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Saturday, 2 January 2016

वृक्ष के सपने में उड़ान है - राकेश रोहित

कविता
वृक्ष के सपने में उड़ान है
- राकेश रोहित

वह इतनी अकेली थी सफर में
कि वृक्ष के नीचे खड़ी हो गयी
वृक्ष ने उसे देखा और हरा हो गया!

उसके मन में दुख था
सो झरे कुछ पत्ते
और दुख से पीले पड़ गये!

कहना था उसको
सो गाने लगा पेड़
और घर लौटीं चिड़ियाएं संग संगीत लेकर!

वह रो रही थी
तो वृक्ष ने डाल दी चादर अंधेरे की
जड़ों में भरते रहे उसके आंसू और वह वृक्ष हो गयी!

सुंदर सुबहों में वह हँसती चिड़ियाओं के साथ उठी
उसने विस्तृत नभ में फैलाए अपने हाथ
पर निश्चल जड़ों ने रोक लिया उसे!

वह अब वृक्ष थी
वह सफर का सपना देखती थी
और तेज हवाओं संग उड़ जाना चाहती थी!

वृक्ष के सपने में उड़ान है / राकेश रोहित 

Wednesday, 16 September 2015

कवि, पहाड़, सुई और गिलहरियां - राकेश रोहित

कविता
कवि, पहाड़, सुई और गिलहरियां
- राकेश रोहित

पहाड़ पर कवि घिस रहा है
सुई की देह
आवाज से टूट जाती है
गिलहरियों की नींद!

पहाड़ घिसता हुआ कवि
गाता है हरियाली का गीत
और पहाड़ चमकने लगता है आईने जैसा!

फिर पहाड़ से फिसल कर गिरती हैं गिलहरियां
वे सीधे कवि की नींद में आती हैं
और निद्रा में डूबे कवि से पूछती हैं
सुनो कवि तुम्हारी सुई कहाँ है?

बहुत दिनों बाद उस दिन
कवि को पहाड़ का सपना आता है
पर सपने में नहीं होती है सुई!

आप जानते हैं गिलहरियां
मिट्टी में क्या तलाशती रहती हैं?
कवि को लगता है वे सुई की तलाश में हैं
मैं नहीं मानता
सुई तो सपने में गुम हुई थी
और कोई कैसे घिस सकता है सुई से पहाड़?

पर जब भी मैं कोई चमकीला पहाड़ देखता हूँ
मुझे लगता है कोई इसे सुई से घिस रहा है
और फिसल कर गिर रही हैं गिलहरियां!
मैं हर बार कान लगाकर सुनना चाहता हूँ
शायद कोई गा रहा हो हरियाली का गीत
और गढ़ रहा हो सीढ़ियाँ
पहाड़ की देह पर!

गिलहरियां अपनी देह घिस रही हैं पहाड़ पर
और कवि एक सपने के इंतजार में है!

चित्र / राकेश रोहित 

Saturday, 1 August 2015

मुझे ले चल पार - राकेश रोहित

कविता
मुझे ले चल पार
- राकेश रोहित

नाव देखते ही लगता है
जैसे हम डूब गए होते अगर यह नाव नहीं होती
डगमग डोलती है नाव
और संग डोलता है मन
स्मृतियों की एक नदी
में धप्प गिरता है माटी का एक चक्खान
धीरे- धीरे भीगता है सूखी आँखों का कोर!

नाव में शायद हमारे पूर्वजों की स्मृतियां हैं
जब किसी अंधेरी रात वे किनारों की तलाश में थे
और गरज रहा था घन घनघोर
और तभी कोई डर समा गया था
उनके गुणसूत्रों में
और जिसे लेकर पैदा हुई संततियां
जिसे लेकर पैदा हुए हम!
और अब भी नाव को तब देखिए
जब कोई नहीं देख रहा हो
तो ऐसा लगता है कोई बुला रहा है हमें
पूछ रहा है कानों में
जाना है उस पार?

वे सारे मांझी गीत
जिनमें प्रीतम की पुकार है-
जाना है उस पार!
हमें इतना विकल क्यों कर देते हैं
जैसे हाथ से छूट रहा हो प्रेम
कि लहरों के बीच कठिन है जीवन
कि जैसे उस पार कोई सदियों से इंतजार कर रहा है
और जल में डोल रही है
चंचल मन सी नाव!

पहली बार नाव बनाकर
मेरे ही किसी पूर्वज ने देखा होगा स्वप्न
इस अथाह अंधेरे और अतल जल के पार जाने का
और पहली बार उसने गाया होगा गीत
इस निर्जनता के विरुद्ध
किसी खोये प्यार को पा लेने का!
क्या वही पुकार गूंज रही है मेरे अंदर?
क्या वही मन मेरे अंदर कांप रहा है
मेरे थिर शरीर में?

हवा जो छू रही है मुझे
पहले भी इसने छूआ था किसी को
यहीं कहीं इस नीरव में
उसका डर, उसकी सिसकियां
उसका आर्तनाद
सब कुछ कोई भरता है मेरे कानों में!
इस विशाल विश्व के अंधेरे में
बस प्रेम के किसी हारे मन की पुकार गूंज रही है
जैसे डोलता है दीपक अकेला
नाव की छत पर टंगा
जैसे ब्रह्मांड के सूनेपन में
अकेली धरती घूम रही है।
जब सब चुप हैं
मुझको सुना रहा है कोई
अपने मन का छुपा हुआ डर
छूटती है बरसों की दबी रूलाई
जब पुकारता हूँ
मुझे ले चल पार!

मुझे ले चल पार!

मुझे ले चल पार / राकेश रोहित 

Wednesday, 22 July 2015

पीले फूल और फुलचुही चिड़िया - राकेश रोहित

कविता
पीले फूल और फुलचुही चिड़िया
- राकेश रोहित

वो आँखें जो समय के पार देखती हैं
मैं उन आँखों में देखता हूँ।
उसमें बेशुमार फूल खिले हैं
पीले रंग के
और लंबी चोंच वाली एक फुलचुही चिड़िया
उड़ रही है बेफिक्र उन फूलों के बीच।

सपने की तरह सजे इस दृश्य में
कैनवस सा चमकता है रंग
और धूप की तरह खिले फूलों के बीच
संगीत की तरह गूंजती है
चिड़िया की उड़ान
पर उसमें नहीं दिखता कोई मनुष्य!
सृष्टि के पुनःसृजन की संभावना सा
दिखता है जो स्वप्न इस कठिन समय में
उसमें नहीं दिखता कोई मनुष्य!

दुनिया के सारे मनुष्य कहाँ गये
कोई नहीं बताता?
झपक जाती हैं थकी आँखें
और जो जानते हैं समय के पार का सच
वे खामोश हो जाते हैं इस सवाल पर।
सुना है
कभी- कभी वे उठकर रोते हैं आधी रात
और अंधेरे में दिवाल से सट कर बुदबुदाते हैं
हमें तो अब भी नहीं दिखता कोई मनुष्य
जब नन्हीं चिड़ियों के पास फूल नहीं है
और नहीं है फूलों के पास पीला रंग!

इसलिए धरती पर
जब भी मुझे दिखता है पीला फूल
मुझे दुनिया एक जादू की तरह लगती है।
इसलिए मैं चाहता हूँ
सपने देखने वाली आँखों में
दिखती रहे हमेशा फुलचुही चिड़िया
फूलों के बीच
ढेर सारे पीले फूलों के बीच।

पीले फूल और फुलचुही चिड़िया / राकेश रोहित

Thursday, 9 July 2015

कविता नहीं यह - राकेश रोहित

कविता 
कविता नहीं यह
- राकेश रोहित 

मेरे पास नहीं हैं उतनी कविताएँ 
जितने धरती पर अनदेखे अनजाने फूल हैं
आकाश में न गिने गये तारे हैं 
और हैं जीवन में अनगिन दुख!

लौट आता हूँ रोज मैं अपनी भाषा में
तलाशता हुए तुम्हें ऐ मेरी खोई हुई आत्मा
निहारता हूँ परिधान बदलते सच को
निरखता हूँ कैसा है उसका अनिर्वचनीय रूप!

उत्सव करते हैं सूखे फूल और जीर्ण पात
हर बार कहने से रह जाती है भीगे मन की बात
हमने हथेलियों पर बर्फ को पिघलते देखा है 
फिर कौन सदियों की जमी बर्फ के पार से पुकारता है
कि मैं सुनता हूँ उसको
उस तक मेरी आवाज नहीं पहुंचती!

इन अनगिन अनजानी आकाशगंगाओं में 
कोई सृष्टि हमारे स्पर्श की प्रतीक्षा में है 
और हमारी इस दुनिया में कोई सच
अभिव्यक्त होने की बेचैनी से भरा है।

हर पल खिलता कोई फूल
हर दिन जनमता कोई बच्चा
यही कहता है 
हर मौसम- बेमौसम में रंग की तरह खिलो
और भाषाहीन इस दुनिया में निश्शब्द न मिलो!

चित्र / के. रवीन्द्र 

Wednesday, 22 April 2015

लौटने की जगह - राकेश रोहित

कविता
लौटने की जगह
- राकेश रोहित 

जीवन के कुछ बारीक सत्य
हमारे अंदर ही छुपे हुए हमारे दुख थे
जिन्हें हम धूप दिखाने से डरते रहे
और प्रार्थना में रूंधता रहा हमारा गला।

एक दिन सुंदर नृत्य की समाप्ति पर
तालियाँ बजाते हुए हम रो पड़े
कैसे नचाती रही जिंदगी
और दर्शनातुर लोग देखते रहे यह खेल!

जब लौटने की इच्छा बेधती है हृदय
नहीं बची है लौटने की जगह
कितनी प्रार्थनाओं में पृथ्वी
चाहा था मैंने तुम्हें
अपने पैरों के ठीक नीचे
किसी पुरातन भरोसे की तरह!

कैसे हम अंधेरे में गुम हुई इच्छाएं हैं!
और कैसे चाह का चँवर
डुलता है किसी के सर पर?
कैसे इस अपरिमित जगत में
जीवन पूछता है
मेरी जगह कहाँ है?

निराशा के कैनवस सा
टंगा हुआ है जो यह दृश्य
मैं इसपर नित- रोज निरंतर
टांकता हूँ शब्द का फूल
और फिर उसे कविता की तरह खिलते देखता हूँ।

हजार उदास रातों में समेटता रहता हूँ
कविता में अपना बिखरना
हर सुबह उठकर उसे मैं
आत्मा की तरह चूमता हूँ
और हो जाता हूँ अनंग
घुलता हुआ इस जीवन में।

चित्र / के. रवीन्द्र 

Wednesday, 1 April 2015

उदास लड़की, चन्द्रमा और गाने वाली चिड़िया - राकेश रोहित

कविता
उदास लड़की, चन्द्रमा और गाने वाली चिड़िया
- राकेश रोहित 


एक दिन चन्द्रमा ने लड़की से पूछा
चित्र / के. रवीन्द्र 
एक दिन चन्द्रमा ने लड़की से पूछा- 
इजाजत दो
तो तुम्हारी आँखों में छुप जाऊँ!
लड़की मुस्कुरायी और गहरा हो गया
उसकी आँखों का रंग
और उसकी मुस्कराहटों
में बरसने लगी चाँदनी।


अकेली लड़की धरती पर सवार
करती थी आकाशगंगा की सैर
और देखती थी आकाश
जहाँ चाँद की जगह थी पर चाँद नहीं था
और हजार तारे टिमटिमाते थे
सारी - सारी रात!


वह चंचल बहती रही / वह अल्हड़ बहती रही
चित्र / के. रवीन्द्र 
वह नदी की तरह बहती रही                
और सोना बिखरता रहा झील पर
वह चंचल बहती रही
वह अल्हड़ बहती रही।

अब वह खूब भागती थी
खूब बातें करती थी
और बात - बात पर खिलखिलाती थी
पहाड़ से उतरते झरने की तरह।

पर होठों की हँसी छुपा नहीं पाती थी
आँखों का पुराना दुख
और बारिश के बाद बहती हवा की तरह
भींग जाती थी उसकी आवाज
जब वह गा रही होती थी
कोई विस्मृत होता गीत!


एक दिन अनाम फूलों के बीच गुजरते हुए
उसने अचानक
एक बच्चे को जोर से चिपटा लिया
और रोने लगी
जैसे टूटती है बांध में बंधी नदी
सारी रात की खामोश बारिशों के बाद।

इसके बाद जो हुआ वह जादू की तरह था
बच्चे ने, जिसे नहीं आती थी भाषा
अपनी नन्हीं हथेली उसके गाल पर टिकाकर
साफ शब्दों में पूछा तुम रो क्यों रही हो?
यह बात वहाँ से गुजरती चिड़िया ने सुना
और गाने लगी उदासी का गीत!

अब भी किसी चाँदनी रात को
चाँद पर चिड़िया की छाया साफ दिखाई देती है
और चाँद जब छुप जाता है
पृथ्वी की कक्षा से दूर
चिड़िया की आवाज से टूट जाती है
उदास लड़की की नींद!

उदास लड़की और गाने वाली चिड़िया
चित्र / के. रवीन्द्र 

Sunday, 23 March 2014

असंभव समय में कविता - राकेश रोहित

कविता
असंभव समय में कविता 
- राकेश रोहित 

हर दिन वर्णमाला का एक अक्षर मैं भूल जाता हूँ
हर दिन टूट जाती है अंतर की एक लय
हर दिन सूख जाता है एक हरा पत्ता
हर दिन मैं तुमको खो देता हूँ जरा- जरा!


ऐसे असंभव समय में लिखता हूँ मैं कविता
जैसे इस सृष्टि में मैं जीवन को धारण करता हूँ
जैसे वीरान आकाशगंगा से एक गूँज उठती है
और गुनगुनाती है एक गीत अकेली धरा!!

असंभव समय में कविता / राकेश रोहित 

Thursday, 23 January 2014

उम्मीद का कोई शीर्षक - राकेश रोहित

कविता
उम्मीद का कोई शीर्षक 
- राकेश रोहित

मैं नष्ट हो रही दुनिया से

एक सहमा हुआ शब्द उठाता हूँ
मैं उसे अपनी सबसे प्यारी कविता में
बची रहने की इच्छा के साथ टांक देता हूँ.


हर असंभव के विरुद्ध एक जुगत की तरह
मैं आसमान को रंग-बिरंगी पतंगों से भर देना चाहता हूँ.



इस नश्वर दुनिया में एक हठ की तरह
मैं हर बार बचा लाता हूँ -
कविता के लिए उम्मीद का कोई शीर्षक!

उम्मीद का कोई शीर्षक / राकेश रोहित 

Monday, 21 October 2013

चिड़िया जब बोलती है - राकेश रोहित

कविता 
चिड़िया जब बोलती है 
- राकेश रोहित 

एक चिड़िया जब बोलती है
एक चिड़िया जब...
बस
इसके बाद सारे शब्द बेमानी हो जाते हैं!

हजार शब्दों में उतारी नहीं जाती
उसकी एक आवाज
एक चिड़िया जब बोलती है
कविताएँ उसको खामोश सुनती हैं!!


चिड़िया जब बोलती है / राकेश रोहित 

Monday, 7 May 2012

जब बाज़ार में आया प्यार - राकेश रोहित


कविता
जब बाज़ार में आया प्यार
- राकेश रोहित

बाज़ार बेचता है प्यार,
पल-पल बढते हैं खरीदार.
जिसको जैसी हो दरकार,
वैसी ले जायें सरकार!

अगर आपका मन सूना है
तो आपने सही क्षण चुना है
एंड ऑफ सीजनका सेल है,
ऑफर  की है यहाँ भरमार!

बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.

टेडी बीयर या लाल गुलाब
इस प्यार का नहीं जवाब!
बंद पाकेट में, शाकप्रूफ है
देखें कितना सुंदर रूप है!!

जैसी कीमत वैसे रंग,
सदा चलेगा आपके संग.
चाभी के छल्ले में प्यार,
देख हुआ मैं चकित यार!

बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.

बेस्ट बिफोरकी तारीख के साथ
चाकलेट के डब्बे में प्यार,
पोर्सलीन की यह हसीना 
आपको अपलक रही निहार.

सुंदर 'एसएमएस-बुक' है
आपके दिल का है इजहार,
अपनी आँखें हमें दीजिये
हम कर आयेंगे चार!

जब बाज़ार में आया प्यार
हमने देखे रंग हजार!
बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.


जब बाज़ार में आया प्यार / राकेश रोहित

Sunday, 1 April 2012

कविता के अभयारण्य में - राकेश रोहित


कविता 
कविता के अभयारण्य में
- राकेश रोहित

जब कुछ नहीं रहेगा 
क्या रहेगा?
मैं पूछता हूँ बार-बार 
भरकर मन में चिंता अपार
कोई नहीं सुनता...
मैं पूछता हूँ बार-बार.

लोग हँसते हैं 
शायद सुनकर
शायद मेरी बेचैनी पर 
उनकी हँसी में मेरा डर है-
जब कुछ नहीं रहेगा 
क्या रहेगा?

नहीं रहेगा सुख 
दुःख भी नहीं 
नहीं रहेगी आत्मा,
जब नहीं रहेगा कुछ 
नहीं रहेगा भय.

कोई नहीं कहता रोककर मुझे
मेरा भय अकारण है 
कि नष्ट होकर भी रह जायेगा कुछ 
मैं बार-बार लौटता हूँ 
कविता के अभयारण्य में 
जैसे मेरी जड़ें वहाँ हैं.

मित्रों, मैं कविता नहीं करता 
मैं खुद से लड़ता हूँ -
जब नहीं रहेगा कुछ 
क्या रहेगा?

कविता के अभयारण्य में /राकेश रोहित 

Saturday, 3 March 2012

सोयी हुई स्त्री, कविता में - राकेश रोहित


कविता
सोयी हुई स्त्री, कविता में 
- राकेश रोहित

दोस्तों गजब हुआ,  यह अल्लसबेरे...
मैंने पढ़ी एक कविता स्त्रियों के बारे में. 
कविता थी पर सच-सा उसका बयान था,
कविता सोयी हुई स्त्रियों के बारे में थी.

सोये हुए के बारे में बात करना अक्सर आसान होता है
क्योंकि एक स्वतंत्रता-सी रहती है
कथ्य बयानी में,
पता नहीं कवि को इसका कितना ध्यान था
पर कविता में नींद का सुंदर रुमान था.

बात सोये होने की थी
समय सुबह का था
अचरज नहीं कविता में एक स्वप्न का भान था.
मैं पढ़कर चकित होता था
पर यह तय नहीं था कि मैं जगा था.

सुबह-सवेरे देखे  गए सपने की तरह
कविता का अहसास  मेरे मन में है
पर सोचकर यह बार-बार बेचैन होता हूँ -
सोयी हुई स्त्री जब कविता में आती है 
तो क्या उसकी नींद टूट जाती है?

सोयी हुई स्त्री, कविता में / राकेश रोहित

Wednesday, 15 February 2012

पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम - राकेश रोहित


कविता 
पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम
 - राकेश रोहित 

सर्द रातों में
ठंडे पानी के स्पर्श लगता है
जैसे छू रहा हूँ हिमनद से आया बर्फीला जल
जो हजारों वर्ष पहले
बहकर आया होगा किसी नदी में
और फिर बहता ही रहा होगा.

ऐसी छूती है ठंडी हवा
जैसे दक्षिणी ध्रुव से बहकर आयी हवा
पहली बार छू रही होगी
किसी आदिम मानव को.

जैसे पिछली सर्दियों में
हड्डियों के बीच
बची रह गयी सिहरन जाग रही है
वैसे कांपता हूँ इन सर्दियों में.

ऐसे लहकती है आग
इस सर्द रात में
जैसे हमारे पूर्वजों के सांसों की
ऊष्मा भरी है उसमें.

ऐसे नहीं आया यह मिट्टी सना आलू
इसकी मिट्टी में अब भी
उनके  पैरों की छाप है
जो ओस भरी सुबहों में
तलाश लाए थे इसे
हरे पत्तों की जड़ों के नीचे.

भुनता है आलू तो
याद उन्हीं की आती है
जो तलाश लाए होंगे
पहली बार
पत्थरों में छिपी आग.

सूरज से नहीं
वीराने में अंधड की तरह भटकती हवा से नहीं
पहाड़ों पर पिघल रहे ग्लेशियर से नहीं और
नियम की तरह अनवरत घूमती धरती से नहीं
हमसे रचा गया है यह मौसम.

पहले हम हुए,
फिर हुआ मौसम.

पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम / राकेश रोहित 

Thursday, 26 January 2012

मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं - राकेश रोहित


कविता 
मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं 
- राकेश रोहित

मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं.
मैं कल छोड़ नहीं आया,
मेरे सपनों के तार वहीं से जुड़ते हैं.

मैं सुबह की वह पहली धूप हूँ -
जो छूती है
गहरी नींद के बाद थके मन को.
मैं आत्मा के दरवाजे पर
आधी रात की दस्तक हूँ.

जो दौड कर निकल गए
डराता है उनका उन्माद
कोई आएगा अँधेरे से चलकर
बीतती नहीं इसी उम्मीद में रात.

मैं उठाना चाहता हूँ
हर शब्द को उसी चमक से
जैसे कभी सीखा था
वर्णमाला का पहला अक्षर.
रुमान से झांकता सच हूँ  
हर अकथ का कथन
मैं हजार मनों में रोज खिलता
उम्मीद का फूल हूँ.

मेरी कविता में हजारों लोगों की
बसी हुई है
एक जीवित-जागृत दुनिया.
मैं रोज लड़ता हूँ
प्रलय की आस्तिक आशंका से
मैं उस दुनिया में रोज प्रलय बचाता हूँ.

मेरी कविता में उनकी दुनिया है
जिनकी मैं बातें करता हूँ
कविता में गर्म हवाओं का अहसास
उनकी साँसों से आता है.


Saturday, 9 October 2010

हाय! हमें ईश्वर होना था - राकेश रोहित

कविता
हाय! हमें ईश्वर होना था
- राकेश रोहित

हाय! हमें ईश्वर होना था.
जीवन की सबसे पवित्र प्रार्थना में
अनंत बार दुहराया जाना था इसे
डूब जाना था हमें
अनवरत अभ्यर्थना के शुभ भाव में
घिर जाना था
ईश्वर की अपरिचित गंध में
महसूस करना था
हथेली में छलछलाती
श्रद्धा का रहस्य-भरा अनुभव.

सत्य के शिखर से उठती
आदिम अनुगूंज की तरह
व्याप्त होना था हमें
पर इन सबसे पहले
हाय! हमें ईश्वर होना था.

ईश्वर.
धरती के सारे शब्दों की सुंदरता है इसमें
ईश्वर!
धरती की सबसे छोटी प्रार्थना है यह
ईश्वर?
हाय, नहीं हैं जो हम.

अभिमंत्रित आहूतियों से उठती है
उसकी आसक्ति
पितरों के सुवास की धूम से रचता है
उसका चेहरा
जीवन की गरमायी में लहकती है
उसकी ऊष्मा.
वह सब कुछ होना था
हम सब में, हमारे अंदर
थोड़ा-थोड़ा ईश्वर.

सोचो तो जरा
सभ्यता की सारी स्मृतियों में
नहीं है
उनका जिक्र
हाय! जिन्हें ईश्वर होना था.
हाय! हमें ईश्वर होना था.

ईश्वर का सच - राकेश रोहित

कविता
ईश्वर का सच
- राकेश रोहित

मैं समझता हूँ ईश्वर का सच
दुहराई गई कथाओं से सराबोर है
और जो बार-बार चमकता है
आत्मा में ईश्वर
वह केवल आत्मा का होना है.

जीवन के सबसे बेहतर क्षणों में
जब भार नहीं लगता
जीवन का दिन-दिन
और स्वप्नों को डंसती नहीं
अधूरी कामनाएं
तब भी मेरा स्वीकार
आरंभ होता है वैदिक संशय से
अगर अस्तित्वमान है ईश्वर
धरती पर देह धारण कर....

मैं समझता हूँ
सृष्टि की तमाम अँधेरी घाटियों में
केवल
सूनी सभ्यताओं की लकीरें हैं
कि जहां नहीं जाती कविता
वहां कोई नहीं जाता.
सारी प्रार्थनाओं से केवल
आलोकित होते हैं शब्द
कि ईश्वर का सच
ईश्वर को याद कर ईश्वर हो जाना है.

Sunday, 3 October 2010

समुद्र नहीं है नदी - राकेश रोहित

कविता

समुद्र नहीं है नदी   
         - राकेश रोहित 
(एक)

चाहता तो मैं भी था
शुरू करूँ अपनी कविता
समुद्र से
जो मेरे सामने टंगे फ्रेम  में घहराता है
और तब मुझे
अपना चेहरा  आइने में नजर आता है
पर मुझे याद आयी नदी
जो कल आपना
घुटनों भर परिचय लेकर आयी थी
और मैंने पहली बार देखा था नदी को इतना करीब
कि मैं उससे बचना चाहता था
नहीं, मैं नदी से
उतना अपरिचित भी नहीं था
नदियां तो अकसर
हमसे कुछ फासले पर बहती हैं
और हमारे सपनों में किसी झील  सी आती हैं.

मैं समझ रहा था
कि महसूसा जा सकता है
इस धरती पर नदी का होना.
बात नदी - सी प्यास से
शुरू हो सकती थी
बात नदी की तलाश पर
खत्म हो सकती थी
पर मैं कब चाहता हूँ नदी
अपने इतने पास
जितने पास समुद्र
मेरे सामने टंगे फ्रेम में घहराता है.

(दो)

बचे हुए लोग
किससे पूछेंगे अपना पता!
शायद नदी से
जो तब किसी उदास समुद्र की तरह
भारी जहाजों के मलबे तले
बहती रहेगी खामोश.

शायद तब वे पायेंगे
कोई समुद्र अपने पास
जो दूर,  बहुत दूर,  दूर है अभी
जिसे कभी देखा होगा पिता ने पास से.
कितना भयानक होगा
उस  समुद्र का याद आना
जब पिता पास नहीं होंगे
किसी नदी की तरह.

शायद वे ढूंढेंगे नदी
किसी पहाड़, किसी झरने
किसी अमूर्त कला में
पर कठिन होगा
ढूँढ पाना अपना पता
जब पास नहीं होगी
कोई कविता यह कहती हुई
समुद्र नहीं है नदी,
समुद्र नहीं है नदी.

लोकतंत्र में ईश्वर - राकेश रोहित

कविता

लोकतंत्र में ईश्वर

  - राकेश रोहित


एक आदमी
चूहे की तरह दौड़ता था
अन्न का एक दाना मुँह में भर लेने को विकल.
एक आदमी
केकड़े की तरह खींच रहा था
अपने जैसे दूसरे की टाँग.
एक आदमी
मेंढक की तरह उछल रहा था
कुएँ को पूरी दुनिया समझते हुए.
एक आदमी
शुतुरमुर्ग की तरह सर झुकाए
आँधी को गुज़रने दे रहा था.
एक आदमी
लोमड़ी की तरह न्योत रहा था
सारस को थाली में खाने के लिए.
एक आदमी
बंदर की तरह न्याय कर रहा था
बिल्लियों के बीच रोटी बाँटते हुए.
एक आदमी
शेर की तरह डर रहा था
कुएँ में देखकर अपनी परछाईं.
एक आदमी
टिटहरी की तरह टाँगें उठाए
आकाश को गिरने से रोक रहा था.
एक आदमी
चिड़िया की तरह उड़ रहा था
समझते हुए कि आकाश उसके पंजों के नीचे है.
एक आदमी...!

एक आदमी
जो देख रहा था दूर से यह सब,
मुस्कराता था इन मूर्खताओं को देखकर
वह ईश्वर नहीं था
हमारे ही बीच का आदमी था
जिसे जनतंत्र ने भगवान बना दिया था.

Saturday, 2 October 2010

बाज़ार के बारे में कुछ विचार - राकेश रोहित

कविता

बाज़ार के बारे में कुछ विचार
                          - राकेश रोहित

ख़ुशी अब पुरानी ख़ुशी की तरह केवल ख़ुश नहीं करती
अब उसमें थोड़ा रोमांच है, थोड़ा उन्माद
थोड़ी क्रूरता भी.
बाज़ार में चीज़ों के नए अर्थ हैं
और नए दाम भी.
वो चीज़ें जो बिना दाम की हैं
उनको लेकर बाज़ार में
जाहिरा तौर पर असुविधा की स्थिति है.
दरअसल चीज़ों का बिकना
उनकी उपलब्धता की भ्राँति उत्पन्न करता है
यानी यदि ख़ुशी बिक रही है
तो तय है कि आप ख़ुश हैं (नहीं तो आप ख़रीद लें)
और यदि पानी बोतलों में बिक रहा है
तो पेयजल संकट की बात करना
एक राजनीतिक प्रलाप है.
ऐसे में सत्ता के तिलिस्म को समझने के कौशल से बेहतर है
आप बाज़ार में आएँ
जो आपके प्रति उतना ही उदार है
जितने बड़े आप ख़रीदार हैं.

बाज़ार में आम लोगों की इतनी चिन्ता है
कि सब कुछ एक ख़ूबसूरत व्यवस्था की तरह दीखता है
कुछ भी कुरूप नहीं है
इस खुरदरे समय में
और अपनी ख़ूबसूरती से परेशान लड़की!
जो थक चुकी है बाज़ार में अलग-अलग चीज़ें बेचकर
अब ख़ुद को बेच रही है.
यह है उसके चुनाव की स्वतंत्रता
सब कुछ ढक लेती है बाज़ार की विनम्रता.
सारे वाद-विवाद से दूर बाज़ार का एक खुला वादा है
कि कुछ लोगों का हक़ कुछ से ज़्यादा है
और आप किस ओर हैं
यह प्रश्न
आपकी नियति से नहीं आपकी जेब से जुड़ा है.

यदि आप समर्थ हैं
तो आपका स्वागत है उस वैश्विक गाँव में
जो मध्ययुगीन किले की तरह ख़ूबसूरत बनाया जा रहा है
अन्यथा आप स्वतंत्र हैं
अपनी सदी की जाहिल कुरूप दुनिया में रहने को.
बाज़ार वहाँ भी है
सदा  आपकी सेवा में तत्पर
क्योंकि बाज़ार
विचार की तरह नहीं है
जो आपका साथ छोड़ दे.
विचार के अकाल या अंत के दौर में
बाज़ार सर्वव्यापी है, अनंत है.