Thursday, 26 January 2012

मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं - राकेश रोहित


कविता 
मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं 
- राकेश रोहित

मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं.
मैं कल छोड़ नहीं आया,
मेरे सपनों के तार वहीं से जुड़ते हैं.

मैं सुबह की वह पहली धूप हूँ -
जो छूती है
गहरी नींद के बाद थके मन को.
मैं आत्मा के दरवाजे पर
आधी रात की दस्तक हूँ.

जो दौड कर निकल गए
डराता है उनका उन्माद
कोई आएगा अँधेरे से चलकर
बीतती नहीं इसी उम्मीद में रात.

मैं उठाना चाहता हूँ
हर शब्द को उसी चमक से
जैसे कभी सीखा था
वर्णमाला का पहला अक्षर.
रुमान से झांकता सच हूँ  
हर अकथ का कथन
मैं हजार मनों में रोज खिलता
उम्मीद का फूल हूँ.

मेरी कविता में हजारों लोगों की
बसी हुई है
एक जीवित-जागृत दुनिया.
मैं रोज लड़ता हूँ
प्रलय की आस्तिक आशंका से
मैं उस दुनिया में रोज प्रलय बचाता हूँ.

मेरी कविता में उनकी दुनिया है
जिनकी मैं बातें करता हूँ
कविता में गर्म हवाओं का अहसास
उनकी साँसों से आता है.


Wednesday, 18 January 2012

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा
     हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

                                                           - राकेश रोहित

(भाग- 23) (समापन कड़ी,  पूर्व से आगे)

देवेन्द्र चौबे  की दूसरा आदमी (नवभारत  टाइम्स, दिल्ली  अक्टूबर  1991) में अकेली पड़ती घुटती  औरत है. नरेंद्र नागदेव की शीशा लग चुका है (जनसत्ता21 जुलाई,  1991) में बदलते वक्त की 'असुरक्षा'  से घिरा व्यक्ति पारदर्शी आवरण की 'सुरक्षा' तलाशता है. खिजाब (जनसत्ता28 जुलाई 1991) में अलका सरावगी लिखती हैं, "दमयंती जी ने प्रेम और स्वतंत्रता में स्वतंत्र रहने का चुनाव कर लिया है कि प्रेम सारी सहूलियतें और सुरक्षाएं भले ही दे सकता है पर स्वतंत्रता छीन लेता है." ऐसे में यह सहज ही सवाल उठता है कि क्यों अधिकांश लेखिकाएं अपनी बात नारी मुक्ति बनाम नारी चेतना की बहस से ही आरम्भ करती  हैं और कहानी अगर इस स्वतंत्रता के चुनाव को सनक भरे अस्त्तित्व में बदल देती है तो इससे क्या समझा जाये ज्योत्सना मिलन की पैर (संडे आब्जर्वर26  मई 1991) अच्छी कहानी है और अभिव्यक्ति प्रभावपूर्ण.

विजय की तैयारी (मुहिम, सितंबर 1991) बिना किसी पूर्व तैयारी की लिखी रचना है जो हमारे उलझन भरे समय को सरल समीकरण में बदलने की चेष्टा करती है. जयनंदन अपनी कहानी छठतलैया  (मुहिम, सितंबर 1991 में एक दुर्लभ किस्म का साम्प्रदायिक सदभाव रचते हैं. वासुदेव की प्रतीक्षा (मुहिम, सितंबर 1991)  मरणासन्न पिता की मृत्यु का प्रार्थनागीत है जो एक भौतिक विराग की संसृति करता है. और यह बात कई बार दुहराई गयी है. वलेनतीन रस्पुतीन (1937) की आख़री घड़ी से लेकर रामधारी सिंह दिवाकर की शोकपर्व (हंस) तक. हा धिक्, यह सार्वभौमिक प्रतीक्षा! मुहिम के पहले अंक में नारायण सिंह की कहानी स्त्रीपर्व स्त्री को उसकी गरिमा में स्थापित करती है. देवेन्द्र की बंटवारा (मुहिम-1) आंचलिक  यथार्थ की कहानी है. चंद्रकान्त राय की उमरकैद (मुहिम-1) यथार्थ को विभिन्न समय-कलाओं में पकड़ती हुई महत्वपूर्ण रचना बन जाती है. अकिंचन की कहानी सुग्गा भाग गया (रेल भारती, मार्च 1991) में पारिवारिक भावुकता अपनी प्रतीक योजना में पिछड़ जाती है. अमरेन्द्र मिश्र की टेलीफोन  (गूंज, अक्टूबर-दिसंबर 1991) में कहानी की तरह कहानीकार को अपना पक्ष पता नहीं है. प्रह्लाद श्रीमाली की कहानी दीवारें और आदमी  (मधुमती, अगस्त 1991) नये तरीके से लिखी गयी है. हनुमान दीक्षित की खाली हाथ  (मधुमती, अगस्त 1991 आतंकवाद का विरोध करती है. सुरेन्द्र तिवारी की उसका साथ (भाषा, मार्च 1991) सम्भावना के बावजूद कहानी होने से चुकती है.

राजाराम सिंह की कहानी अंत्योदय (कतार-12) एक व्यंग्य की तरह हावी होती है पर कुछ नया नहीं रचती है. राजाराम रजक की टेनिया (कतार-12) में केवल एक सत्य है और सारी कहानी उसे सिद्ध करती है. अरविन्द कुमार की कहानी नइकी भौजी (कतार-12) में मासूमियत से उत्पन्न रुमानियत मासूमियत को नष्ट कर देती है. धनेश दत्त पाण्डेय की करवट (कतार-12) मनुष्य के शोषण और उसके इस्तेमाल की कहानी है. समकालीन परिभाषा -में श्याम अविनाश की हाथ, खुर्शीद अकरम  की उमस और जेब अख्तर की ग्राफ नाराज-कहानी है जो हमारी नाराजी को व्यवस्था-विरोध में दर्ज करती है. सूरज प्रकाश की बाजीगर (संभव-7) जीवन के नाटक में  विरोध को बाजीगरी की तरह सहज  बनाना चाहती है. जवाहर सिंह की कफन की चिंता  (संभव -8,9,10) यथार्थ के भयानक होते जाने की खबर देती है. ज्ञान प्रकाश विवेक की जी. डी. उर्फ गरीब दास (संभव -8,9,10में भाषा और शिल्प का बेहतर प्रयोग कहानी को चुस्त बनाता है. कुंदन सिंह परिहार की अपराध  (साम्य -17) कहानी का अंत प्रभावी है.

सुधाकर की जुबेदा का गुस्सा (संवेद- 1) एक छोटी पर अच्छी कहानी है. शब्दों की सचेत मितव्ययिता मन को बेधती है पर अंत में जुबेदा का तुतलाकर बोलना खरता है. सच को कहने के लिए मासूमियत के सहारे की  जरुरत नहीं होनी चाहिए. "इंसान चाहे तो कम-से-कम चीजों से भी अपना कम चला सकता है, " सरफराज द्वारा नियति के इस स्वीकार को जुबेदा साइकिल की मांग कर तोड़ती है तो लगता है जैसे एक सन्नाटी संवादहीनता टूटती है. चंद्रमोहन प्रधान की खटमल (संवेद- 1) में खटमल को भी न मारनेवाले मंत्री  हुलास सिंह अपने अत्याचारी भाईयों को जिस तरह पिटवाते है वह फ़िल्मी रुमानियत के हिसाब से ही अच्छी लग सकती है. वैसे इस कहानी में 'हवेली' शब्द का अच्छा प्रयोग हुआ है जैसे, "हवेली को मारा कम घसीटा अधिक गया." शिव कुमार शिव की शताब्दी का सच (संवेद- 1) भागते हुए शहर भागलपुर के आतंक की कथा है. कहा जा सकता है कि 'संवेद' पत्रिका अपने पहले अंक से उम्मीद जगाती है और रचनात्मक नैतिकता का पूरी जिम्मेवारी से निर्वाह करती है. 

1992 के उत्तरार्द्ध में आयी, खासकर वर्तमान साहित्य कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता- 1991 में पुरस्कृत कहानियाँ हिंदी कथा लेखन के नये रुझान का संकेत देती है. चंदन प्रसाद सिंह की स्कूप, विनोद अनुपम की आयरन , फूलचंद गुप्ता की प्रायश्चित नहीं प्रतिशोध, डा. ईश्वर दत्त वर्मा की धर्मयुद्ध जैसी कहानियाँ यथार्थ को बारीक 'विट' के सहारे  पकडती है और यह  शायद हिंदी कहानी में एक तार्किक कथात्मकता की शुरुआत है जो विशुद्ध गल्पवाद  से भिन्न है. कारखाना के नये अंक में चंद्रकांत राय की जूते जादुई यथार्थवादी कहानी होते हुए भी जमीनी यथार्थ से किस तरह जुडी रहती है यह देखना महत्वपूर्ण है. इनके आलावा अन्य उल्लेखनीय कहानियों में ना सम जियत न मुंअले माहीं (प्रकाश  उदय), सेवड़ी रोटियां और जले आलू (हरि भटनागर), कर्मयोग (अब्दुल बिस्मिल्लाह), उपचार (गोविन्द मिश्र) आदि का नाम लिया जा सकता है पर इनकी चर्चा फिर कभी. 

संभावना / राकेश रोहित 

...तो ऐसा था हिंदी कहानी का एक संभावनापूर्ण साल!
 समाप्त 

Tuesday, 6 December 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित

कथाचर्चा
      हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                                                   - राकेश रोहित
(भाग- 22) (पूर्व से आगे)

'इंडिया टूडे' (30 सितम्बर 1991) में माला भोजवानी  का परिचय हिंदी कहानी के नए हस्ताक्षर के रुप में कराया गया है. वस्तुतः भाषा व प्रस्तुति के लिहाज से कहीं भी उनकी कहानी कम नहीं पड़ती है पर साथ ही वह कुछ नया भी नहीं जोड़ती है. चिंदी  नामक इस कहानी में केवल एक वाक्य - "मेरा वजूद अपनी सुरभि में खोकर चिंदी-चिंदी हो चुका था," कहानी के आखिर में लिख सकने के लिए कहानी तथा कहानी की एक पात्रा का नाम चिंदी रख देना लेखिका की कलात्मक अभियोजना तो दर्शा सकता है पर इससे वह कहानी उस 'सौ फीसदी कलावाले वृत्त से बाहर आने से रह जाती है जो ऐसी शैल्पिक सतर्कता से रचा जाता है. चिंदी कहानी को पढकर कमला चमोला की लाल फूलों वाला दुपट्टा (धर्मयुग3-9 नवंबर 1985) अनायास याद आती है. हेमंत की कहानी झूठ का सच्चा अंश  (धर्मयुग1-15 जनवरी 1991) अच्छी कहानी है जो अपनी समझ से प्रभावित करती है. निर्मल वर्मा की अंतराल  (साप्ताहिक हिंदुस्तान6-12 जनवरी 1991) में कहानी तक पहुंचना और उसे पा लेना एक अनुभव है. रामदरश मिश्र  की कहानी सोनू कब आएगा पापा (जनाधार भारतीअगस्त 1991) बल मनोविज्ञान पर आधारित रचना है जिसकी भाषा बड़ी मनोरम है. महेश दर्पण की जमीन (जनाधार भारतीअगस्त 1991) में वही अखबारी तनाव है जो कि धीरेन्द्र अस्थाना की कहानियों में भी कई बार दीखता है. अशोक गुप्ता की नींद (जनाधार भारती, अगस्त 1991) छल-जीवन के निश्छल नींद की कथा है. मैं बहुत हिचक के साथ कहना चाहूँगा कि सुशील कुमार की कहानी कनफूल (जनाधार भारतीअगस्त 1991) 'रेणु' जी की याद ताजा कर देती है, पर यहाँ वह जो अस्पष्ट है, रेणु की तरह कहानी में कुछ नया विस्तार नहीं रच पाता. साथ ही बंसी के दुःख से चंदर बाबू के दुःख का साम्य रचनात्मक प्रतिबद्धता को डगमगाता है. 
            बटरोही की कहानी भागता हुआ ठहरा आदमी (समकालीन भारतीय साहित्य -43) में जीवनशैली को निरंतर बदलता विचार है तो कथा श्यामा सुन्दरी (समकालीन भारतीय साहित्य -43) में विजय मोहन सिंह ने तत्सम शब्दों से कथा कही है. धनेश दत्त पाण्डेय की कहानी मुर्गा हलाल (अक्षरा, अप्रैल-सितंबर 1991) अपनी सम्पूर्ण संभावना का उपयोग नहीं करती है. मुर्गा हलाल में मुर्गे का मालिक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में जब राक्षस बनकर मुर्गे की गर्दन मरोड़ देता है तो यह वह स्थल हो सकता था जहां कहानी को यथार्थ के जादू में प्रवेश करना था. पुन्नी सिंह की तीसरा चेहरा (अब 18) बहुत मार्मिक कहानी है. सुभाष शर्मा की कहानी जल्लाद (अब 18) भी बेरोजगारी तक कुछ ज्यादा यथार्थ से पहुँची है. राजेन्द्र चंद्रकांत राय की कहानी आदिम (अब 18) में भोपाल के कुछ चित्र हैं. पुष्पपाल सिंह की कहानी फिर वही सवाल  (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991) की संभावनापूर्ण शुरुआत है पर कहानी युद्ध विरोध तक नहीं पहुँच पाती है. ये काले परदे कैसे हैं (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991) में कृष्ण बलदेव वैद तथा ईश्वर की सात और कहानियां (इंद्रप्रस्थ भारती, जुलाई-सितंबर 1991) में विष्णु नागर अपनी पहचान बरकरार रखते हैं जो कथा-शिल्प के नये मिजाज को पाने की कोशिश है. विष्णु नागर की ही शहीद रज्जब  (समकालीन भारतीय साहित्य -46) इस निकाय में मनुष्य की नियति पर अच्छा व्यंग्य है. इस कहानी की खासियत है कि यह छोटी होते हुए भी एक साथ कई फलकों को छूती है. नारायण सिंह की पानी (निष्कर्ष, मार्च 1991) यथार्थ की जमीन तक पहुँचती है कि उसी से उपजती है.

एक नन्हा करेला / राकेश रोहित 
  (आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
...जारी  

Saturday, 19 November 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित

कथाचर्चा
 हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                                          राकेश रोहित
(भाग- 21) (पूर्व से आगे)

        जीवन में जो आदर्श हैबेहतर है की मासूम स्थापना का स्वप्न लेकर 'पहल'-42 की कहानियां आती हैं. ये कहानियां सामान्यतः  किसी वैचारिक जीवट से प्रतिफलित न होने के बावजूद आदर्श के प्रति अपने आग्रह को सरल कथा-उपकरणों से बचाती हैं. स्वयं प्रकाश  की नेता जी का चश्मा में यह आग्रह नेताजी की मूर्ति के आँखों में बच्चे द्वारा बना सरकंडे का चश्मा लगा देखने और 'इतनी सी बातपर हालदार साहब की आँखें भर आने से अभिव्यक्त होता है. तो  सुबोध कुमार श्रीवास्तव  की कहानी धक्का  में 'बचऊ' द्वारा दीवार को पेशाब की धार से सींचने और उस पर उसकी माँ द्वारा आवाज देने से कि - "नंगा रहेगा तो ऐसे ही खेल खेलेगा."  इसी तरह परगट सिंह सिद्धू की कहानी  मैं उदास हो जाता हूँ में खूबसूरत दुनिया के रंग को महसूसने से छूटती पीढ़ी है. लक्षमेंद्र चोपड़ा की स्टूल राजनीति की बढ़ती ऊँचाई के छद्म को पकड़ती है और नत्थू द्वारा स्टूल बड़े सरकार को उनकी जरुरत के लिए भेंट करने की बात कर इस निकाय में जन की स्थिति पर मासूम पर सार्थक व्यंग्य करती है और अंत में इसी आस्था से मोहभंग की अभिव्यक्ति है. सुभाष शर्मा की कलकत्ते का जादू में हाथ की सफाई है और कलकत्ते को लेकर आये वक्तव्यों की श्रृंखला की एक और कड़ी. इस लिहाज से अखिलेश की बायोडाटा एक महत्वपूर्ण कहानी है क्योंकि सामान्य तरीके से विकसित होती हुई यह कहानी राजनीति के द्म की प्रवृत्ति को पकड़ने की कोशिश में स्थितियों और चरित्रों के प्रचलित मानकीकरण को नकारती हुई उस समय को अपने केन्द्र में रखती है जिसमें एक व्यक्ति की बदलती मानसिकता उसे एक सफल राजनीतिज्ञ बनाती जाती है. यह कहानी ठीक उस स्थल को छूती है जहाँ यह कहानी बनती है. ...और यहीं छूटती सावित्री है जो ऐसे संतान की माँ बनती है - "जो पीली और दुर्बल थी, चिचुकी हुई, बहुत बासी तरोई की तरह. उसमें जीवन  के चिन्ह नहीं थे, जीवन गायब था. बस जीवन की परछाई जैसे धप से गिर पड़ी हो."  इस तरह यह कहानी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में पीलियाई नई पीढ़ी के जन्म की भयावह सूचना देती है. और इससे राजदेव सिंह बिल्कुल निर्लिप्त है. वे अपने बायोडाटा की 'मास-अपील' पर सोचते हुए संतरा छीलने लगते है. "संतरे में बड़ा  रस था," यह कहानी की सबसे भयानक पंक्ति है जो एक आतंक की तरह हमारे अंदर फैलती है. और यह वह संतरा है जिसके बारे में  कवि केदारनाथ सिंह  ने अपनी एक कविता में लिखा है - 
...अपने हिस्से का संतरा 
मैं खाना चाहता हूँ 
इसलिए मेज की तरफ 
बढाता हूँ हाथ 
और कैसा करिश्मा है 
कि मेरे हाथ बढ़ाते ही 
वह गोल-गोल मेज 
अचानक हो जाती है 
पृथ्वी की तरह विशाल और अनंत 
.................................................
संतरा मेरा है 
और मैं डर रहा हूँ सवेरे-सवेरे 
कि कहीं यह सीधी-सी बात 
कि संतरा मेरा है 
विवाद में ना पड़ जाये ...!"(पहल - 37, 1988-89)

          आज से  लगभग पैंसठ वर्ष पूर्व की मान्यताओं को समझने के लिए चंद्रकिरण सौनेरेक्सा की इज्जत हतक (आजकल, अगस्त 1991) तथा विश्व प्रकाश दीक्षित 'बटुक' की भद्र महिला (आजकल, अक्टूबर  1991) पढ़ी  जानी चाहिए. वे जो सीधी सच्ची कथा में ऊष्मा महसूसते हैं मुक्ता की जिन्दा है करनैल चंद (आजकल, अगस्त 1991) पढ़ सकते हैं. रमा  सिंह की नयन जलधार (आजकल, जुलाई  1991) में आंसू का ड्रामा है. दिलीप सिंह की कहानी अपना कंधा अपनी लाश (आजकल, सितम्बर 1991) में अच्छा व्यंग्य है.

 फूलों-सा रंग हो जीवन में... पत्तों-सा हो हरापन! / राकेश रोहित 
(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
...जारी   

Saturday, 24 September 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा
     हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                                                  - राकेश रोहित
(भाग- 20) (पूर्व से आगे)

        'उद्भावना' रचनात्मक जिद की पत्रिका है और यह इसी का प्रतिफलन है कि वह मुद्दों पर एक विचलन की स्थिति पैदा कर पाती है. यही रचनात्मक जिद असगर वजाहत की आज की रचनाओं में देखी जा सकती है. वे अपनी पूरी कोशिश से आपको स्तब्ध कर सोचने पर विवश करती हैं. और यह अकारण नहीं है कि उद्भावना -24 में असगर वजाहत की बारह रचनाएं हैं. वे सांप्रदायिकता के विविध पहलुओं के अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मता से निरीक्षण करती हैं. गुरु-चेला संवाद असगर वजाहत की चर्चित रचना-कड़ी है और प्रभावी भी, जहां बात बड़ी सहजता से मुद्दों तक पहुँचती है. असगर वजाहत की एक और कहानी नाला (पल-प्रतिपल, अप्रैल-जून 1991) एक अनिवार्य आतंक को सामने करती है कि अपनी चिंताओं के मोर्चे पर हम कितने अकेले हैं. अशोक गुप्ता की ठहर जाओ सोनमुखी (वही) एक बालकोचित भावुक अपील है जो नानी के मौलिक व्यक्तित्व पर पड़ती 
"मुझे लगा जंगलों में रहते हुए आदमी जिंदगी में जो मिलता है उसी को बोते चलता है और धीरे-धीरे दु:खों का एक समानांतर जंगल खड़ा कर लेता है.'' 
हवेली की छाया का प्रतिषेध करती है और इसी बहाने एक वर्ग की मुक्ति की फ़िक्र. मंजूर एहतेशाम की कहानी कड़ी (पहल-40) बताती है कि कारण और परिणाम की दुनिया में हमारी जिंदगी किस तरह अपने भ्रम सहित निष्कर्ष और प्रयोग में गुजर जाती है. शशांक की पूरी रात (वही) मर रही दुनिया में कठिन सपनों के आंतरिक आतंक की कहानी है. भालचन्द्र जोशी की पहाड़ों पर रात (वही) बहुत ही अच्छी कहानी है. बिल्कुल सीधी-सादी कहानी, एक सुलझी गंभीर भाषा जो अनुभव की ईमानदारी से हासिल होती है और जो आदिवासियों के बहाने एक शोषित वर्ग के दुःख को सच्ची पीड़ा से महसूसते हुए कहीं अपने को बचाने या 'जस्टीफाई' करने की कोशिश नहीं करती है. इसे पढ़ना एक गहरे अनुभव से गुजरना है. यह बात कितनी अनुभूत पीड़ा से उपजती है, "मुझे लगा जंगलों में रहते हुए आदमी जिंदगी में जो मिलता है उसी को बोते चलता है और धीरे-धीरे दु:खों का एक समानांतर जंगल खड़ा कर लेता है." 

जंगल और जीवन / राकेश रोहित 

(आगामी पोस्ट में पहल- 42 की कहानियों पर चर्चा)
...जारी   

Saturday, 6 August 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा
                    हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                             - राकेश रोहित
(भाग- 19) (पूर्व से आगे)
         
आने वाले समय के तनाव को शिद्दत से महसूसने वाले रचनाकार के रूप में विनोद अनुपम का नाम लिया जाना चाहिए. उनकी पहली कहानी स्वप्न (सारिका) में आयी थी जो राजनीति के सीमान्त की ओर इशारा करती, आज की स्थितियों पर बहुत सटीक रचना है. उनकी नयी कहानी शापित यक्ष, वर्तमान साहित्य पुरस्कार अंक की श्रेष्ठ कहानी है. यह अपनी शीर्षक संकल्पना में परंपरा के मिथ का बहुत सजग इस्तेमाल करती है और समूची कहानी उसका निर्वहन करती है. इसके अलावा वर्तमान साहित्य में निषेध (नारायण सिंह), माफ करो वासुदेव (वही), मदार के फूल (अनन्त कुमार सिंह), बांस का किला (नर्मदेश्वर), सबसे बड़ी छलांग (रामस्वरूप अणखी), अपूर्व भोज (रमा सिंह), प्रतिहिंसा (राणा प्रताप), संशय की एक रात (कृष्ण मोहन झा) आदि कहानियाँ अपने महत्व में पठनीय हैं. सिम्मी हर्षिता  की कहानी इस तरह की बातें (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991) में जिस व्यवस्था से मुक्ति की कोशिश है उसके विरुद्ध किसी चेतना का विकास कहानी नहीं करती है. प्रेम रंजन अनिमेष की ऐसी जिद क्या (वर्त्तमान साहित्य, अक्टूबर 1991) में आत्मीयता की जो प्रतीक्षा है वह हिंदी में बूढ़ी काकी (प्रेमचंद) जैसी कहानियों के सिवा दुर्लभ है.

मध्यवर्गीय आत्म-रति को स्थापित करती सूरज प्रकाश की कहानी उर्फ चंदरकला  जैसी कहानी का दो पत्रिकाओं  वर्तमान  साहित्य (नवंबर 1991) तथा संबोधन-91 में प्रकाशन संपादकीय नैतिकता पर प्रश्न लगाता है. सूरज प्रकाश जी की ही लिखी टिप्पणी "अश्लीलता के बहाने कुछ नोट्स" (हंस, जून 1991) के संदर्भ  में ही सवाल उठता है  कि अगर उनका आग्रह चंदरकला को  'इरोटिक'  न माने जाने का है तो क्या यह उनके ही शब्दों में एक वर्ग को पशु करार किये जाने की कोशिश नहीं है.  मैनेजर पांडेय  ने अपने आलेख "यह कछुआ धर्म अभी और कब तक" (हंस, फरवरी 1991) में लिखा है - "व्यवस्था के शील पर चोट करने के लिए अश्लीलता हथौड़े की तरह काम करती है." अगर  सूरज प्रकाश की कहानी व्यवस्था के शील पर चोट नहीं करती तो फिर यह अश्लील क्यों है?  रघुनंदन त्रिवेदी की खोई हुई एक चीज (संबोधन-91) अपनी तलाश में शामिल करती है तो यह एक बड़ी बात है. रूप सिंह चंदेल की चेहरे (संबोधन-91) में शैक्षणिक संस्थानों का वह चेहरा सामने आता है जहां एक सहज व्यक्ति अपने को इस्तेमाल किये जाने और अंत में मोहभंग को स्वीकारने के लिए विवश है.

इस रंग बदलती दुनिया में  / राकेश रोहित 

(आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
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