Wednesday, 10 July 2013

मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है - राकेश रोहित

कविता


मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है

- राकेश रोहित 

मुझे लगता है मंगल ग्रह पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में 
कहीं कोई एक कविता धरती के बारे में है!

आँखों से बहे आंसू
जो आँखों से बहे और कहीं नहीं पहुंचे
आवाज जो दिल से निकली और
दिल तक नहीं पहुंची!
उसी कविता की बीच की किन्हीं पंक्तियों में
उन आंसुओं का जिक्र है
उस आवाज की पुकार है.

संसार के सभी असंभव दुःख जो नहीं होने थे और हुए
मुझे लगता है उस कविता में
उन दुखों की वेदना की आवृत्ति है.

पता नहीं वह कविता लिखी जा चुकी है
या अब भी लिखी जा रही है
क्योंकि धरती पर अभी-अभी लुप्त हुई प्रजाति का 
जिक्र उस कविता में है.

मुझे लगता है संसार के सबसे सुंदर सपनों में
कट कर  भटकती  उम्मीद की पतंग
मंगल ग्रह के ही किसी वीराने पहाड़ से टकराती है
और अब भी जब इस सुंदर धरती को बचाने की
कविता की कोशिशें विफल होती है
मंगल ग्रह पर तूफान उठते हैं.

मुझे लगता है
जैसे धरती पर एक कविता
मंगल ग्रह के बारे में है
ठीक वैसे ही मंगल ग्रह पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में
कहीं कोई एक कविता धरती के बारे में है!


मुझे लगता है... / राकेश रोहित 

Friday, 21 June 2013

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य - राकेश रोहित

कविता

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य 
- राकेश रोहित 


सब्जियों का रंग बचाने में
उनका स्वाद छूटता जाता है.

कोई हर दिन, सुबह-शाम
रंगता रहता चीजों को.

जैसे कोई मुरझाये होठों को
रंगता है मुस्कान की तरह!
जैसे कोई परछाई घर से निकलती है
रंगकर अपने को मनुष्य की तरह.


दोस्तों! यदि ऐसे ही बाजार
चुराता रहा जीवन का स्वाद,
एक पीढ़ी पुरातत्वविदों की तरह
चीजों के नाम में चीजों को तलाशेगी.

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य / राकेश रोहित 

Saturday, 3 November 2012

मोड़ - राकेश रोहित

कविता

मोड़ 
- राकेश रोहित 

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.

देखती हैं टिमटिमाती बत्तियाँ
भौंकते हैं कुछ कुत्ते आवारा
घबराकर कोई खिड़की खुली
छोड़ देता है.

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

दम घुटता है खामोशी का इस मोड़ पर
मोड़ भी कुछ कम नहीं परेशान है
मरने से पहले कोई करता है क्या बयान
कि शेष रह जाती उसकी पहचान है!

यूँ तो यह मोड़ भी रहता नहीं खामोश है
है जारी भारी चहल-पहल
महलों का पहरा ठोस है.

पर कोई-ना कोई
यह किस्सा तो जोड़ देता है
हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

मोड़ / राकेश रोहित 


Thursday, 11 October 2012

ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं - राकेश रोहित

कविता 

ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं 
- राकेश रोहित 

हर रोज नया कुछ सीखता हूँ मैं
हर दिन बढ़ता है कुछ ज्ञान
ओ ईश्वर! मैं क्या करूं इतने ज्ञान का
हर दिन कुछ और कठिन होता जाता है जीवन.

पत्तों की तरह सोख सकूँ
धूप, हवा और चाँदनी
फूल की तरह खिलूँ
रंगों की ऊर्जा से भरा.

पकूं एक दिन फल की तरह
गंध के संसार में
फैल जाऊं बीज की तरह
अनंत के विस्तार में.

हरियाली की तरह बिखरा रहूँ
सृष्टि के समवाय में
ना कि ज्ञान की तरह
अपूर्ण, असहाय मैं!

हरसिंगार / राकेश रोहित 

Saturday, 14 July 2012

मेरे अंदर एक गुस्सा है... / राकेश रोहित


मेरे अंदर एक गुस्सा है...
- राकेश रोहित

मेरे अंदर एक गुस्सा है,   गुस्से को दबाये बैठा हूँ
मैं जिस गम के दरिया में डूबा हूँ, उस गम को भुलाये बैठा हूँ.

लहरों ने साहिल पर तोड़ दिये, घरौंदे कितने बचपन के
इन लहरों से मैं सपने की उम्मीद लगाये बैठा हूँ.

दुनिया अनजानी हँसती थी - मंजिल का पता भी भूल गये?
वो क्या जाने मैं कागज की कश्ती बचपन से बनाये बैठा हूँ.

वो रात बड़ी अंधियारी थी, जब तुम आये मेरे घर में
तब से आंगन में सौ-सौ दीपक यादों के जलाये बैठा हूँ.

एक जंग जैसे है दुनिया, एक दिन जीता एक दिन हारा
कुछ मन में छुपाये बैठा हूँ, कुछ सब को बताए बैठा हूँ.


कुछ मन में छुपाये बैठा हूँकुछ सब को बताए बैठा हूँ / राकेश रोहित 

Monday, 7 May 2012

जब बाज़ार में आया प्यार - राकेश रोहित


कविता
जब बाज़ार में आया प्यार
- राकेश रोहित

बाज़ार बेचता है प्यार,
पल-पल बढते हैं खरीदार.
जिसको जैसी हो दरकार,
वैसी ले जायें सरकार!

अगर आपका मन सूना है
तो आपने सही क्षण चुना है
एंड ऑफ सीजनका सेल है,
ऑफर  की है यहाँ भरमार!

बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.

टेडी बीयर या लाल गुलाब
इस प्यार का नहीं जवाब!
बंद पाकेट में, शाकप्रूफ है
देखें कितना सुंदर रूप है!!

जैसी कीमत वैसे रंग,
सदा चलेगा आपके संग.
चाभी के छल्ले में प्यार,
देख हुआ मैं चकित यार!

बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.

बेस्ट बिफोरकी तारीख के साथ
चाकलेट के डब्बे में प्यार,
पोर्सलीन की यह हसीना 
आपको अपलक रही निहार.

सुंदर 'एसएमएस-बुक' है
आपके दिल का है इजहार,
अपनी आँखें हमें दीजिये
हम कर आयेंगे चार!

जब बाज़ार में आया प्यार
हमने देखे रंग हजार!
बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.


जब बाज़ार में आया प्यार / राकेश रोहित

Sunday, 1 April 2012

कविता के अभयारण्य में - राकेश रोहित


कविता 
कविता के अभयारण्य में
- राकेश रोहित

जब कुछ नहीं रहेगा 
क्या रहेगा?
मैं पूछता हूँ बार-बार 
भरकर मन में चिंता अपार
कोई नहीं सुनता...
मैं पूछता हूँ बार-बार.

लोग हँसते हैं 
शायद सुनकर
शायद मेरी बेचैनी पर 
उनकी हँसी में मेरा डर है-
जब कुछ नहीं रहेगा 
क्या रहेगा?

नहीं रहेगा सुख 
दुःख भी नहीं 
नहीं रहेगी आत्मा,
जब नहीं रहेगा कुछ 
नहीं रहेगा भय.

कोई नहीं कहता रोककर मुझे
मेरा भय अकारण है 
कि नष्ट होकर भी रह जायेगा कुछ 
मैं बार-बार लौटता हूँ 
कविता के अभयारण्य में 
जैसे मेरी जड़ें वहाँ हैं.

मित्रों, मैं कविता नहीं करता 
मैं खुद से लड़ता हूँ -
जब नहीं रहेगा कुछ 
क्या रहेगा?

कविता के अभयारण्य में /राकेश रोहित 

Saturday, 3 March 2012

सोयी हुई स्त्री, कविता में - राकेश रोहित


कविता
सोयी हुई स्त्री, कविता में 
- राकेश रोहित

दोस्तों गजब हुआ,  यह अल्लसबेरे...
मैंने पढ़ी एक कविता स्त्रियों के बारे में. 
कविता थी पर सच-सा उसका बयान था,
कविता सोयी हुई स्त्रियों के बारे में थी.

सोये हुए के बारे में बात करना अक्सर आसान होता है
क्योंकि एक स्वतंत्रता-सी रहती है
कथ्य बयानी में,
पता नहीं कवि को इसका कितना ध्यान था
पर कविता में नींद का सुंदर रुमान था.

बात सोये होने की थी
समय सुबह का था
अचरज नहीं कविता में एक स्वप्न का भान था.
मैं पढ़कर चकित होता था
पर यह तय नहीं था कि मैं जगा था.

सुबह-सवेरे देखे  गए सपने की तरह
कविता का अहसास  मेरे मन में है
पर सोचकर यह बार-बार बेचैन होता हूँ -
सोयी हुई स्त्री जब कविता में आती है 
तो क्या उसकी नींद टूट जाती है?

सोयी हुई स्त्री, कविता में / राकेश रोहित

Wednesday, 15 February 2012

पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम - राकेश रोहित


कविता 
पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम
 - राकेश रोहित 

सर्द रातों में
ठंडे पानी के स्पर्श लगता है
जैसे छू रहा हूँ हिमनद से आया बर्फीला जल
जो हजारों वर्ष पहले
बहकर आया होगा किसी नदी में
और फिर बहता ही रहा होगा.

ऐसी छूती है ठंडी हवा
जैसे दक्षिणी ध्रुव से बहकर आयी हवा
पहली बार छू रही होगी
किसी आदिम मानव को.

जैसे पिछली सर्दियों में
हड्डियों के बीच
बची रह गयी सिहरन जाग रही है
वैसे कांपता हूँ इन सर्दियों में.

ऐसे लहकती है आग
इस सर्द रात में
जैसे हमारे पूर्वजों के सांसों की
ऊष्मा भरी है उसमें.

ऐसे नहीं आया यह मिट्टी सना आलू
इसकी मिट्टी में अब भी
उनके  पैरों की छाप है
जो ओस भरी सुबहों में
तलाश लाए थे इसे
हरे पत्तों की जड़ों के नीचे.

भुनता है आलू तो
याद उन्हीं की आती है
जो तलाश लाए होंगे
पहली बार
पत्थरों में छिपी आग.

सूरज से नहीं
वीराने में अंधड की तरह भटकती हवा से नहीं
पहाड़ों पर पिघल रहे ग्लेशियर से नहीं और
नियम की तरह अनवरत घूमती धरती से नहीं
हमसे रचा गया है यह मौसम.

पहले हम हुए,
फिर हुआ मौसम.

पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम / राकेश रोहित 

Thursday, 26 January 2012

मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं - राकेश रोहित


कविता 
मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं 
- राकेश रोहित

मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं.
मैं कल छोड़ नहीं आया,
मेरे सपनों के तार वहीं से जुड़ते हैं.

मैं सुबह की वह पहली धूप हूँ -
जो छूती है
गहरी नींद के बाद थके मन को.
मैं आत्मा के दरवाजे पर
आधी रात की दस्तक हूँ.

जो दौड कर निकल गए
डराता है उनका उन्माद
कोई आएगा अँधेरे से चलकर
बीतती नहीं इसी उम्मीद में रात.

मैं उठाना चाहता हूँ
हर शब्द को उसी चमक से
जैसे कभी सीखा था
वर्णमाला का पहला अक्षर.
रुमान से झांकता सच हूँ  
हर अकथ का कथन
मैं हजार मनों में रोज खिलता
उम्मीद का फूल हूँ.

मेरी कविता में हजारों लोगों की
बसी हुई है
एक जीवित-जागृत दुनिया.
मैं रोज लड़ता हूँ
प्रलय की आस्तिक आशंका से
मैं उस दुनिया में रोज प्रलय बचाता हूँ.

मेरी कविता में उनकी दुनिया है
जिनकी मैं बातें करता हूँ
कविता में गर्म हवाओं का अहसास
उनकी साँसों से आता है.


Wednesday, 18 January 2012

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित


कथाचर्चा
     हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं

                                                           - राकेश रोहित

(भाग- 23) (समापन कड़ी,  पूर्व से आगे)

देवेन्द्र चौबे  की दूसरा आदमी (नवभारत  टाइम्स, दिल्ली  अक्टूबर  1991) में अकेली पड़ती घुटती  औरत है. नरेंद्र नागदेव की शीशा लग चुका है (जनसत्ता21 जुलाई,  1991) में बदलते वक्त की 'असुरक्षा'  से घिरा व्यक्ति पारदर्शी आवरण की 'सुरक्षा' तलाशता है. खिजाब (जनसत्ता28 जुलाई 1991) में अलका सरावगी लिखती हैं, "दमयंती जी ने प्रेम और स्वतंत्रता में स्वतंत्र रहने का चुनाव कर लिया है कि प्रेम सारी सहूलियतें और सुरक्षाएं भले ही दे सकता है पर स्वतंत्रता छीन लेता है." ऐसे में यह सहज ही सवाल उठता है कि क्यों अधिकांश लेखिकाएं अपनी बात नारी मुक्ति बनाम नारी चेतना की बहस से ही आरम्भ करती  हैं और कहानी अगर इस स्वतंत्रता के चुनाव को सनक भरे अस्त्तित्व में बदल देती है तो इससे क्या समझा जाये ज्योत्सना मिलन की पैर (संडे आब्जर्वर26  मई 1991) अच्छी कहानी है और अभिव्यक्ति प्रभावपूर्ण.

विजय की तैयारी (मुहिम, सितंबर 1991) बिना किसी पूर्व तैयारी की लिखी रचना है जो हमारे उलझन भरे समय को सरल समीकरण में बदलने की चेष्टा करती है. जयनंदन अपनी कहानी छठतलैया  (मुहिम, सितंबर 1991 में एक दुर्लभ किस्म का साम्प्रदायिक सदभाव रचते हैं. वासुदेव की प्रतीक्षा (मुहिम, सितंबर 1991)  मरणासन्न पिता की मृत्यु का प्रार्थनागीत है जो एक भौतिक विराग की संसृति करता है. और यह बात कई बार दुहराई गयी है. वलेनतीन रस्पुतीन (1937) की आख़री घड़ी से लेकर रामधारी सिंह दिवाकर की शोकपर्व (हंस) तक. हा धिक्, यह सार्वभौमिक प्रतीक्षा! मुहिम के पहले अंक में नारायण सिंह की कहानी स्त्रीपर्व स्त्री को उसकी गरिमा में स्थापित करती है. देवेन्द्र की बंटवारा (मुहिम-1) आंचलिक  यथार्थ की कहानी है. चंद्रकान्त राय की उमरकैद (मुहिम-1) यथार्थ को विभिन्न समय-कलाओं में पकड़ती हुई महत्वपूर्ण रचना बन जाती है. अकिंचन की कहानी सुग्गा भाग गया (रेल भारती, मार्च 1991) में पारिवारिक भावुकता अपनी प्रतीक योजना में पिछड़ जाती है. अमरेन्द्र मिश्र की टेलीफोन  (गूंज, अक्टूबर-दिसंबर 1991) में कहानी की तरह कहानीकार को अपना पक्ष पता नहीं है. प्रह्लाद श्रीमाली की कहानी दीवारें और आदमी  (मधुमती, अगस्त 1991) नये तरीके से लिखी गयी है. हनुमान दीक्षित की खाली हाथ  (मधुमती, अगस्त 1991 आतंकवाद का विरोध करती है. सुरेन्द्र तिवारी की उसका साथ (भाषा, मार्च 1991) सम्भावना के बावजूद कहानी होने से चुकती है.

राजाराम सिंह की कहानी अंत्योदय (कतार-12) एक व्यंग्य की तरह हावी होती है पर कुछ नया नहीं रचती है. राजाराम रजक की टेनिया (कतार-12) में केवल एक सत्य है और सारी कहानी उसे सिद्ध करती है. अरविन्द कुमार की कहानी नइकी भौजी (कतार-12) में मासूमियत से उत्पन्न रुमानियत मासूमियत को नष्ट कर देती है. धनेश दत्त पाण्डेय की करवट (कतार-12) मनुष्य के शोषण और उसके इस्तेमाल की कहानी है. समकालीन परिभाषा -में श्याम अविनाश की हाथ, खुर्शीद अकरम  की उमस और जेब अख्तर की ग्राफ नाराज-कहानी है जो हमारी नाराजी को व्यवस्था-विरोध में दर्ज करती है. सूरज प्रकाश की बाजीगर (संभव-7) जीवन के नाटक में  विरोध को बाजीगरी की तरह सहज  बनाना चाहती है. जवाहर सिंह की कफन की चिंता  (संभव -8,9,10) यथार्थ के भयानक होते जाने की खबर देती है. ज्ञान प्रकाश विवेक की जी. डी. उर्फ गरीब दास (संभव -8,9,10में भाषा और शिल्प का बेहतर प्रयोग कहानी को चुस्त बनाता है. कुंदन सिंह परिहार की अपराध  (साम्य -17) कहानी का अंत प्रभावी है.

सुधाकर की जुबेदा का गुस्सा (संवेद- 1) एक छोटी पर अच्छी कहानी है. शब्दों की सचेत मितव्ययिता मन को बेधती है पर अंत में जुबेदा का तुतलाकर बोलना खरता है. सच को कहने के लिए मासूमियत के सहारे की  जरुरत नहीं होनी चाहिए. "इंसान चाहे तो कम-से-कम चीजों से भी अपना कम चला सकता है, " सरफराज द्वारा नियति के इस स्वीकार को जुबेदा साइकिल की मांग कर तोड़ती है तो लगता है जैसे एक सन्नाटी संवादहीनता टूटती है. चंद्रमोहन प्रधान की खटमल (संवेद- 1) में खटमल को भी न मारनेवाले मंत्री  हुलास सिंह अपने अत्याचारी भाईयों को जिस तरह पिटवाते है वह फ़िल्मी रुमानियत के हिसाब से ही अच्छी लग सकती है. वैसे इस कहानी में 'हवेली' शब्द का अच्छा प्रयोग हुआ है जैसे, "हवेली को मारा कम घसीटा अधिक गया." शिव कुमार शिव की शताब्दी का सच (संवेद- 1) भागते हुए शहर भागलपुर के आतंक की कथा है. कहा जा सकता है कि 'संवेद' पत्रिका अपने पहले अंक से उम्मीद जगाती है और रचनात्मक नैतिकता का पूरी जिम्मेवारी से निर्वाह करती है. 

1992 के उत्तरार्द्ध में आयी, खासकर वर्तमान साहित्य कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता- 1991 में पुरस्कृत कहानियाँ हिंदी कथा लेखन के नये रुझान का संकेत देती है. चंदन प्रसाद सिंह की स्कूप, विनोद अनुपम की आयरन , फूलचंद गुप्ता की प्रायश्चित नहीं प्रतिशोध, डा. ईश्वर दत्त वर्मा की धर्मयुद्ध जैसी कहानियाँ यथार्थ को बारीक 'विट' के सहारे  पकडती है और यह  शायद हिंदी कहानी में एक तार्किक कथात्मकता की शुरुआत है जो विशुद्ध गल्पवाद  से भिन्न है. कारखाना के नये अंक में चंद्रकांत राय की जूते जादुई यथार्थवादी कहानी होते हुए भी जमीनी यथार्थ से किस तरह जुडी रहती है यह देखना महत्वपूर्ण है. इनके आलावा अन्य उल्लेखनीय कहानियों में ना सम जियत न मुंअले माहीं (प्रकाश  उदय), सेवड़ी रोटियां और जले आलू (हरि भटनागर), कर्मयोग (अब्दुल बिस्मिल्लाह), उपचार (गोविन्द मिश्र) आदि का नाम लिया जा सकता है पर इनकी चर्चा फिर कभी. 

संभावना / राकेश रोहित 

...तो ऐसा था हिंदी कहानी का एक संभावनापूर्ण साल!
 समाप्त 

Tuesday, 6 December 2011

हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित

कथाचर्चा
      हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
                                                                   - राकेश रोहित
(भाग- 22) (पूर्व से आगे)

'इंडिया टूडे' (30 सितम्बर 1991) में माला भोजवानी  का परिचय हिंदी कहानी के नए हस्ताक्षर के रुप में कराया गया है. वस्तुतः भाषा व प्रस्तुति के लिहाज से कहीं भी उनकी कहानी कम नहीं पड़ती है पर साथ ही वह कुछ नया भी नहीं जोड़ती है. चिंदी  नामक इस कहानी में केवल एक वाक्य - "मेरा वजूद अपनी सुरभि में खोकर चिंदी-चिंदी हो चुका था," कहानी के आखिर में लिख सकने के लिए कहानी तथा कहानी की एक पात्रा का नाम चिंदी रख देना लेखिका की कलात्मक अभियोजना तो दर्शा सकता है पर इससे वह कहानी उस 'सौ फीसदी कलावाले वृत्त से बाहर आने से रह जाती है जो ऐसी शैल्पिक सतर्कता से रचा जाता है. चिंदी कहानी को पढकर कमला चमोला की लाल फूलों वाला दुपट्टा (धर्मयुग3-9 नवंबर 1985) अनायास याद आती है. हेमंत की कहानी झूठ का सच्चा अंश  (धर्मयुग1-15 जनवरी 1991) अच्छी कहानी है जो अपनी समझ से प्रभावित करती है. निर्मल वर्मा की अंतराल  (साप्ताहिक हिंदुस्तान6-12 जनवरी 1991) में कहानी तक पहुंचना और उसे पा लेना एक अनुभव है. रामदरश मिश्र  की कहानी सोनू कब आएगा पापा (जनाधार भारतीअगस्त 1991) बल मनोविज्ञान पर आधारित रचना है जिसकी भाषा बड़ी मनोरम है. महेश दर्पण की जमीन (जनाधार भारतीअगस्त 1991) में वही अखबारी तनाव है जो कि धीरेन्द्र अस्थाना की कहानियों में भी कई बार दीखता है. अशोक गुप्ता की नींद (जनाधार भारती, अगस्त 1991) छल-जीवन के निश्छल नींद की कथा है. मैं बहुत हिचक के साथ कहना चाहूँगा कि सुशील कुमार की कहानी कनफूल (जनाधार भारतीअगस्त 1991) 'रेणु' जी की याद ताजा कर देती है, पर यहाँ वह जो अस्पष्ट है, रेणु की तरह कहानी में कुछ नया विस्तार नहीं रच पाता. साथ ही बंसी के दुःख से चंदर बाबू के दुःख का साम्य रचनात्मक प्रतिबद्धता को डगमगाता है. 
            बटरोही की कहानी भागता हुआ ठहरा आदमी (समकालीन भारतीय साहित्य -43) में जीवनशैली को निरंतर बदलता विचार है तो कथा श्यामा सुन्दरी (समकालीन भारतीय साहित्य -43) में विजय मोहन सिंह ने तत्सम शब्दों से कथा कही है. धनेश दत्त पाण्डेय की कहानी मुर्गा हलाल (अक्षरा, अप्रैल-सितंबर 1991) अपनी सम्पूर्ण संभावना का उपयोग नहीं करती है. मुर्गा हलाल में मुर्गे का मालिक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में जब राक्षस बनकर मुर्गे की गर्दन मरोड़ देता है तो यह वह स्थल हो सकता था जहां कहानी को यथार्थ के जादू में प्रवेश करना था. पुन्नी सिंह की तीसरा चेहरा (अब 18) बहुत मार्मिक कहानी है. सुभाष शर्मा की कहानी जल्लाद (अब 18) भी बेरोजगारी तक कुछ ज्यादा यथार्थ से पहुँची है. राजेन्द्र चंद्रकांत राय की कहानी आदिम (अब 18) में भोपाल के कुछ चित्र हैं. पुष्पपाल सिंह की कहानी फिर वही सवाल  (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991) की संभावनापूर्ण शुरुआत है पर कहानी युद्ध विरोध तक नहीं पहुँच पाती है. ये काले परदे कैसे हैं (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991) में कृष्ण बलदेव वैद तथा ईश्वर की सात और कहानियां (इंद्रप्रस्थ भारती, जुलाई-सितंबर 1991) में विष्णु नागर अपनी पहचान बरकरार रखते हैं जो कथा-शिल्प के नये मिजाज को पाने की कोशिश है. विष्णु नागर की ही शहीद रज्जब  (समकालीन भारतीय साहित्य -46) इस निकाय में मनुष्य की नियति पर अच्छा व्यंग्य है. इस कहानी की खासियत है कि यह छोटी होते हुए भी एक साथ कई फलकों को छूती है. नारायण सिंह की पानी (निष्कर्ष, मार्च 1991) यथार्थ की जमीन तक पहुँचती है कि उसी से उपजती है.

एक नन्हा करेला / राकेश रोहित 
  (आगामी पोस्ट में उस वर्ष की अन्य कहानियों पर चर्चा)
...जारी