Saturday, 19 November 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित

कथाचर्चा
 हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                                          राकेश रोहित
(भाग- 21) (पूर्व से आगे)

        जीवन में जो आदर्श हैबेहतर है की मासूम स्थापना का स्वप्न लेकर 'पहल'-42 की कहानियां आती हैं. ये कहानियां सामान्यतः  किसी वैचारिक जीवट से प्रतिफलित न होने के बावजूद आदर्श के प्रति अपने आग्रह को सरल कथा-उपकरणों से बचाती हैं. स्वयं प्रकाश  की नेता जी का चश्मा में यह आग्रह नेताजी की मूर्ति के आँखों में बच्चे द्वारा बना सरकंडे का चश्मा लगा देखने और 'इतनी सी बातपर हालदार साहब की आँखें भर आने से अभिव्यक्त होता है. तो  सुबोध कुमार श्रीवास्तव  की कहानी धक्का  में 'बचऊ' द्वारा दीवार को पेशाब की धार से सींचने और उस पर उसकी माँ द्वारा आवाज देने से कि - "नंगा रहेगा तो ऐसे ही खेल खेलेगा."  इसी तरह परगट सिंह सिद्धू की कहानी  मैं उदास हो जाता हूँ में खूबसूरत दुनिया के रंग को महसूसने से छूटती पीढ़ी है. लक्षमेंद्र चोपड़ा की स्टूल राजनीति की बढ़ती ऊँचाई के छद्म को पकड़ती है और नत्थू द्वारा स्टूल बड़े सरकार को उनकी जरुरत के लिए भेंट करने की बात कर इस निकाय में जन की स्थिति पर मासूम पर सार्थक व्यंग्य करती है और अंत में इसी आस्था से मोहभंग की अभिव्यक्ति है. सुभाष शर्मा की कलकत्ते का जादू में हाथ की सफाई है और कलकत्ते को लेकर आये वक्तव्यों की श्रृंखला की एक और कड़ी. इस लिहाज से अखिलेश की बायोडाटा एक महत्वपूर्ण कहानी है क्योंकि सामान्य तरीके से विकसित होती हुई यह कहानी राजनीति के द्म की प्रवृत्ति को पकड़ने की कोशिश में स्थितियों और चरित्रों के प्रचलित मानकीकरण को नकारती हुई उस समय को अपने केन्द्र में रखती है जिसमें एक व्यक्ति की बदलती मानसिकता उसे एक सफल राजनीतिज्ञ बनाती जाती है. यह कहानी ठीक उस स्थल को छूती है जहाँ यह कहानी बनती है. ...और यहीं छूटती सावित्री है जो ऐसे संतान की माँ बनती है - "जो पीली और दुर्बल थी, चिचुकी हुई, बहुत बासी तरोई की तरह. उसमें जीवन  के चिन्ह नहीं थे, जीवन गायब था. बस जीवन की परछाई जैसे धप से गिर पड़ी हो."  इस तरह यह कहानी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में पीलियाई नई पीढ़ी के जन्म की भयावह सूचना देती है. और इससे राजदेव सिंह बिल्कुल निर्लिप्त है. वे अपने बायोडाटा की 'मास-अपील' पर सोचते हुए संतरा छीलने लगते है. "संतरे में बड़ा  रस था," यह कहानी की सबसे भयानक पंक्ति है जो एक आतंक की तरह हमारे अंदर फैलती है. और यह वह संतरा है जिसके बारे में  कवि केदारनाथ सिंह  ने अपनी एक कविता में लिखा है - 
...अपने हिस्से का संतरा 
मैं खाना चाहता हूँ 
इसलिए मेज की तरफ 
बढाता हूँ हाथ 
और कैसा करिश्मा है 
कि मेरे हाथ बढ़ाते ही 
वह गोल-गोल मेज 
अचानक हो जाती है 
पृथ्वी की तरह विशाल और अनंत 
.................................................
संतरा मेरा है 
और मैं डर रहा हूँ सवेरे-सवेरे 
कि कहीं यह सीधी-सी बात 
कि संतरा मेरा है 
विवाद में ना पड़ जाये ...!"(पहल - 37, 1988-89)

          आज से  लगभग पैंसठ वर्ष पूर्व की मान्यताओं को समझने के लिए चंद्रकिरण सौनेरेक्सा की इज्जत हतक (आजकल, अगस्त 1991) तथा विश्व प्रकाश दीक्षित 'बटुक' की भद्र महिला (आजकल, अक्टूबर  1991) पढ़ी  जानी चाहिए. वे जो सीधी सच्ची कथा में ऊष्मा महसूसते हैं मुक्ता की जिन्दा है करनैल चंद (आजकल, अगस्त 1991) पढ़ सकते हैं. रमा  सिंह की नयन जलधार (आजकल, जुलाई  1991) में आंसू का ड्रामा है. दिलीप सिंह की कहानी अपना कंधा अपनी लाश (आजकल, सितम्बर 1991) में अच्छा व्यंग्य है.

 फूलों-सा रंग हो जीवन में... पत्तों-सा हो हरापन! / राकेश रोहित 
(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
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Saturday, 24 September 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा
     हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                                                  - राकेश रोहित
(भाग- 20) (पूर्व से आगे)

        'उद्भावना' रचनात्मक जिद की पत्रिका है और यह इसी का प्रतिफलन है कि वह मुद्दों पर एक विचलन की स्थिति पैदा कर पाती है. यही रचनात्मक जिद असगर वजाहत की आज की रचनाओं में देखी जा सकती है. वे अपनी पूरी कोशिश से आपको स्तब्ध कर सोचने पर विवश करती हैं. और यह अकारण नहीं है कि उद्भावना -24 में असगर वजाहत की बारह रचनाएं हैं. वे सांप्रदायिकता के विविध पहलुओं के अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मता से निरीक्षण करती हैं. गुरु-चेला संवाद असगर वजाहत की चर्चित रचना-कड़ी है और प्रभावी भी, जहां बात बड़ी सहजता से मुद्दों तक पहुँचती है. असगर वजाहत की एक और कहानी नाला (पल-प्रतिपल, अप्रैल-जून 1991) एक अनिवार्य आतंक को सामने करती है कि अपनी चिंताओं के मोर्चे पर हम कितने अकेले हैं. अशोक गुप्ता की ठहर जाओ सोनमुखी (वही) एक बालकोचित भावुक अपील है जो नानी के मौलिक व्यक्तित्व पर पड़ती 
"मुझे लगा जंगलों में रहते हुए आदमी जिंदगी में जो मिलता है उसी को बोते चलता है और धीरे-धीरे दु:खों का एक समानांतर जंगल खड़ा कर लेता है.'' 
हवेली की छाया का प्रतिषेध करती है और इसी बहाने एक वर्ग की मुक्ति की फ़िक्र. मंजूर एहतेशाम की कहानी कड़ी (पहल-40) बताती है कि कारण और परिणाम की दुनिया में हमारी जिंदगी किस तरह अपने भ्रम सहित निष्कर्ष और प्रयोग में गुजर जाती है. शशांक की पूरी रात (वही) मर रही दुनिया में कठिन सपनों के आंतरिक आतंक की कहानी है. भालचन्द्र जोशी की पहाड़ों पर रात (वही) बहुत ही अच्छी कहानी है. बिल्कुल सीधी-सादी कहानी, एक सुलझी गंभीर भाषा जो अनुभव की ईमानदारी से हासिल होती है और जो आदिवासियों के बहाने एक शोषित वर्ग के दुःख को सच्ची पीड़ा से महसूसते हुए कहीं अपने को बचाने या 'जस्टीफाई' करने की कोशिश नहीं करती है. इसे पढ़ना एक गहरे अनुभव से गुजरना है. यह बात कितनी अनुभूत पीड़ा से उपजती है, "मुझे लगा जंगलों में रहते हुए आदमी जिंदगी में जो मिलता है उसी को बोते चलता है और धीरे-धीरे दु:खों का एक समानांतर जंगल खड़ा कर लेता है." 

जंगल और जीवन / राकेश रोहित 

(आगामी पोस्ट में पहल- 42 की कहानियों पर चर्चा)
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Saturday, 6 August 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा
                    हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                             - राकेश रोहित
(भाग- 19) (पूर्व से आगे)
         
आने वाले समय के तनाव को शिद्दत से महसूसने वाले रचनाकार के रूप में विनोद अनुपम का नाम लिया जाना चाहिए. उनकी पहली कहानी स्वप्न (सारिका) में आयी थी जो राजनीति के सीमान्त की ओर इशारा करती, आज की स्थितियों पर बहुत सटीक रचना है. उनकी नयी कहानी शापित यक्ष, वर्तमान साहित्य पुरस्कार अंक की श्रेष्ठ कहानी है. यह अपनी शीर्षक संकल्पना में परंपरा के मिथ का बहुत सजग इस्तेमाल करती है और समूची कहानी उसका निर्वहन करती है. इसके अलावा वर्तमान साहित्य में निषेध (नारायण सिंह), माफ करो वासुदेव (वही), मदार के फूल (अनन्त कुमार सिंह), बांस का किला (नर्मदेश्वर), सबसे बड़ी छलांग (रामस्वरूप अणखी), अपूर्व भोज (रमा सिंह), प्रतिहिंसा (राणा प्रताप), संशय की एक रात (कृष्ण मोहन झा) आदि कहानियाँ अपने महत्व में पठनीय हैं. सिम्मी हर्षिता  की कहानी इस तरह की बातें (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991) में जिस व्यवस्था से मुक्ति की कोशिश है उसके विरुद्ध किसी चेतना का विकास कहानी नहीं करती है. प्रेम रंजन अनिमेष की ऐसी जिद क्या (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991) में आत्मीयता की जो प्रतीक्षा है वह हिंदी में बूढ़ी काकी (प्रेमचंद) जैसी कहानियों के सिवा दुर्लभ है.

मध्यवर्गीय आत्म-रति को स्थापित करती सूरज प्रकाश की कहानी उर्फ चंदरकला  जैसी कहानी का दो पत्रिकाओं  वर्तमान  साहित्य (नवंबर 1991) तथा संबोधन-91 में प्रकाशन संपादकीय नैतिकता पर प्रश्न लगाता है. सूरज प्रकाश जी की ही लिखी टिप्पणी "अश्लीलता के बहाने कुछ नोट्स" (हंस, जून 1991) के संदर्भ  में ही सवाल उठता है  कि अगर उनका आग्रह चंदरकला को  'इरोटिक'  न माने जाने का है तो क्या यह उनके ही शब्दों में एक वर्ग को पशु करार किये जाने की कोशिश नहीं है.  मैनेजर पांडेय  ने अपने आलेख "यह कछुआ धर्म अभी और कब तक" (हंस, फरवरी 1991) में लिखा है - "व्यवस्था के शील पर चोट करने के लिए अश्लीलता हथौड़े की तरह काम करती है." अगर  सूरज प्रकाश की कहानी व्यवस्था के शील पर चोट नहीं करती तो फिर यह अश्लील क्यों है?  रघुनंदन त्रिवेदी की खोई हुई एक चीज (संबोधन-91) अपनी तलाश में शामिल करती है तो यह एक बड़ी बात है. रूप सिंह चंदेल की चेहरे (संबोधन-91) में शैक्षणिक संस्थानों का वह चेहरा सामने आता है जहां एक सहज व्यक्ति अपने को इस्तेमाल किये जाने और अंत में मोहभंग को स्वीकारने के लिए विवश है.

इस रंग बदलती दुनिया में  / राकेश रोहित 

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
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Saturday, 11 June 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा

            हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                          - राकेश रोहित
(भाग- 18) (पूर्व से आगे)
         
सुरेश कांटक की कहानी धर्म संकट (हंस, अगस्त 1991) में अवधेश  का संकट आज के शुद्धतावादी हिंदी कथाकार का संकट है जो अपनी वैचारिकता से न तो किसी नैतिकतावादी संबंध को 'जस्टीफाई' करने की स्थिति में है और न ही उसके पास किसी भौतिकतावादी संबंध की दैहिकता को स्वीकार करने का साहस है. वह इसके मध्य फंसा है जैसे उसकी कहानी. रंजन जैदी की कहानी तब और अब (इंद्रप्रस्थ  भारती, मार्च 1991)  भी इसी का उदाहरण है, जहाँ लेखक फ्रायड को पढ़ने के बाद भी नियतिवादी आग्रह से मुक्त नहीं है. प्राइवेट लाइफ  की गीतांजली श्री की  दहलीज (हंस, अगस्त 1991) में भाषा की  नफासत पहले चौंकाती है प्रभावित बाद में करती है. मृणाल पांडे की कहानी  हिर्दा  मेयो का मंझला (हंस, अक्टूबर 1991), शशांक की कहानी सुदिन (हंस, वही) और गुलज़ार की कहानी  सनसेट बुलेवार (हंस, वही) अपनी पूर्ण संभावना का उपयोग नहीं करती है और अपेक्षा अधूरी रह जाती  है. पर इसके बावजूद गुलजार की सनसेट बुलेवार में चारुलता का अपने मकान के प्रति मोह अपने समय के विरुद्ध कुछ जो व्यक्तिगत है, प्रिय है को बचा लेने की इच्छा है और समय की नृशंसता  जिसकी अस्ति का अंत कर देती है. सी. भास्कर राव की आतंक (हंस, वही) अपनी कथात्मकता और उसमें अंतर्निहित आस्था के कारण प्रभावी है. हवन (गंगा) से सुपरिचित हुईं सुषम बेदी की कहानी पार्क में (हंस, वही) आयी है जो अंत में इराक-अमरीका युद्ध में एक मनुष्य के पक्ष के अकेले पड़ते जाने को पकड़ती है. विजय प्रताप की कहानी वैक्यूम (हंस, वही) वैज्ञानिक विजन का उपयोग करते हुए प्रायोगिक और सैद्धांतिक के अंतर्विरोध को छूती है और इस अंत तक पहुंचना कि कोई सिद्धांत निरपेक्ष नहीं होता कि बचपन में जो शिक्षा हमें दी जाती है उसे अमल में लाने के लिए वैक्यूम जैसी किसी विशेष स्थिति की जरूरत होती है, सचमुच अपनी सीमाओं में हमें परेशान करता है. असलम की यप-यप-यप्पी (हंस, नवम्बर 1991)  मूल्यों के बदलाव और धीरे-धीरे उसमें अमानवीयता के सहज शुमार का ग्राफ है. शफी जावेद की कहानी अजनबी (हंस, वही) की शांत भाषा का तनाव महत्वपूर्ण है. एक सवाल जो कहानी उभारती है -क्या औरत से शादी करने के लिए उसके धार्मिक विश्वास को भी अपनाना जरूरी है? आनन्द बहादुर की कबाब (हंस, दिसंबर 1991) खंडश: प्रभाव  में एक अच्छी कहानी लगती है पर विचार के रूप में यह निकट-दृष्टि से मुक्त नहीं हो पाती है. और यह आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि धर्म को लेकर जिस संक्रमणशील  दौर में हम रह रहे हैं वहां अपने नजरिये को 'एबसोल्यूट' रूप में विकसित कर पाना बहुत कठिन है. ऐसा लगता है इस कहानी में लेखक अजाने में उस स्थिति को स्वीकृत कर रहा है जिसमें दबावों के बीच एक आदमी अपनी मान्यताओं के साथ सुरक्षित नहीं है. 

सूर्यास्त/अन्विता के. 
(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
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Sunday, 17 April 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित

कथाचर्चा
              हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                   (आज की हिंदी कहानी में छात्र कहां हैं ?)                        
                                                                     - राकेश रोहित
(भाग- 17) (पूर्व से आगे)

राजेन्द्र चंद्रकांत राय की पौरुष (हंस, जुलाई 1991) के बहाने बटरोही 'हंस' का विरोध 'नवभारत टाइम्स' में कर चुके हैं और राजेंद्र चंद्रकांत राय अपना बचाव भी. राजेंद्र चंद्रकांत राय का यह कहना बिल्कुल सही है कि कहानी पर अपने कलीग (colleague) की टिप्पणी उद्धृत करने के के बजाय बटरोही खुद टिप्पणी क्यों नहीं करते? बटरोही जी समर्थ आलोचक हैं और उन्हें ऐसी सुविधा की जरुरत कतई नहीं होनी चाहिए. राजेंद्र चंद्रकांत राय  की कहानी पौरुष और औरत का घोड़ा (वर्तमान साहित्य, सितंबर 1991) शिक्षा संस्थानों के शैक्षणिक स्टाफ उर्फ शिक्षकों के आपस की रुमानियत रहित, 'शेष-समय-प्रेम' की कहानी है. इस संदर्भ में एक दिलचस्प बात सामने आती है वह यह कि कम-से-कम हमारे यहां छात्र अब कालेज के जरूरी उपकरणों में शामिल नहीं हैं. और यह अकारण नहीं है अगर कॉलेज आधारित कहानियों में छात्र अब उपस्थित नजर नहीं आते हैं. वैसे वे अपनी सामूहिकता में अपना मोर्चा (काशीनाथ सिंह) जैसे उपन्यासों में भले मिल जाते हों पर वैयक्तिकता को लेकर जिस तरह कॉलेज जीवन में पनपने वाले प्रेम संबंधों का चित्रण रांगेय राघव ने अपने पहले उपन्यास घरौंदा में किया वह अब दुर्लभ सी चीज हो गयी है. आज के लेखकों को कॉलेज पर कुछ लिखना हो तो जाहिर है उन्हें कॉलेज के अध्यापकों और अध्यापिकाओं के वाद-विवाद और प्रेमवाद से ही काम चलाना पड़ेगा. पर असली सवाल तो यह है कि छात्र अगर स्कूल-कॉलेजों में नहीं हैं तो वे कहां हैं? सड़कों पर तो वे हैं नहीं! खेत-खलिहानों, जंगल-मैदानों में तो कदापि नहीं. नाव और रिक्शा तो आउट डेटेड चीज है और रेल बोरियत भरी! आज की हिंदी कहानी में छात्र बसों में हैं. बस! 
     
यहीं - कहीं  है  प्रेम


(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
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Saturday, 26 March 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित

कथाचर्चा

          हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                  - राकेश रोहित
(भाग- 16) (पूर्व से आगे)

चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी हिंगवा घाट में पानी रे ( हंस, मई 1987)  आजादी के बाद के हमारे प्रांतीय यथार्थ की एक विशिष्ट रचना है. इसमें जायसवाल जी ने ढह रहे सामंतवाद और पनप रहे नव्यतम राजनीतिक स्टंटों व छद्मों की गिरफ्त में फंसे भनटा और उसके समाज के दबावों को सामने रखा है. वर्तमान समय में भनटा जैसे लोगों की भोली आशाएं छली जाती रही हैं और इस छले जाने को भनटा अंत में स्वीकार भी करता है. पर अगर भनटा में स्थानीय स्तर पर सुरो बाबू से मुक्त होने की किसी चेतना का विस्तार नहीं हो रहा और भनटा खुद को शोषण की परंपरा में शामिल किये जाने को अहसान के साथ स्वीकारता है तो लगता है इनके यहां कहानियां अपनी अतिस्वाभाविकता में विचार को 'ओवरटेक' कर जाती हैं और इस तरह वे यथार्थ का अतिक्रमण करने की कोशिश में कोई समांतर यथार्थ नहीं रच पाती हैं. इस वर्ष चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी अभागा (हंस, अप्रैल 1991) आयी. अपराध, आपरेशन जोनाकी, देवी सिंह कौन जैसी कहानियों के एक अंतराल के बाद इस कहानी (अभागा) को एक घटना के रूप में होना चाहिए क्योंकि यह कहानी परिवर्तन की मध्यवर्गीय इच्छा की शिनाख्त करना चाहती है. पर इसमें पूर्व पीढ़ी के मध्यकालीन अभियानों में शामिल होने की अभौतिक इच्छा का आनंद है और इस आनंद में लेखक इतना डूबता है कि वह उस पीढ़ी, जो यथास्थिति को पोषित करती है, को एक मजाकिये चरित्र में बदल देता है और नयी पीढ़ी के जीवन-विचार का संकट अनछुआ रह जाता है. इन सबके बावजूद चन्द्र किशोर जायसवाल की भाषा पर अद्भुत पकड़ यथार्थ के डीटेल्स को पकड़ने में नहीं चूकती है और कथात्मकता का एक सुन्दर वितान रचा जाता है.

विद्यासागर नौटियाल की कहानी फट जा पंचधार (हंस, अप्रैल 1991) को पढ़ना एक अनुभव से गुजरना है. स्त्री की तयशुदा नियति को अपनी मौलिक चेतना से नकारती रक्खी पंचधार के फट जाने की इच्छा के साथ अविस्मरणीय ढंग से उपस्थित होती है. संस्मरण की तरह लिखी गयी जितेन्द्र की कहानी नंद के लाल (हंस, मई 1991) अपने समय के सूचक के रूप में याद रखी जानी चाहिये. जितेन ठाकुर की वो एक दिन (हंस, जून 1991) बाल-कथा सी याद आती है और यह हिन्दी कहानी के लिए एक अच्छी बात भी हो सकती है. जयनंदन की गिद्ध झपट्टा (हंस, जून 1991) का सुन्दर विकास एक तय अंत तक पहुँचता है. पिंटी का साबुन के संजय खाती की पुतला (हंस, जुलाई 1991) यथार्थ की संरचना को उसके सही और समूचे स्वरूप में पाती है. महत्वपूर्ण बात यह है कि खाड़ी युद्ध पर लिखी यह कहानी साम्प्रदायिकता की भी शिनाख्त करती है. वे कथाकार जिनकी समझ साम्प्रदायिकता और उसके विरुद्ध रचनात्मक हस्तक्षेप को लेकर गड्ड-मड्ड है, इससे संकेत ग्रहण कर सकते हैं. इसी वैज्ञानिक समझ का उपयोग विजय ने अपनी कहानी गोह (हंस, जुलाई 1991) में किया है जबकि गिरिराज किशोर की गुमचोट (हंस, जुलाई 1991) में यह ज्यादा साफ़ नहीं है. गोह में कासिम का वैचारिक सामूहिकी से एलियनेट कर दिया जाना विचार पर आज का सबसे बड़ा संकट है.  

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
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Saturday, 19 February 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा
      हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                                                    - राकेश रोहित
(भाग- 15) (पूर्व से आगे)

          विजय प्रताप की कहानी खराब लड़की ( हंस, जनवरी 1991) को मूल्य के अंत को सार्थक व्यावहारिकता के रूप में स्वीकार लिए जाने की कोशिश के रूप में समझा जा रहा है पर यह कहानी उतनी सहज नहीं कि इस मुद्दे पर आप इतनी आसानी से चिढ़ जाएं. दरअसल यह परिवार में रिश्तों को तार्किक ढंग से प्राप्त करने की वह 'एप्रोच' है जहां नारी, प्रेम के अंत के इस समय में, अपने को मुक्त कर सकती है. सुथि द्वारा आत्म-समर्थित जीवनशैली को पाने की यह प्रक्रिया कितनी सहज है इसका संकेत पिता और बेटी के बीच चाकू को उठाकर फेंक दिये जाने में मिलता है. इस कहानी से समय के तनाव को 'फीमेल नेरेशन' में आप उसी तरह पाते हैं जिस तरह अखिलेश की चिट्ठी ( हंस, अगस्त 1989) से 'मेल नेरेशन' में. श्यामा की रोटी (अशोक राही, वही) एक अच्छी प्रेम कहानी है जिसमें पगली श्यामा उस प्रेम की प्रतीक है, अनु द्वारा रोटी दिये जाने के बाद भी जिसका अंत इस दौर की नियति है. 'नैरेटर' (narrator) का कहानी के मध्य सीधा संवाद करना इसे रूमानी होने से बचाता है. लवलीन की  कुंडली ( वही, फरवरी १९९१) आफिसों में कम कर रही, और 'मेल कमेन्ट' से जूझती स्त्री की त्रासदी का बयान तो है पर इसे वैचारिकता को लेकर और सजग होना चाहिए था. सुभाष पन्त  की  पहाड़ की सुबह (वही, मार्च 1991) लोककथा का गंभीर आनंद देती है.  नरेंद्र नागदेव  की लिस्ट ( वही) बेरोजगारी की स्थितियों पर लिखी अच्छी कहानी तो है पर इससे एक महत्वपूर्ण संकेत लिया जा सकता है कि यह वह कहानी है जो अनुभव को यथार्थ में बदलने की हडबड़ी से उपजती है. इससे अलग यहां यह जिक्र किया जाना चाहिए कि फैंटेसी के इसी उपयोग से  भाईयों, मुझे जड़ की तलाश है (सत्यनारायण, हंस जनवरी 1987) जैसी उत्कृष्ट रचना संभव हो सकी है. 

            कहा जाना चाहिए  हिन्दी कहानी में एक शहर होता है जो गांव सा दीखता है, एक गांव होता है जो शहर सा दीखता है  और एक बिहार होता है जो किसी सा नहीं दीखता है. वैसे बिहार वाले चाहें तो इस पर गर्व कर सकते है कि इस 'बिहार' का विकास हिन्दी कहानी में बिहार से बाहर भी बहुत हुआ और नकली जनवाद का आतंक रचने में ये कहानियां अव्वल रहीं. अब सुधीश पचौरी  भले चिंता करें कि बिहार की कहानी में भागलपुर की खबर क्यों नहीं है? मुझे लगता है कि बिहार की कहानी का जो मूल संकट है वह यह कि यह न केवल अपने प्रान्त के परिवर्तनशील यथार्थ की उपेक्षा करती वरन् उससे काफी हद तक अनभिज्ञ भी है. इतिहास- बोध जैसी चीज का यहां बिल्कुल अभाव है और इसलिए यह अपने समय में अपनी अजनबीयत को पकड़ पाने में पिछड़ जाती है और अक्सर यथार्थ को एकांगी नजरिये से देखती है. इस 'टोटल कंसेप्शन' के अभाव के बाद बिहार-कहानी में विजन का विकास हो पाना तो मुमकिन न ही था, पर जैसा कि हिन्दी कहानी में होता है वह भाषिक क्षमता से विजन की अनुपस्थिति को छुपाती है और गाहे-बगाहे इसी प्रक्रिया से विजन को पाती है, वह भाषिक क्षमता प्राप्त करने में भी बिहार-कहानी अक्सर चूकती है. जबकि बिहार में कई सशक्त गद्य परंपराओं- वह चाहे शिवपूजन सहाय, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह का हो या फिर आंचलिकता का मिथ गढ़ने वाले 'रेणु' का- लंबा इतिहास रहा है. ऐसे में आज यह देखना हैरत भरा है कि बिहार के कहानीकारों की  कोई ऐसी व्यक्तिगत पहचान नहीं है कि आप उन्हें कुछ मानक आधारों पर अलग कर सकें. इस सिलसिले में शायद एक नाम है जिसे विचार में अवश्य रखा जाना चाहिए, वह है- चन्द्र किशोर जायसवाल. इन्होने हिन्दी कहानी में जो खास चीज विकसित की है वह है कथा के समांतर सहज व्यंग्य की, सहायक भाव की तरह उपस्थिति जो बिना किसी बड़बोलेपन के मनुष्य के अंतर के छद्म पर आघात करती है. और यह इसके बावजूद कि इनके यहां आंचलिकता न केवल आभिजात्य है, वरन् कथात्मकता की 'डिमांड' भी ज्यादा है.

(आगामी पोस्ट में चन्द्र किशोर जायसवाल की कहानी पर चर्चा)
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Saturday, 5 February 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा 
             हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं 
                                                                    - राकेश रोहित 
(भाग- 14) (पूर्व से आगे)


              हमारी हिंदी कहानी  लेखकीय संवेदन क्षमता की श्रेष्ठता और पाठकीय संवेदन योग्यता के प्रति संदेह से आक्रांत रहती है और इसलिए हमारी कहानी में 'स्पेस' का अभाव रहता है. वही सच है जो कहानी में है और वही सारा सच है, कुछ ऐसा ही भाव आज की कहानी प्रस्तुत करती है. और इसलिए हिंदी कहानी में अनुपस्थित-पात्र योजना का अभाव है. यह चीज फणीश्वर नाथ 'रेणु' में देखी जा सकती है. उनके यहां अनुपस्थित पात्र अक्सर कहानी को 'स्पेस' और 'डाइमेंशन' देते हैं. प्रकाश कांत की  अमर घर चल  (हंस, सितंबर, 1991) का जिक्र इसलिए किया जाना चाहिए कि यह उस 'तकनी' को अपनाती है. अमर घर चल  में केवल वह सच ही कहानी नहीं है जो बच्चे के प्रति आपके मासूम चिंताओं से रचा जाता है, बल्कि बच्चे के माध्यम से आप उस पिता के तनाव के आतंक तक पहुंचते हैं जो कहानी में अनुपस्थित है और जो आतंक बच्चे की दुनिया में रिसता हुआ बहता है. जब आप यह मान लेते हैं कि कहानी ने 'रिलेशन' का अंत कर दिया है कि सारे पात्र अब 'सेपरेट यूनिट'  हैं वहां माँ, माँ नहीं है, पिता, पिता नहीं हैं और बच्चा, बच्चा नहीं है तो आप पाते हैं कि बच्चा 'इररेशनल' होने की हद तक 'रिलेशन' को 'फाइंड' करना चाहता है और आप एक बेचैनी से भर जाते हैं. आप उस बेचैन दुनिया में प्रवेश करते हैं, बच्चा जिससे मुक्त होना चाहता है. यह जो एक पीढ़ी को 'एलियनेट' कर दिये जाने वाला माहौल है, कहानी उसको पकड़ना चाहती है और एक तार्किकता से जीवन के अनुपस्थित भाव को पा लेने की इच्छा से भर जाती है.
      
          रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी  द्वार पूजा (वर्तमान साहित्य, जुलाई 1991) पिपही बजाने  वाले झमेली द्वारा सुखदेव कलक्टर की बेटी की शादी में पिपही बजाने की इच्छा की कहानी है. यह एक सामान्य इच्छा रह जाती अगर झमेली सुखदेव के बाप और उनकी बहन की शादी में पिपही बजाने की परंपरा को अपने अधिकार से न जोड़ते और साथ-साथ इस भावना से न जुड़े रहते, "दुलहिन भी सुन लेगी हमारा बाजा." पर धीरे-धीरे कहानी में यह बात फैलती है,  "गांव वालों की कोई खास जरुरत नहीं है." और झमेली क्या अपनी अपमानित सत्ता से बेखबर पिपही बजाने के सुख में डूबा है? नहीं, जब आप देखते हैं कि विशाल शामियाने के पीछे गोहाल में उसने अपनी मंडली रची है, अपनी एक दुनिया बनायी है जिसमें उसकी सत्ता है. वह अब विवाह की घटना से जैसे ऊपर है कि झमेली  भी यह बात बिल्कुल भूल गया है कि वह अपनी पोती की शादी में पिपही बजाने आया है. इस दुनिया में उस चमक भरी दुनिया का हस्तक्षेप भी है जब सुखदेव बाबू पंडित चुनचुन झा को शास्त्री जी के साथ बैठ जाने को कहते हैं, "गरीब पुरोहित हैं, बेचारे को कुछ दान-दक्षिणा भी मिल जायेगी." और तब राधो सिंह पंडी जी को द्वार पूजा के लिये छोड़कर स्मृतियों के साथ जीवित दूसरी दुनिया में लौटते हैं. जहां एक संदेश पिपही से निकल कर फ़ैल रहा है, "माय हे, अब न बचत लंका--- राजमंदिर चढि कागा बोले---."   

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
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