थी. मैं  उसे  देखने  में  मग्न था. तभी  पास  का  एक  बच्चा  पानी  में उछलता-कूदता आगे बढ़ा. उसने हाथ बढ़ाकर नाव को उठा लिया और किनारे लाकर फिर से तैरा  दिया. नाव तैरती रही. अब वह ताली बजकर हँस रहा था और मैं गुमसुम खड़ा था.              ooo

समझौता – राकेश रोहित

लघुकथा                                                                
                    समझौता       
                                                                  – राकेश रोहित                                

        वे लड़ते हुए अचानक ठहर गए. "यहां कोई देख लेगा," उनमें से एक ने कहा. "चलो हम मैदान में चलें."            ooo                                                                                                                                                                                                                                                                                                           

Tuesday, 12 October 2010

स्वर्ग से दूर - राकेश रोहित

लघुकथा

                                  स्वर्ग से दूर
                                                                     - राकेश रोहित

      " शादी के बारे में तुम्हारा विचार क्या है?" लड़के ने पूछा तो लड़की ने कहा, "कुछ खास नहीं. मैं इसे जरूरी नहीं समझती प्रेम के लिए."

      "अफ़सोस तुम ऐसा सोचती हो, फिर भी मैं तुमसे प्यार करता हूँ."

      "... और जब स्वप्न-स्वर्ग में उन्होंने वर्जित फल चखे तो लड़की शादी करना चाहती थी और लड़के का विचार बदल गया था!                                                                                                                         ooo

स्वप्न - राकेश रोहित

लघुकथा
                                  
                              स्वप्न 
                                                                - राकेश रोहित 

        औरत को अचानक भान हुआ, यह खूबसूरत दुनिया उसके लिए बनी है और प्रतिपल को उसको हिस्सेदारी अपेक्षित है. उसकी आँखें खुल गईं.

        पुरुष ने कहा, "प्रिये, तुम कितना सुन्दर स्वप्न देख लेती हो," और वह मुस्करा कर उसकी बांहों में सो गई. ooo