Monday, 21 October 2013
Friday, 4 October 2013
पंचतंत्र, मेमने और बाघ - राकेश रोहित
कविता
पंचतंत्र, मेमने और बाघ
- राकेश रोहित
पानी की तलाश में मेमने
पंचतंत्र की कहानियों से बाहर निकल आते हैं
और हर बार पानी के हर स्रोत पर
कोई बाघ उनका इंतजार कर रहा होता है.
मेमनों के पास तर्क होते हैं,
और बाघ के पास बहाने.
मेमने हर बार नये होते हैं
और बाघ नया हो या पुराना
फर्क नहीं पड़ता.
जिसने यह कहानी लिखी
वह पहले ही जान गया था -
"मेमने अपनी प्यास के लिए मरते हैं
और ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती!"
- राकेश रोहित
पानी की तलाश में मेमने
पंचतंत्र की कहानियों से बाहर निकल आते हैं
और हर बार पानी के हर स्रोत पर
कोई बाघ उनका इंतजार कर रहा होता है.
मेमनों के पास तर्क होते हैं,
और बाघ के पास बहाने.
मेमने हर बार नये होते हैं
और बाघ नया हो या पुराना
फर्क नहीं पड़ता.
जिसने यह कहानी लिखी
वह पहले ही जान गया था -
"मेमने अपनी प्यास के लिए मरते हैं
और ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती!"
| ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती / राकेश रोहित |
Friday, 16 August 2013
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि - राकेश रोहित
कविता
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि
- राकेश रोहित
जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?
अंततः एक कवि को
स्वप्न-द्रष्टा होना होता है।
आश्चर्य नहीं,
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि
वह जानता है बहुत कठिन होता है
अच्छी कविता का जीवन!
आसान नहीं होती राजपथ पर
हजार सपनों से सजे बचपन की राह।
अंधेरे ब्रह्मांड में जो तारों को
हजार सूरज की तरह चमकाता है
कोई नहीं जानता इस कृष्ण- विवर में
कवि इतनी ऊर्जा कहाँ से लाता है?
उम्मीद से भरे शब्द
कवि के लिए
कविता में एक सपना बुनते हैं!
जब दिल देता नहीं साथ,
गहन निराशा में
हम कविता की सुनते हैं।
है ऐसे में सहज यह अचरज
जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?
वे कविता का क्या करते हैं?
अंततः एक कवि को
स्वप्न-द्रष्टा होना होता है।
आश्चर्य नहीं,
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि
वह जानता है बहुत कठिन होता है
अच्छी कविता का जीवन!
आसान नहीं होती राजपथ पर
हजार सपनों से सजे बचपन की राह।
अंधेरे ब्रह्मांड में जो तारों को
हजार सूरज की तरह चमकाता है
कोई नहीं जानता इस कृष्ण- विवर में
कवि इतनी ऊर्जा कहाँ से लाता है?
उम्मीद से भरे शब्द
कवि के लिए
कविता में एक सपना बुनते हैं!
जब दिल देता नहीं साथ,
गहन निराशा में
हम कविता की सुनते हैं।
है ऐसे में सहज यह अचरज
जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?
| एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि / राकेश रोहित |
Wednesday, 10 July 2013
मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है - राकेश रोहित
कविता
मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है
- राकेश रोहित
मुझे लगता है मंगल ग्रह
पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में
कहीं
कोई एक कविता धरती के बारे में है!
आँखों से बहे आंसू
जो आँखों से बहे और कहीं
नहीं पहुंचे
आवाज जो दिल से निकली और
दिल तक नहीं पहुंची!
उसी कविता की बीच की
किन्हीं पंक्तियों में
उन आंसुओं का जिक्र है
उस आवाज की पुकार है.
संसार के सभी असंभव दुःख
जो नहीं होने थे और हुए
मुझे लगता है उस कविता
में
उन दुखों की वेदना की
आवृत्ति है.
पता नहीं वह कविता लिखी
जा चुकी है
या अब भी लिखी जा रही है
क्योंकि धरती पर अभी-अभी
लुप्त हुई प्रजाति का
जिक्र उस कविता में है.
मुझे लगता है संसार के
सबसे सुंदर सपनों में
कट कर भटकती
उम्मीद की पतंग
मंगल ग्रह के ही किसी
वीराने पहाड़ से टकराती है
और अब भी जब इस सुंदर धरती
को बचाने की
कविता की कोशिशें विफल
होती है
मंगल ग्रह पर तूफान उठते
हैं.
मुझे लगता है
जैसे धरती पर एक कविता
मंगल ग्रह के बारे में
है
ठीक वैसे ही मंगल ग्रह
पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में
कहीं कोई एक कविता धरती
के बारे में है!![]() |
| मुझे लगता है... / राकेश रोहित |
Friday, 21 June 2013
सब्जियाँ, रंग और मनुष्य - राकेश रोहित
कविता
सब्जियाँ, रंग और मनुष्य
- राकेश रोहित
दोस्तों! यदि ऐसे ही बाजार
चुराता रहा जीवन का स्वाद,
एक पीढ़ी पुरातत्वविदों की तरह
चीजों के नाम में चीजों को तलाशेगी.
सब्जियाँ, रंग और मनुष्य
- राकेश रोहित
सब्जियों का रंग बचाने
में
उनका स्वाद छूटता जाता है.
उनका स्वाद छूटता जाता है.
कोई हर दिन, सुबह-शाम
रंगता रहता चीजों को.
रंगता रहता चीजों को.
जैसे कोई मुरझाये
होठों को
रंगता है मुस्कान की तरह!
जैसे कोई परछाई घर से निकलती है
रंगकर अपने को मनुष्य की तरह.
रंगता है मुस्कान की तरह!
जैसे कोई परछाई घर से निकलती है
रंगकर अपने को मनुष्य की तरह.
दोस्तों! यदि ऐसे ही बाजार
चुराता रहा जीवन का स्वाद,
एक पीढ़ी पुरातत्वविदों की तरह
चीजों के नाम में चीजों को तलाशेगी.
| सब्जियाँ, रंग और मनुष्य / राकेश रोहित |
Saturday, 3 November 2012
मोड़ - राकेश रोहित
कविता
मोड़
- राकेश रोहित
हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.
हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.
देखती हैं टिमटिमाती बत्तियाँ
भौंकते हैं कुछ कुत्ते आवारा
घबराकर कोई खिड़की खुली
छोड़ देता है.
हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.
दम घुटता है खामोशी का इस मोड़ पर
मोड़ भी कुछ कम नहीं परेशान है
मरने से पहले कोई करता है क्या बयान
कि शेष रह जाती उसकी पहचान है!
यूँ तो यह मोड़ भी रहता नहीं खामोश है
है जारी भारी चहल-पहल
महलों का पहरा ठोस है.
पर कोई-ना कोई
यह किस्सा तो जोड़ देता है
हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.
हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.
मोड़
- राकेश रोहित
हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.
हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.
देखती हैं टिमटिमाती बत्तियाँ
भौंकते हैं कुछ कुत्ते आवारा
घबराकर कोई खिड़की खुली
छोड़ देता है.
हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.
दम घुटता है खामोशी का इस मोड़ पर
मोड़ भी कुछ कम नहीं परेशान है
मरने से पहले कोई करता है क्या बयान
कि शेष रह जाती उसकी पहचान है!
यूँ तो यह मोड़ भी रहता नहीं खामोश है
है जारी भारी चहल-पहल
महलों का पहरा ठोस है.
पर कोई-ना कोई
यह किस्सा तो जोड़ देता है
हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.
हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.
| मोड़ / राकेश रोहित |
Thursday, 11 October 2012
ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं - राकेश रोहित
कविता
ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं
- राकेश रोहित
हर रोज नया कुछ सीखता हूँ मैं
हर दिन बढ़ता है कुछ ज्ञान
ओ ईश्वर! मैं क्या करूं इतने ज्ञान का
हर दिन कुछ और कठिन होता जाता है जीवन.
पत्तों की तरह सोख सकूँ
धूप, हवा और चाँदनी
फूल की तरह खिलूँ
रंगों की ऊर्जा से भरा.
पकूं एक दिन फल की तरह
गंध के संसार में
फैल जाऊं बीज की तरह
अनंत के विस्तार में.
हरियाली की तरह बिखरा रहूँ
सृष्टि के समवाय में
ना कि ज्ञान की तरह
अपूर्ण, असहाय मैं!
ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं
- राकेश रोहित
हर रोज नया कुछ सीखता हूँ मैं
हर दिन बढ़ता है कुछ ज्ञान
ओ ईश्वर! मैं क्या करूं इतने ज्ञान का
हर दिन कुछ और कठिन होता जाता है जीवन.
पत्तों की तरह सोख सकूँ
धूप, हवा और चाँदनी
फूल की तरह खिलूँ
रंगों की ऊर्जा से भरा.
पकूं एक दिन फल की तरह
गंध के संसार में
फैल जाऊं बीज की तरह
अनंत के विस्तार में.
हरियाली की तरह बिखरा रहूँ
सृष्टि के समवाय में
ना कि ज्ञान की तरह
अपूर्ण, असहाय मैं!
| हरसिंगार / राकेश रोहित |
Saturday, 14 July 2012
मेरे अंदर एक गुस्सा है... / राकेश रोहित
मेरे अंदर एक गुस्सा है...
- राकेश रोहित
मेरे अंदर एक गुस्सा
है, गुस्से को दबाये बैठा हूँ
मैं जिस गम के दरिया में डूबा हूँ, उस गम को भुलाये बैठा हूँ.
लहरों ने साहिल पर तोड़ दिये, घरौंदे कितने बचपन के
इन लहरों से मैं सपने की उम्मीद लगाये बैठा हूँ.
दुनिया अनजानी हँसती थी - मंजिल का पता भी भूल गये?
वो क्या जाने मैं कागज की कश्ती बचपन से बनाये बैठा हूँ.
वो रात बड़ी अंधियारी थी, जब तुम आये मेरे घर में
तब से आंगन में सौ-सौ दीपक यादों के जलाये बैठा हूँ.
एक जंग जैसे है दुनिया, एक दिन जीता एक दिन हारा
कुछ मन में छुपाये बैठा हूँ, कुछ सब को बताए बैठा हूँ.
मैं जिस गम के दरिया में डूबा हूँ, उस गम को भुलाये बैठा हूँ.
लहरों ने साहिल पर तोड़ दिये, घरौंदे कितने बचपन के
इन लहरों से मैं सपने की उम्मीद लगाये बैठा हूँ.
दुनिया अनजानी हँसती थी - मंजिल का पता भी भूल गये?
वो क्या जाने मैं कागज की कश्ती बचपन से बनाये बैठा हूँ.
वो रात बड़ी अंधियारी थी, जब तुम आये मेरे घर में
तब से आंगन में सौ-सौ दीपक यादों के जलाये बैठा हूँ.
एक जंग जैसे है दुनिया, एक दिन जीता एक दिन हारा
कुछ मन में छुपाये बैठा हूँ, कुछ सब को बताए बैठा हूँ.
| कुछ मन में छुपाये बैठा हूँ, कुछ सब को बताए बैठा हूँ / राकेश रोहित |
Monday, 7 May 2012
जब बाज़ार में आया प्यार - राकेश रोहित
कविता
जब बाज़ार में आया
प्यार
- राकेश रोहित
बाज़ार बेचता है प्यार,
पल-पल बढते हैं खरीदार.
जिसको जैसी हो दरकार,
वैसी ले जायें सरकार!
अगर आपका मन सूना
है
तो आपने सही क्षण
चुना है
‘एंड ऑफ सीजन’ का सेल है,
ऑफर की है यहाँ भरमार!
बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.
टेडी बीयर या लाल
गुलाब
इस प्यार का नहीं
जवाब!
बंद पाकेट में, शाकप्रूफ है
देखें कितना सुंदर
रूप है!!
जैसी कीमत वैसे रंग,
सदा चलेगा आपके संग.
चाभी के छल्ले में
प्यार,
देख हुआ मैं चकित
यार!
बाज़ार बेचता है प्यार
पल-पल बढते हैं खरीदार.
‘बेस्ट बिफोर’ की तारीख के साथ
चाकलेट के डब्बे में
प्यार,
पोर्सलीन की यह हसीना
आपको अपलक रही निहार.
सुंदर 'एसएमएस-बुक' है
आपके दिल का है इजहार,
अपनी आँखें हमें दीजिये
हम कर आयेंगे चार!
जब बाज़ार में आया प्यार
हमने देखे रंग हजार!
बाज़ार बेचता है प्यार
Sunday, 1 April 2012
कविता के अभयारण्य में - राकेश रोहित
कविता
कविता के अभयारण्य में
- राकेश रोहित
जब कुछ नहीं रहेगा
क्या रहेगा?
मैं पूछता हूँ बार-बार
भरकर मन में चिंता अपार
कोई नहीं सुनता...
मैं पूछता हूँ बार-बार.
लोग हँसते हैं
शायद सुनकर,
शायद मेरी बेचैनी पर
उनकी हँसी में मेरा डर है-
जब कुछ नहीं रहेगा
क्या रहेगा?
नहीं रहेगा सुख
दुःख भी नहीं
नहीं रहेगी आत्मा,
जब नहीं रहेगा कुछ
नहीं रहेगा भय.
कोई नहीं कहता रोककर मुझे
मेरा भय अकारण है
कि नष्ट होकर भी रह जायेगा कुछ
मैं बार-बार लौटता हूँ
कविता के अभयारण्य में
जैसे मेरी जड़ें वहाँ हैं.
मित्रों, मैं कविता नहीं करता
मैं खुद से लड़ता हूँ -
जब नहीं रहेगा कुछ
क्या रहेगा?
![]() |
| कविता के अभयारण्य में /राकेश रोहित |
Saturday, 3 March 2012
सोयी हुई स्त्री, कविता में - राकेश रोहित
कविता
सोयी हुई स्त्री, कविता में
- राकेश रोहित
दोस्तों गजब हुआ, यह अल्लसबेरे...
मैंने पढ़ी एक कविता स्त्रियों के बारे में.
कविता थी पर सच-सा उसका बयान था,
कविता सोयी हुई स्त्रियों के बारे में थी.
सोये हुए के बारे में बात करना अक्सर आसान होता है
क्योंकि एक स्वतंत्रता-सी रहती है
कथ्य बयानी में,
पता नहीं कवि को इसका कितना ध्यान था
पर कविता में नींद का सुंदर रुमान था.
बात सोये होने की थी
समय सुबह का था
अचरज नहीं कविता में एक स्वप्न का भान था.
मैं पढ़कर चकित होता था
पर यह तय नहीं था कि मैं जगा था.
सुबह-सवेरे देखे गए सपने की तरह
कविता का अहसास मेरे मन में है
पर सोचकर यह बार-बार बेचैन होता हूँ -
सोयी हुई स्त्री जब कविता में आती है
तो क्या उसकी नींद टूट जाती है?
| सोयी हुई स्त्री, कविता में / राकेश रोहित |
Wednesday, 15 February 2012
पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम - राकेश रोहित
कविता
पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम
- राकेश रोहित
सर्द रातों में
ठंडे पानी के स्पर्श लगता है
जैसे छू रहा हूँ हिमनद से आया बर्फीला जल
जो हजारों वर्ष पहले
बहकर आया होगा किसी नदी में
और फिर बहता ही रहा होगा.
ऐसी छूती है ठंडी हवा
जैसे दक्षिणी ध्रुव से बहकर आयी हवा
पहली बार छू रही होगी
किसी आदिम मानव को.
जैसे पिछली सर्दियों में
हड्डियों के बीच
बची रह गयी सिहरन जाग रही है
वैसे कांपता हूँ इन सर्दियों में.
ऐसे लहकती है आग
इस सर्द रात में
जैसे हमारे पूर्वजों के सांसों की
ऊष्मा भरी है उसमें.
ऐसे नहीं आया यह मिट्टी सना आलू
इसकी मिट्टी में अब भी
उनके पैरों की छाप है
जो ओस भरी सुबहों में
तलाश लाए थे इसे
हरे पत्तों की जड़ों के नीचे.
भुनता है आलू तो
याद उन्हीं की आती है
जो तलाश लाए होंगे
पहली बार
पत्थरों में छिपी आग.
सूरज से नहीं
वीराने में अंधड की तरह भटकती हवा से नहीं
पहाड़ों पर पिघल रहे ग्लेशियर से नहीं और
नियम की तरह अनवरत घूमती धरती से नहीं
हमसे रचा गया है यह मौसम.
पहले हम हुए,
फिर हुआ मौसम.
| पहले हम हुए, फिर हुआ मौसम / राकेश रोहित |
Thursday, 26 January 2012
मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं - राकेश रोहित
कविता
मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं
- राकेश रोहित
मेरी कविता में जाग्रत लोगों के दुःख हैं.
मैं कल छोड़ नहीं आया,
मेरे सपनों के तार वहीं से जुड़ते हैं.
मैं सुबह की वह पहली धूप हूँ -
जो छूती है
गहरी नींद के बाद थके मन को.
मैं आत्मा के दरवाजे पर
आधी रात की दस्तक हूँ.
जो दौड कर निकल गए
डराता है उनका उन्माद
कोई आएगा अँधेरे से चलकर
बीतती नहीं इसी उम्मीद में रात.
मैं उठाना चाहता हूँ
हर शब्द को उसी चमक से
जैसे कभी सीखा था
वर्णमाला का पहला अक्षर.
रुमान से झांकता सच हूँ
हर अकथ का कथन
मैं हजार मनों में रोज खिलता
उम्मीद का फूल हूँ.
मेरी कविता में हजारों लोगों की
बसी हुई है
एक जीवित-जागृत दुनिया.
मैं रोज लड़ता हूँ
प्रलय की आस्तिक आशंका से
मैं उस दुनिया में रोज प्रलय बचाता हूँ.
मेरी कविता में उनकी दुनिया है
जिनकी मैं बातें करता हूँ
कविता में गर्म हवाओं का अहसास
उनकी साँसों से आता है.
Wednesday, 18 January 2012
हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं - राकेश रोहित
कथाचर्चा
हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं
- राकेश रोहित
(भाग- 23) (समापन कड़ी, पूर्व से आगे)
देवेन्द्र चौबे की दूसरा आदमी (नवभारत टाइम्स, दिल्ली 6 अक्टूबर 1991) में अकेली पड़ती घुटती औरत है. नरेंद्र नागदेव की शीशा लग चुका है (जनसत्ता, 21 जुलाई, 1991) में बदलते वक्त की 'असुरक्षा' से घिरा व्यक्ति पारदर्शी आवरण की 'सुरक्षा' तलाशता है. खिजाब (जनसत्ता, 28 जुलाई 1991) में अलका सरावगी लिखती हैं, "दमयंती जी ने प्रेम और स्वतंत्रता में स्वतंत्र रहने का चुनाव कर लिया है कि प्रेम सारी सहूलियतें और सुरक्षाएं भले ही दे सकता है पर स्वतंत्रता छीन लेता है." ऐसे में यह सहज ही सवाल उठता है कि क्यों अधिकांश लेखिकाएं अपनी बात नारी मुक्ति बनाम नारी चेतना की बहस से ही आरम्भ करती हैं और कहानी अगर इस स्वतंत्रता के चुनाव को सनक भरे अस्त्तित्व में बदल देती है तो इससे क्या समझा जाये? ज्योत्सना मिलन की पैर (संडे आब्जर्वर, 26 मई 1991) अच्छी कहानी है और अभिव्यक्ति प्रभावपूर्ण.
विजय की तैयारी (मुहिम, सितंबर 1991) बिना किसी पूर्व तैयारी की लिखी रचना है जो हमारे उलझन भरे समय को सरल समीकरण में बदलने की चेष्टा करती है. जयनंदन अपनी कहानी छठतलैया (मुहिम, सितंबर 1991) में एक दुर्लभ किस्म का साम्प्रदायिक सदभाव रचते हैं. वासुदेव की प्रतीक्षा (मुहिम, सितंबर 1991) मरणासन्न पिता की मृत्यु का प्रार्थनागीत है जो एक भौतिक विराग की संसृति करता है. और यह बात कई बार दुहराई गयी है. वलेनतीन रस्पुतीन (1937) की आख़री घड़ी से लेकर रामधारी सिंह दिवाकर की शोकपर्व (हंस) तक. हा धिक्, यह सार्वभौमिक प्रतीक्षा! मुहिम के पहले अंक में नारायण सिंह की कहानी स्त्रीपर्व स्त्री को उसकी गरिमा में स्थापित करती है. देवेन्द्र की बंटवारा (मुहिम-1) आंचलिक यथार्थ की कहानी है. चंद्रकान्त राय की उमरकैद (मुहिम-1) यथार्थ को विभिन्न समय-कलाओं में पकड़ती हुई महत्वपूर्ण रचना बन जाती है. अकिंचन की कहानी सुग्गा भाग गया (रेल भारती, मार्च 1991) में पारिवारिक भावुकता अपनी प्रतीक योजना में पिछड़ जाती है. अमरेन्द्र मिश्र की टेलीफोन (गूंज, अक्टूबर-दिसंबर 1991) में कहानी की तरह कहानीकार को अपना पक्ष पता नहीं है. प्रह्लाद श्रीमाली की कहानी दीवारें और आदमी (मधुमती, अगस्त 1991) नये तरीके से लिखी गयी है. हनुमान दीक्षित की खाली हाथ (मधुमती, अगस्त 1991) आतंकवाद का विरोध करती है. सुरेन्द्र तिवारी की उसका साथ (भाषा, मार्च 1991) सम्भावना के बावजूद कहानी होने से चुकती है.
राजाराम सिंह की कहानी अंत्योदय (कतार-12) एक व्यंग्य की तरह हावी होती है पर कुछ नया नहीं रचती है. राजाराम रजक की टेनिया (कतार-12) में केवल एक सत्य है और सारी कहानी उसे सिद्ध करती है. अरविन्द कुमार की कहानी नइकी भौजी (कतार-12) में मासूमियत से उत्पन्न रुमानियत मासूमियत को नष्ट कर देती है. धनेश दत्त पाण्डेय की करवट (कतार-12) मनुष्य के शोषण और उसके इस्तेमाल की कहानी है. समकालीन परिभाषा -6 में श्याम अविनाश की हाथ, खुर्शीद अकरम की उमस और जेब अख्तर की ग्राफ नाराज-कहानी है जो हमारी नाराजी को व्यवस्था-विरोध में दर्ज करती है. सूरज प्रकाश की बाजीगर (संभव-7) जीवन के नाटक में विरोध को बाजीगरी की तरह सहज बनाना चाहती है. जवाहर सिंह की कफन की चिंता (संभव -8,9,10) यथार्थ के भयानक होते जाने की खबर देती है. ज्ञान प्रकाश विवेक की जी. डी. उर्फ गरीब दास (संभव -8,9,10) में भाषा और शिल्प का बेहतर प्रयोग कहानी को चुस्त बनाता है. कुंदन सिंह परिहार की अपराध (साम्य -17) कहानी का अंत प्रभावी है.
सुधाकर की जुबेदा का गुस्सा (संवेद- 1) एक छोटी पर अच्छी कहानी है. शब्दों की सचेत मितव्ययिता मन को बेधती है पर अंत में जुबेदा का तुतलाकर बोलना खरता है. सच को कहने के लिए मासूमियत के सहारे की जरुरत नहीं होनी चाहिए. "इंसान चाहे तो कम-से-कम चीजों से भी अपना कम चला सकता है, " सरफराज द्वारा नियति के इस स्वीकार को जुबेदा साइकिल की मांग कर तोड़ती है तो लगता है जैसे एक सन्नाटी संवादहीनता टूटती है. चंद्रमोहन प्रधान की खटमल (संवेद- 1) में खटमल को भी न मारनेवाले मंत्री हुलास सिंह अपने अत्याचारी भाईयों को जिस तरह पिटवाते है वह फ़िल्मी रुमानियत के हिसाब से ही अच्छी लग सकती है. वैसे इस कहानी में 'हवेली' शब्द का अच्छा प्रयोग हुआ है जैसे, "हवेली को मारा कम घसीटा अधिक गया." शिव कुमार शिव की शताब्दी का सच (संवेद- 1) भागते हुए शहर भागलपुर के आतंक की कथा है. कहा जा सकता है कि 'संवेद' पत्रिका अपने पहले अंक से उम्मीद जगाती है और रचनात्मक नैतिकता का पूरी जिम्मेवारी से निर्वाह करती है.
1992 के उत्तरार्द्ध में आयी, खासकर वर्तमान साहित्य कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता- 1991 में पुरस्कृत कहानियाँ हिंदी कथा लेखन के नये रुझान का संकेत देती है. चंदन प्रसाद सिंह की स्कूप, विनोद अनुपम की आयरन , फूलचंद गुप्ता की प्रायश्चित नहीं प्रतिशोध, डा. ईश्वर दत्त वर्मा की धर्मयुद्ध जैसी कहानियाँ यथार्थ को बारीक 'विट' के सहारे पकडती है और यह शायद हिंदी कहानी में एक तार्किक कथात्मकता की शुरुआत है जो विशुद्ध गल्पवाद से भिन्न है. कारखाना के नये अंक में चंद्रकांत राय की जूते जादुई यथार्थवादी कहानी होते हुए भी जमीनी यथार्थ से किस तरह जुडी रहती है यह देखना महत्वपूर्ण है. इनके आलावा अन्य उल्लेखनीय कहानियों में ना सम जियत न मुंअले माहीं (प्रकाश उदय), सेवड़ी रोटियां और जले आलू (हरि भटनागर), कर्मयोग (अब्दुल बिस्मिल्लाह), उपचार (गोविन्द मिश्र) आदि का नाम लिया जा सकता है पर इनकी चर्चा फिर कभी.
| संभावना / राकेश रोहित |
...तो ऐसा था हिंदी कहानी का एक संभावनापूर्ण साल!
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