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Thursday, 23 January 2014

उम्मीद का कोई शीर्षक - राकेश रोहित

कविता
उम्मीद का कोई शीर्षक 
- राकेश रोहित

मैं नष्ट हो रही दुनिया से

एक सहमा हुआ शब्द उठाता हूँ
मैं उसे अपनी सबसे प्यारी कविता में
बची रहने की इच्छा के साथ टांक देता हूँ.


हर असंभव के विरुद्ध एक जुगत की तरह
मैं आसमान को रंग-बिरंगी पतंगों से भर देना चाहता हूँ.



इस नश्वर दुनिया में एक हठ की तरह
मैं हर बार बचा लाता हूँ -
कविता के लिए उम्मीद का कोई शीर्षक!

उम्मीद का कोई शीर्षक / राकेश रोहित 

Saturday, 9 October 2010

ईश्वर का सच - राकेश रोहित

कविता
ईश्वर का सच
- राकेश रोहित

मैं समझता हूँ ईश्वर का सच
दुहराई गई कथाओं से सराबोर है
और जो बार-बार चमकता है
आत्मा में ईश्वर
वह केवल आत्मा का होना है.

जीवन के सबसे बेहतर क्षणों में
जब भार नहीं लगता
जीवन का दिन-दिन
और स्वप्नों को डंसती नहीं
अधूरी कामनाएं
तब भी मेरा स्वीकार
आरंभ होता है वैदिक संशय से
अगर अस्तित्वमान है ईश्वर
धरती पर देह धारण कर....

मैं समझता हूँ
सृष्टि की तमाम अँधेरी घाटियों में
केवल
सूनी सभ्यताओं की लकीरें हैं
कि जहां नहीं जाती कविता
वहां कोई नहीं जाता.
सारी प्रार्थनाओं से केवल
आलोकित होते हैं शब्द
कि ईश्वर का सच
ईश्वर को याद कर ईश्वर हो जाना है.