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Monday, 11 October 2010

ईश्वर ने शोक मनाया - राकेश रोहित


लघुकथा 


                             ईश्वर ने शोक मनाया 
                                                                         - राकेश रोहित

        ईश्वर ने शोक मनाया. वह ईश्वर, ईश्वर नहीं है. हमारे मोहल्ले में रहता है और हरी सब्जियां बेचता है. हम सब उसे ईश्वर से ज्यादा हरी सब्जी से जानते हैं. मैं उसे ज्यादा  नहीं जानता, पर इतना अवश्य कि ईश्वर है और हैं सब्जियां हरी-हरी. लेकिन एक शाम वह मेरे पास पहुंचा- "सब्जियां खरीद लीजिए भइया, हरी है."

      मुझे अचरज हुआ. मेरे पास कभी नहीं आता था वह. मैंने कहा- "ईश्वर तुम मुझे नहीं जानते लेकिन मेरी मजबूरी समझ सकते हो. मुझे खाना बनाना आता नहीं. पका-पकाया लाता हूँ, वही खाता  हूँ." पर वह बोले जा रहा था - "खरीद लीजिए हरी हैं. एक भी नहीं बिकीं. मोहल्ले में किसी ने नहीं खरीदा. आज मोहल्ले में शादी है.  सभी दावत में शरीक होंगे. इधर मेरी माँ मर गई है. वही बोती, वही उगाती थी सब्जियां. मैंने सोचा आज भर बेच दूं कि फिर इतनी हरी न होगी सब्जियां."

        मुझे दुःख हुआ कि उसने शोक नहीं मनाया और बेचने चला आया सब्जियां. मैंने देखा उसके चेहरे की रंगत उतर रही थी और खतरे में था  सब्जियों का हरापन. उधर चुप थे पर्यावरण विशेषज्ञ और मंत्रीगण. मैं ना करता रहा पर ईश्वर छोड़ गया मेरे घर हरी सब्जियां, फिर वह कभी पैसे लेने नहीं आया. अब भी रखी हैं वे हरी सब्जियां कि जब न होंगी सब्जियां और न होगा ईश्वर, मैं दराज से निकालूँगा सूखी भिन्डी कि कहूँगा था इसमें हरापन, कि था कभी ईश्वर! जिसने शोक मनाया. ईश्वर ने शोक मनाया. ooo

Saturday, 9 October 2010

हाय! हमें ईश्वर होना था - राकेश रोहित

कविता
हाय! हमें ईश्वर होना था
- राकेश रोहित

हाय! हमें ईश्वर होना था.
जीवन की सबसे पवित्र प्रार्थना में
अनंत बार दुहराया जाना था इसे
डूब जाना था हमें
अनवरत अभ्यर्थना के शुभ भाव में
घिर जाना था
ईश्वर की अपरिचित गंध में
महसूस करना था
हथेली में छलछलाती
श्रद्धा का रहस्य-भरा अनुभव.

सत्य के शिखर से उठती
आदिम अनुगूंज की तरह
व्याप्त होना था हमें
पर इन सबसे पहले
हाय! हमें ईश्वर होना था.

ईश्वर.
धरती के सारे शब्दों की सुंदरता है इसमें
ईश्वर!
धरती की सबसे छोटी प्रार्थना है यह
ईश्वर?
हाय, नहीं हैं जो हम.

अभिमंत्रित आहूतियों से उठती है
उसकी आसक्ति
पितरों के सुवास की धूम से रचता है
उसका चेहरा
जीवन की गरमायी में लहकती है
उसकी ऊष्मा.
वह सब कुछ होना था
हम सब में, हमारे अंदर
थोड़ा-थोड़ा ईश्वर.

सोचो तो जरा
सभ्यता की सारी स्मृतियों में
नहीं है
उनका जिक्र
हाय! जिन्हें ईश्वर होना था.
हाय! हमें ईश्वर होना था.

Sunday, 3 October 2010

लोकतंत्र में ईश्वर - राकेश रोहित

कविता

लोकतंत्र में ईश्वर

  - राकेश रोहित


एक आदमी
चूहे की तरह दौड़ता था
अन्न का एक दाना मुँह में भर लेने को विकल.
एक आदमी
केकड़े की तरह खींच रहा था
अपने जैसे दूसरे की टाँग.
एक आदमी
मेंढक की तरह उछल रहा था
कुएँ को पूरी दुनिया समझते हुए.
एक आदमी
शुतुरमुर्ग की तरह सर झुकाए
आँधी को गुज़रने दे रहा था.
एक आदमी
लोमड़ी की तरह न्योत रहा था
सारस को थाली में खाने के लिए.
एक आदमी
बंदर की तरह न्याय कर रहा था
बिल्लियों के बीच रोटी बाँटते हुए.
एक आदमी
शेर की तरह डर रहा था
कुएँ में देखकर अपनी परछाईं.
एक आदमी
टिटहरी की तरह टाँगें उठाए
आकाश को गिरने से रोक रहा था.
एक आदमी
चिड़िया की तरह उड़ रहा था
समझते हुए कि आकाश उसके पंजों के नीचे है.
एक आदमी...!

एक आदमी
जो देख रहा था दूर से यह सब,
मुस्कराता था इन मूर्खताओं को देखकर
वह ईश्वर नहीं था
हमारे ही बीच का आदमी था
जिसे जनतंत्र ने भगवान बना दिया था.