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Sunday, 18 October 2015

बड़ी बात छोटी बात - राकेश रोहित

कविता
बड़ी बात छोटी बात 
- राकेश रोहित

उसने कहा हमेशा बड़ी बातें कहो
छोटी बातें लोग नकार देंगे
जैसे कहो आकाश से नदियों की होती है बारिश
कि यह जो तुम्हारी आँखों का अंधेरा है
दरअसल वह एक घना जंगल है
कि एक दिन हाथी चुरा ले जाते हैं फूलों की खुशबू
कि संसार की सबसे खूबसूरत लड़की
तुमसे प्यार करती है।

पर इतना बड़ा कुछ नहीं
मुझे कहनी थी कुछ छोटी बात
कि जैसे जब हिल रहे थे पहाड़
तो निष्कंप रही घास की एक पत्ती
कि सारी नदी बह गयी पर एक तिनका
अपनी जगह डोलता रहा
मेरे डूबने के इंतजार में
कि एक छोटा सा दुख लेकर
मैं तुम्हारे जीवन के सबसे छोटे क्षण की
प्रतीक्षा करता रहा
कि इच्छाओं से भरे इस संसार में
मुझे चूमनी थी
ठीक तुम्हारे आँखों के पास वाली वह जगह
जहाँ हर बार एक आँसू आकर
ठिठक जाया करता है।

माफ करना
मैं बड़ी बात कहने से हमेशा डरता रहा
इसलिए कह नहीं पाया कभी
मैं तुमसे प्यार करता हूँ!

(उसी कविता का एक असंलग्न हिस्सा है!)

पर कुछ छोटी बातें कह सकता हूँ तुमसे
जैसे कि मैंने एक कविता लिखी है तुम्हारे लिए!

बड़ी  बात  छोटी बात / राकेश रोहित

Friday, 16 October 2015

एक दिन - राकेश रोहित

कविता
एक दिन
- राकेश रोहित

सीधा चलता मनुष्य
एक दिन जान जाता है कि
धरती गोल है
कि अंधेरे ने ढक रखा है रोशनी को
कि अनावृत है सभ्यता की देह
कि जो घर लौटे वे रास्ता भूल गये थे!

डिग जाता है एक दिन
सच पर आखिरी भरोसा
सूख जाती है एक दिन
आंखों में बचायी नमी
उदासी के चेहरे पर सजा
खिलखिलाहट का मेकअप धुलता है एक दिन
तो मिलती है थोड़े संकोच से
आकर जिंदगी गले!

अंधेरे ब्रह्मांड में दौड़ रही है पृथ्वी
और हम तय कर रहे थे
अपनी यात्राओं की दिशा
यह खेल चलती रेलगाड़ी में हजारों बच्चे
रोज खेलते हैं
और रोज अनजाने प्लेटफार्म पर उतर कर
पूछते हैं क्या यहीं आना था हमको?

इस सृष्टि का सबसे बड़ा भय है
कि एक दिन सबसे तेज चलता आदमी
भीड़ भरी सड़क के
बीचोंबीच खड़ा होकर पुकारेगा-
भाइयों मैं सचमुच भूल गया हूँ
कि मुझे जाना कहाँ है?

चित्र / के. रवीन्द्र 

Friday, 19 June 2015

एक कविता पेड़ के लिए - राकेश रोहित

कविता
एक कविता पेड़ के लिए
- राकेश रोहित

वह छोटे पत्तों और बड़ी छायाओं वाला पेड़ था
जिसकी छांव में ठहरी थी चंचल हवा
और वहीं टहनियों में फंसी
एक पतंग डोल रही थी!
शायद उतारने की कोशिश में फट गया था
पतंग का किनारा
उलझ गये थे धागे
यद्यपि वहां कोई न था
पर किसी बच्चे की हसरत वहीं शायद
पतंग के गिरने के इंतजार में खड़ी थी
और इन सबसे बेपरवाह था पेड़
मुझे लगा शायद बहुत अकेला है यह पेड़।
पेड़ अकेले क्यों पड़ जाते हैं
और कब दूर होता है उनका अकेलापन?

एक दिन फूलों से भर जाता है पेड़
एक दिन गंध से भर जाती है हवा
एक दिन वर्षा आकर करती है श्रृंगार
एक दिन पके फल का आमंत्रण दे
शर्म से दोहरी हो जाती है टहनियां
एक दिन चिड़िया आकर गाती है कानों में
प्रेमोत्सव का गीत।

जब नर्तन करते हैं पत्ते
और गाती है उन्मत्त हवा पेड़ों की डाली के संग
क्या तब अकेले नहीं होते हैं पेड़
और बस यूं ही ठिठके रहते हैं उदास अपनी जड़ों में
तुम्हारे इंतजार में?

आप पूछ कर देखिए कोई दावे से यह नहीं कहेगा
कि पेड़ तब अकेले नहीं होते हैं
जब वे झूम रहे होते हैं हमारे संग
और जब हमारी शरारतों पर
सहलाते हैं झरते पत्ते हमारी पीठ
कोई आकर खामोश तने पर जब लिखता है एक नाम
और पढ़कर खिलखिलाती हैं कुछ लडकियाँ अनाम!

माँ, कब दूर होता है पेड़ों का अकेलापन
जब उसमें सिमट जाती है तुम्हारी याद
या जब उसके नीचे मैं रोता हूँ तुम्हारी याद में?
यह एक ऐसा सवाल था
जिसके जवाब के इंतजार में मैं भटकता रहा
और मुझे बेचैन करते रहे अकेले पड़ते पेड़।


और एक दिन!
एक दिन जब सारे कछुए जीतकर
समंदर में वापस चले गए
मुझसे अचानक भागते हुए एक खरगोश ने कहा
पेड़ तब अकेले नहीं होते जब उनसे
शुरू होता है कोई गाँव
और जब वहाँ बैठकर कोई सुस्ताता है
पीछे छूट गये संगी के इंतजार में।


हर पेड़ एक कविता है / राकेश रोहित 

Wednesday, 27 October 2010

बहुत थोड़े शब्द हैं - राकेश रोहित

कविता
बहुत थोड़े शब्द हैं
-राकेश रोहित 

बहुत थोड़े शब्द हैं, कहता रहा कवि  केवल
और सोचिए तो इससे निराश नहीं थे बच्चे.
खो रहे हैं अर्थ, शब्द सारे
कि प्यार का मतलब बीमार लड़कियां हैं
और घर, दो-चार खिड़कियां
धूप, रोशनी का निशान है
फूल, क्षण का रुमान!
और जो शब्दों को लेकर हमारे सामने खड़ा है
जिसकी मूंछों के नीचे मुस्कराहट है
और आँखों में शरारत
समय, उसके लिए केवल हाथ में बंधी घड़ी है.

घिस डाले कुछ शब्द उन्होंने, गढता रहा कवि  केवल.

ऐसे में एक कवि है कितना लाचार
कि लिखे दुःख के लिए घृणा, और उम्मीद को चमत्कार.
क्या हो अगर घिसटती रहे कविता कुछ तुकों तक
कोई नहीं सहेजता शब्द.
बच्चों के हाथ में पतंगें हैं, तो वे चुप हैं
लड़कियों के घरौंदे हैं तो उनमें खामोश पुतलियां हैं
माँ  के पास कुछ गीत हैं तो नहीं है उनके सुयोग
बहनों के कुछ पत्र, तो नहीं हैं उनके पते
कुछ आशीष तो नहीं है साहस
कहां हैं मेरे असील शब्द?

क्या होगा कविता का
बना दो इस पन्ने की नाव *
तो कहीं नहीं जाएगी
उड़ा दो बना कनकौवे तो
रास्ता भूल जायेगी.

केवल हमीं हैं जो कवि हैं
किए बैठे हैं भरोसा इन पर
एक भोली आस्था एक खत्म होते तमाशे पर
लिखते हैं खुद को पत्र
खुद को ही करते हैं याद
जैसे यह खुद को ही प्यार करना है.
एक मनोरोगी की तरह टिका देते हैं
धरती, शब्दों की रीढ़ पर
जबकि टिकाओ तो टिकती नहीं है
उंगली भी अपनी.

बहुत सारा उन्माद है
बहुत सारी प्रार्थना है
और भूलते शब्द हैं.
हमीं ने रचा था कहो तो कैसी
अजनबीयत  भर जाती है अपने अंदर
हमीं ने की थी प्रार्थना कभी
धरती को बचाने की
सोचो तो दंभ  लगता है.
हमीं ने दिया भाषा को संस्कार
इस पर तो नहीं करेगा कोई विश्वास.
लोग क्षुब्ध होंगे
हँस देंगे जानकार
कि बचा तो नहीं पाते कविता
सजा तो नहीं पाते उम्मीद
धरती को कहते हैं, जैसे
हाथ में सूखती नारंगी है
और जानते तक नहीं
व्यास किलोमीटर तक में सही.

टुकड़ों में बंट गया है जीवन
शब्द चूसी हुई ईख की तरह
खुले मैदान में बिखरे हैं
इनमें था रस, कहे कवि
तो इतना बड़ा अपराध!

बहुत थोड़े शब्द हैं, कहता रहा कवि केवल
घिस डाले कुछ शब्द उन्होंने, गढता रहा कवि केवल.
(* कविता लिखे जाने समय प्रकाशित होने का अर्थ सामान्यतया कागज पर छपने से था.)

Sunday, 3 October 2010

समुद्र नहीं है नदी - राकेश रोहित

कविता

समुद्र नहीं है नदी   
         - राकेश रोहित 
(एक)

चाहता तो मैं भी था
शुरू करूँ अपनी कविता
समुद्र से
जो मेरे सामने टंगे फ्रेम  में घहराता है
और तब मुझे
अपना चेहरा  आइने में नजर आता है
पर मुझे याद आयी नदी
जो कल आपना
घुटनों भर परिचय लेकर आयी थी
और मैंने पहली बार देखा था नदी को इतना करीब
कि मैं उससे बचना चाहता था
नहीं, मैं नदी से
उतना अपरिचित भी नहीं था
नदियां तो अकसर
हमसे कुछ फासले पर बहती हैं
और हमारे सपनों में किसी झील  सी आती हैं.

मैं समझ रहा था
कि महसूसा जा सकता है
इस धरती पर नदी का होना.
बात नदी - सी प्यास से
शुरू हो सकती थी
बात नदी की तलाश पर
खत्म हो सकती थी
पर मैं कब चाहता हूँ नदी
अपने इतने पास
जितने पास समुद्र
मेरे सामने टंगे फ्रेम में घहराता है.

(दो)

बचे हुए लोग
किससे पूछेंगे अपना पता!
शायद नदी से
जो तब किसी उदास समुद्र की तरह
भारी जहाजों के मलबे तले
बहती रहेगी खामोश.

शायद तब वे पायेंगे
कोई समुद्र अपने पास
जो दूर,  बहुत दूर,  दूर है अभी
जिसे कभी देखा होगा पिता ने पास से.
कितना भयानक होगा
उस  समुद्र का याद आना
जब पिता पास नहीं होंगे
किसी नदी की तरह.

शायद वे ढूंढेंगे नदी
किसी पहाड़, किसी झरने
किसी अमूर्त कला में
पर कठिन होगा
ढूँढ पाना अपना पता
जब पास नहीं होगी
कोई कविता यह कहती हुई
समुद्र नहीं है नदी,
समुद्र नहीं है नदी.