Sunday, 13 April 2014

संवेदनाओं के द्वीप और विभ्रम की उलझनें - राकेश रोहित

पुस्तक समीक्षा / एक नौसिखुआ आलोचक के रफ नोट्स
संवेदनाओं के द्वीप और विभ्रम की उलझनें      
- राकेश रोहित

विमलेश त्रिपाठी 
1.         ‘एक देश और मरे हुए लोग युवा कवि विमलेश त्रिपाठी का दूसरा कविता संग्रह है. पूरा संग्रह पाँच खण्डों में विभाजित है- इस तरह मैं, बिना नाम की नदियाँ, दुःख-सुख का संगीत, कविता नहीं और एक देश और मरे हुए लोग. पाँचों खंड का एक अलग तेवर है और इसे पाँच स्वतंत्र कविता-संग्रह की तरह भी पढ़ा जा सकता है.
2.         ‘इस तरह मैं में कविता की अभिव्यक्ति की उलझनें हैं तो बिना नाम की नदियाँ में कवि के उन आत्मीय संबंधों का संसार है जिससे वह और उसका व्यक्तित्व रचा गया है. दुःख- सुख का संगीत में स्मृति और उम्मीद की कविताएँ हैं. कविता नहीं कवि की आकांक्षाओं की कविता है तो पाँचवां खंड जिसमें संग्रह की शीर्षक कविता भी है कवि द्वारा यथार्थ को समझने की कोशिश है.
3.         विमलेश त्रिपाठी संवेदना के कवि हैं. उनकी संवेदना ओढ़ी हुई नहीं है वरन् वह उनमें संस्कार की तरह विकसित हुई है. गांव और लोक की ललक उनकी कविताओं का मूल स्वर है. इसलिए उनकी कविताओं में जीवन में लगातार छूट रही चीजों के लिए एक बेचैनी स्पष्ट दिखती है और यथार्थ और स्मृति के बीच एक निरंतर आवाजाही संभव होती है.
4.     कवि के अंदर अपने अस्तित्व की बेचैनी और अपने गांव से/ अपनी जड़ों से दूर रहकर शहर में प्रवासी हो जाने का दर्द बार-बार उनकी कविताओं में अभिव्यक्त होता है. यह एक बूढा हांफता गांव है जिसकी याद कवि के मन में ऐसी बसी है कि वह कोलकाता में रहकर भी कोलकाता  का नहीं बन सका. यह जड़ों से कटने की पीड़ा है. यह उस गांव के नष्ट होते जाने का दर्द है जहां कुंए में मिट्टी भरती जा रही है.
5.         कवि की प्रखर संवेदना उसकी कविता को अप्रतिम बनाती है. इसी संवेदना की ताकत से कवि बिना चिड़िया के पैरों में रस्सी बांधे और बिना नोह्पालिश से उसके पंख रंगे, उसे अपना बना लेता है. संवेदना कवि का घर है और जल ही जल चतुर्दिक में उसके आश्रय का द्वीप भी.
      कवि को यह भय है कि जिस तरह दुनिया पक्षियों के माफिक नहीं रही उसी तरह एक दिन उसके रहने लायक भी नहीं रहेगी. पर यह कवि का विश्वास है कि वह कहता है-
      कोई लाख कोशिश कर ले
मैं कहीं जाऊंगा नहीं
रहूँगा मैं इसी पृथ्वी पर
बदले हुए रूप में.
6.         विमलेश त्रिपाठी की कविताओं और उनकी कवि- समझ की यह ताकत है कि वे न केवल मनुष्य के अस्तित्व पर आसन्न खतरों की परख करते हैं वरन् उसके लिए एक निरंतर लड़ाई भी भाषा के स्तर पर लड़ते हैं. और उसके लिए वे खुशी-खुशी पूरे होश-ओ-हवास में मूर्खता का वरण करने को भी तैयार हैं. यहाँ मूर्खता अचानक सहजता का पर्याय बन जाती है. यह कवि का अपने पर विश्वास है. इसलिए वे कहते हैं-
      शब्द और कितने
फलसफे कितने और
इन दो के बीच फंसे
सदियों के आदमी को
निकालो कोई.
कलम बंद करो
मंच से उतरो
चलो इस देश की अंधेरी गलियों में
सुनो उस आदमी की बात
उसको भी बोलने का मौका दो कोई.
यह कविता में विचार और वाद से पहले  मनुष्य की स्थापना है. और इसलिए कवि कह पाता है, जब कभी पुकारता कोई शिद्दत से/ दौड़ता मैं आदमी की तरह पहुँचता जहाँ पहुँचने की बेहद जरूरत.
7.         ‘बहनें कविता एक महाकाव्य की तरह है और इसमें संवेदना का जो पारावार है उसे एक आलेख की सीमा में बांधना कठिन है. पूरी कविता में दुःख का और समाज में स्त्री जाति के प्रति हो रहे अन्याय का मद्धिम स्वर निरंतर गूंजता है और बहनों की कोई भी हँसी उसे ढंक नहीं पाती. यह कविता अपने आप में एक संपूर्ण वक्तव्य है. इसे पढ़ना दुःख के गीलेपन को महसूसना है जिसे हवा आँखों से सुखा देती है पर दिल के अंदर वह हमेशा रिसता रहता है. इसकी एक-एक पंक्ति समाज की आधी आबादी के साथ हमारे समय की नृशंसता का करुण दस्तावेज है. देखें-
इस तरह किसी दूसरे से नहीं जुड़ा था उनका भाग्य
सबका होकर भी रहना था पूरी उम्र अकेले ही
उन्हें अपने भाग्य के साथ.
स्त्री के इसी दुःख की सततता होस्टल की लड़कियां कविता में दिखती है जब कवि कहता है-
वे जीना चाहती हैं तय समय में
अपनी तरह की जिंदगी
जो उन्हें भविष्य में कभी नसीब नहीं होना.
8.         यथार्थ और स्मृतियों के बीच जिस आवाजाही की बात मैंने पहले की है वह तीसरे खंड की कविताओं में साफ है. फिर चाहे वह सपने कविता हो या बहुत जमाने पहले की बारिश या फिर ओझा बाबा को याद करते हुए. कविता नहीं खंड की कविताएँ कवि के आकांक्षाओं की कविता है जहाँ वह अपनी उम्मीद की जड़ें तलाशता है. इसलिए कवि कहता है-
कविता में न भी बच सकें अच्छे शब्द
परवाह नहीं
मुझे सिद्ध कर दिया जाए
एक गुमनाम बेकार कवि.
कविता की बड़ी और तिलस्मी दुनिया के बाहर
बचा सका तो
अपना सब कुछ हारकर
बचा लूँगा आदमी के अंदर सूखती
कोई नदी
मुरझाता अकेला पेड़ कोई.
9.         कविता संग्रह का समर्पण कवि के शब्दों में देश के उन करोड़ों लोगों के लिए है जिनके दिलों में अब भी सपने साँस ले रहे है और संग्रह के शुरुआती पन्ने पर कवि ने मुक्तिबोध की प्रसिद्ध पंक्तियों को याद किया है-
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम.
                              (गजानन माधव मुक्तिबोध)
10.       संग्रह के पांचवें खंड का नाम है एक देश और मरे हुए लोग जिसमें इसी नाम की एक कविता भी है. चूँकि संग्रह का शीर्षक भी यही है इसलिए मैं मान लेता हूँ कि यह कवि की सबसे प्रिय  कविता है और इससे उसका सबसे अधिक वैचारिक जुड़ाव है.
11.       ‘एक देश और मरे हुए लोग जिसमें कवि का आग्रह है कि हकीकत को कथा की तरह और कथा को हकीकत की तरह सुना जाए, भन्ते को संबोधित है. इस कविता में एक ऐसे राज्य का रूपक है जिसमें मंत्री, उसके कुनबे और जनता सब मरी हुई है पर राजा जिंदा है और मरी हुई जनता के बीच पहुँचाना चाहता है रोशनियाँ! मैंने इसको कई बार समझने की कोशिश की कि मुक्तिबोध की जिन पंक्तियों को कवि ने संग्रह में उद्धृत किया है उसमें देश मर जाता है और लोग बचे रहते हैं पर विमलेश जी की कविता में देश बचा है और लोग मरे हुए! अब क्या है यह? यथार्थ का अंतर्विरोध या कविता का विकास? इन मरे हुए लोगों के बीच कवि, लेखक कलाकार आदि कुछ ही लोग जीवित हैं. लोकधर्मी कवि की इस हठात आत्ममुग्धता का कारण क्या है? यह कौन सा यथार्थ है और कौन सा रूपक? जहां राजा जीवित है और तंत्र मरा हुआ! क्या है यह? बुराई का अमूर्तन? और आश्चर्य कि इस अमूर्तन को रचने वाली एक मशीन है जो बाहर से  आयात की गयी है जो जीवितों को लगातार मुर्दों में तब्दील  करती है. यानी यहाँ अमानवीकरण  एक प्रक्रिया नहीं है वरन् बाहर से आयातित है.
      यहाँ कवि जो पूरी जनता के मरे होने का रूपक बांधता है क्या यह कवि की हताशा है? क्या यह वही कवि है जो इसी संग्रह में अपनी अंकुर के लिए कविता में कहता है,
मेरे बच्चे मुझ पर नहीं
अपनी माँ पर नहीं
किसी ईश्वर पर भी नहीं
भरोसा रखना इस देश के करोड़ों लोगों पर
जो सब कुछ सहकर भी रहते हैं जिंदा.
तो ये करोड़ों लोग जो विमलेश त्रिपाठी की कविता में हर शर्त पर जिंदा रहते हैं अचानक मुर्दों में कैसे तब्दील हो गये? क्या अपने लोगों पर कवि का भरोसा डिग गया है? या यह एक दुस्वप्न  है, एक विभ्रम? इस विभ्रम की स्थिति में इस लोकधर्मी कवि, जो लोक के प्रति अपनी संवेदना से सिक्त है, की उम्मीद सिर्फ कवियों से हैं! और विश्वास कीजिये वैसे कवियों से  जो कवच-कुंडल लेकर महानता के साथ जनमते हैं! पर  विमलेश त्रिपाठी के ही शब्दों में क्या यही कवि अभी जोड़-तोड़ से पुरस्कार पाने में नहीं जुटे हुए थे. यह है विभ्रम की मुश्किलें!
      कवि ने पूरी कविता को एक दुस्वप्न भरे रूपक की तरह रचने की कोशिश की है और इस कोशिश में उसका उस संवेदना से साथ छूट गया है जो कवि की ताकत है. संवेदना से इसी विलगाव के कारण गालियाँ कविता में कवि गाली के पक्ष में तर्क देने लगता है उसे मन्त्र की तरह पवित्र ठहराने लगता है. इस  क्रम में वह गालियों की समाजशास्त्रीय व्याख्या करने से चूक जाता है. वह भूल जाता है कि गालियाँ दी पुरूष को जाती हैं पर होती स्त्रियों के विरुद्ध  हैं कि स्त्रियों के विरूद्ध नृशंसता की यह वही सदियों पुरानी श्रृंखला है विमलेश जी की कविता जिनके खिलाफ है.

12.       ‘एक देश और मरे हुए लोग में कवि की आख़िरी कोशिश उस मशीन की खोज है जो जिंदा लोगों को मुर्दा में तब्दील कर देती है. पर कवि यह भूल जाता है कि राजा इन मशीनों से पहले से थे और कविता भी, जो तब भी मनुष्य के अमानवीयकरण की प्रक्रिया से निरंतर लड़ रही थी. पर विभ्रम की मुश्किलों के बाहर विमलेश जी की कविताओं में संवेदनाओं के जो द्वीप हैं वहाँ जीवन का पर्यावरण सुरक्षित है और अपनी आदिम ऊर्जा से भरा साँस लेता है. 



पुस्तक परिचय:
कविता संग्रह 
कवि/ विमलेश त्रिपाठी 
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, 
एफ -77, सेक्टर 9, रोड नं 11,
करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, 
बाईस गोदाम, जयपुर- 302006  
प्रकाशन वर्ष: 2013, प्रथम संस्करण.

Saturday, 5 April 2014

एक कविता नदी के लिए - राकेश रोहित

कविता 
एक कविता नदी के लिए
- राकेश रोहित 

हम सबके जीवन में
नदी की स्मृति होती है
हमारा जीवन
स्मृतियों की नदी है।

नदी खोजते हूए हम
घर से निकल आते हैं
और घर से निकल हम
खोयी हुई एक नदी याद करते हैं।


नदी खोजते हुए हम / घर से निकल आते हैं - राकेश रोहित 

नदी की तलाश में ही कवि निलय उपाध्याय
गंगोत्री से गंगासागर तक हो आए
अब एक नदी उनके साथ चलती है
अब एक नदी उनके अंदर बहती है।

बचपन में कभी
तबीयत से उछाला एक पत्थर*
नदी के साथ बहता है
और
नदी की तलहटी में कोई सिक्का
चुप प्रार्थनाओं से लिपटा पड़ा रहता है।

सभ्यता की शुरुआत में
शायद कोई नदी किनारे रोया था
इसलिए नदी के पास अकेले जाते ही
छूटती है रुलाई
और मन के अंदर
कहीं गहरे दबा प्यार  वहीं याद आता है।

नदी किनारे अचानक 
एक डर हमें भिंगोता है
और गले में घुटता है
कोई अनजाना आर्तनाद


नदी किनारे अचानक / एक डर हमें भिंगोता है - राकेश रोहित 

कुछ गीत जो दुनिया में
अब भी बचे हुए हैं
उनमें नदी की याद है
अब भी नदी की हवा
आकर अचानक छूती है
तो पुरखों के स्पर्श से
सिहरता है मन!

दोस्तों!
इस दुनिया में
जब कोई नहीं होता साथ
एक अकेली नदी हमसे पूछती है -
तुम्हें जाना कहाँ है?


एक अकेली नदी हमसे पूछती है - तुम्हें जाना कहाँ है? / राकेश रोहित
(*एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों - दुष्यंत कुमार)

Sunday, 23 March 2014

असंभव समय में कविता - राकेश रोहित

कविता
असंभव समय में कविता 
- राकेश रोहित 

हर दिन वर्णमाला का एक अक्षर मैं भूल जाता हूँ
हर दिन टूट जाती है अंतर की एक लय
हर दिन सूख जाता है एक हरा पत्ता
हर दिन मैं तुमको खो देता हूँ जरा- जरा!


ऐसे असंभव समय में लिखता हूँ मैं कविता
जैसे इस सृष्टि में मैं जीवन को धारण करता हूँ
जैसे वीरान आकाशगंगा से एक गूँज उठती है
और गुनगुनाती है एक गीत अकेली धरा!!

असंभव समय में कविता / राकेश रोहित 

Monday, 10 March 2014

क्या 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है? / राकेश रोहित

आलेख 
क्या 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान- बिंदु है?
- राकेश रोहित 

(हिंदी के महत्वपूर्ण कहानीकार श्री संजीव जी को ग्यारह लाख रूपये का श्रीलाल स्मृति सम्मान 2013, प्रदान किया गया है. उन्हें हार्दिक बधाई! इस अवसर पर उनकी कहानी 'आरोहण' (हंसअगस्त, 1996) पर यह लेख प्रस्तुत है. यह लेख 'हंस' में 'आरोहण'  कहानी के प्रकाशन के उपरांत 'हंस' के दिसंबर 1996 अंक में प्रकाशित हुआ था. लेख के साथ आये संदर्भो को कृपया प्रकाशन वर्ष के साथ ही देखें.)

संजीव / कथा का आरोहण 

हिंदी कहानी पर विचार करते समय मैंने अक्सर यह समझना चाहा है कि मार्क्सवादी मॉडल के विखंडन और और तत्समय के आक्रामक उपभोक्तावाद के सचमुच के कठिन काल में हिंदी कहानी वह कौन-सा स्वरुप अख्तियार कर सकती है, जो उसकी रचनात्मक आँच के साथ-साथ उसकी प्रतिबद्धता को भी सुरक्षित रख पाने में संभव हो. इसके पहले मुझे कहने दीजिए कि हिंदी कहानी में वादाधारित कहानी का जो निर्विवाद दौर आया था, उसमें बाद में मार्क्सवाद की अधकचरी समझ और 'बिहारी' कहानीकारों का जो भी योगदान रहा हो, इसकी शुरुआत एक हद तक संजीव की 'अपराध' कहानी से हुई थी. 'थैंक्यू मिस्टर ग्लाड' के दौर में प्रकशित इस कहानी में यद्यपि तत्कालीन विक्षोभ का प्रतिक्षेपण था पर इसने शायद उन फार्मूलों का भी विकास किया, जहाँ प्रतिबद्धता कहानी से अलग नंगी और कुरूप दिखती थी. यद्यपि 'आपरेशन जोनाकी', 'देवी सिंह कौन', 'सुधीर घोषाल', 'बिरजू तो मारा जायेगा' समकालीन कथा-यात्रा के जीवंत दस्तावेज हैं पर प्रतिबद्धतावादी कहानी की उत्तेजना का स्खलन विजयकांत की 'इंद्रजाल' जैसी कहानियों में साफ-साफ सामने आया. और आप अन्य लघु पत्रिकाओं की तो बात छोड़िये 'जन चेतना के प्रगतिशील कथा मासिक' उर्फ 'हंस' का प्रगतिशील जन भी लाल रंग, लाल सूरज वगैरह के प्रतीक-जाल में उलझा था या आदम-ईव के घेरे में आकर सिमटा था.

ऐसी कहानियाँ भी आईं, जो आजादी के बाद के भारतीय समाज व उसकी चुनौतियों की सच्ची समझ से लिखी गई थीं. पूरा याद करना कठिन हो फिर भी 'हिंगवा घाट में पानी रे', 'चिट्ठी', 'तिरिया चरित्तर', 'कहीं लौटा तो नहीं', 'शोक पर्व', 'अश्लील', 'पिंटी का साबुन', 'टुंड्रा प्रदेश', 'वे वहाँ कैद हैं', 'शामिल बाजा', 'गुप्तदान', 'क्रेमलिन टाइम', 'भैया एक्सप्रेस' आदि कहानियों को देखें. पर ये कहानियाँ अगर चर्चा में होने के बावजूद मुख्यधारा की कहानियाँ नहीं रहीं, तो उस जनवादी क्रांति के अघोषित युद्ध के विराम-काल में एक खामोश-सी कहानी 'आरोहण' (हंस, अगस्त, 1996) क्या हिंदी कहानी का कोई नया प्रस्थान-बिंदु है और क्या इसका श्रेय फिर से संजीव को ही दिया जाना चाहिए?

दिल पर हाथ रखकर बताइए तो जरा समूची हिंदी कहानी में भूप दादा जैसे कितने चरित्र याद आते हैं आपको? उसकी जिजीविषा मुझे अचानक 'भेड़िये' के खारू की याद दिलाती है, पर कितनी खामोश, कितनी निर्दोष. यह जो  भूप दादा का 'आत्मनिर्वासन' है वह निर्मल वर्मा के 'कौव्वे और काला पानी' के आत्मनिर्वासन से कितना अलग है क्योंकि वस्तुतः यह आत्मनिर्वासन है ही नहीं यद्यपि दिखता है. तभी तो भूप दादा इतने आत्मविश्वास से कह सकते हैं- "कौन कहता है अकेला हूँ, यहाँ माँ है, बाबा हैं, शैला है, सोये पड़े हैं सब. यहाँ महीप है, बल्द हैं, मेरी घरवाली है, मौत के मुँह से निकले गये खेत हैं, पेड़ हैं झरना है. इन पहाड़ों में मेरे पुरखों, मेरे प्यारों की आत्मा भटकती रहती है. मैं उनसे बात करता हूँ. मैं अकेला कहाँ हूँ." तो सचमुच के अकेलेपन और पहाड़-सी कठिन जिंदगी में यह जो अपने को अकेला न समझने की जिदभरी समझ है वही शायद इस आक्रामक समय में एक विचार को निरीह न समझने की हिम्मत पैदा कर सकती है. और सबसे मार्के की बात है कि आक्रामकता के विरुद्ध संघर्ष में अकेलेपन के बावजूद एक सदभाव है और वही इस संघर्ष की सबसे बड़ी शक्ति है. सोचिये, अकेलापन है, दुःख है, पर इसके बावजूद न घृणा है, न निरीहता है. एक संबल है सत् का, सही होने का- "(बात) नहीं की, दुःख था, लेकिन देवता जानते हैं जो कभी उनका बुरा सोचा हो मन में. यहाँ जहाँ हूँ, बुरा सोचूँगा भी कैसे? मुझे तो सभी पर दया आती है यहाँ से नीचे देखने पर." 

यह है आरोहण सत् का और सद् का!

जब मैं कहता हूँ कि 'आरोहण' हिंदी कहानी का नया प्रस्थान-बिंदु है तो मेरा मकसद एक नये चरित्र की स्थापना या तलाश से ही निष्कर्ष निकाल लेने की सुविधा का नहीं है बल्कि मेरा जोर यह मानने पर है कि यह कहानी हिंदी कथा-परंपरा के 'डी-स्कूलिंग' का भी सूचक है. न केवल इस मायने में कि यह संजीव की अपनी पूर्व की कहानियों से इतर है बल्कि इसलिए भी कि यह कहानी शायद पहली बार उस  भाषा में लिखी गयी है जहाँ अब तक के अछूत समझे गये विषय, अस्तित्व के संकट की समझ जनवादी तरीके से होती है. ऐसे परिवेश की कल्पना कीजिये, जहाँ के लोगों के लिए यह विश्वास करना कठिन हो कि सरकार पर्वतारोहणके लिए भी पैसा दे सकती है वहाँ अगर संजीव अस्तित्व जैसे कठिन सार्त्रीय विषय की जगह बना लेते हैं, तो इतना तय है कि संजीव ने फिर एक नये कथा-क्षेत्र की सफल तलाश कर ली है. 'तिड़बेनी का तड़बन्ना' से 'आरोहण' तक की यह यात्रा केवल संजीव की यात्रा नहीं वरन हिंदी कहानी की भी यात्रा है.

ऐसी स्थिति में, जब अधिकतर हिंदी कविता अगर राग भोपाली में नहीं है तो केदारनाथ सिंह के स्कूल की है (राजकुमार कुम्भज जैसे कुछेक अपवादों को छोड़कर) और वह भी तब, जब केदारनाथ सिंह सयत्न इसका पाठ्यक्रम लगातार बदलते रहे हैं हिंदी कहानी की यह 'डी-स्कूलिंग' सुखकर भी है और महत्वपूर्ण भी. हिंदी कविता की यह बहुत बड़ी विडंबना है कि जिसने आज के तनाव भरे और आतंककारी समयानुकूल भाषा का विकास मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के दौर में ही कर लिया था, आज के समय में छायालोक की लिजलिजी और दुहरावभरी भाषा में बात करती है. समय का तनाव जो मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय ने अपने समय में अकेले जिया था, वही आज हम सामूहिक रूप से जी रहे हैं, पर मुझे ऐसी कोई कविता बताइए  जो उसी खुरदुरी और चुभने वाली भाषा में लिखी गयी हो. काँटों भरे इस समय में केंचुए-सी कोमलता लेकर आप कविता का क्या करेंगे? माना कि कोमलता अच्छी चीज है और केंचुआ किसानोपयोगी! तो देखिए, अब तक हम निर्विवाद मानते आये थे कि कविता अपने समय की ज्यादा स्फूर्त प्रतिक्रिया करती है और कहानी पकने में समय लेती है पर इस बार क्या करें अगर हम पाते हैं कि कविता ने अपने एक तय विषय-सूची बना रखी है, तो कहानी नये संकट से नये अंदाज से जूझती है, नई भाषा के साथ? अगर आप यह मान लेते हैं कि कुछ नये की तलाश की निर्दोष कामना में कविता 'स्कूल्ड' होती जा रही है, जबकि कहानी ने, देर से ही सही, 'डी-स्कूलिंग' की जरूरत को समझा है तो आप मान लेंगे कि 'आरोहण' वाकई हिंदी कहानी का नया प्रस्थान-बिंदु है.

                                     ('हंसके दिसंबर 1996 अंक में प्रकाशित )

Monday, 10 February 2014

कविता और जादू / राकेश रोहित

कविता 
कविता और जादू 
- राकेश रोहित

कविता है या जादू?

सौ जादू होते हैं कविता में
पर सबसे बड़ा जादू
कविता के बाहर होता है
जब हरे पत्तों पर
कोई पीला फूल खिलता है।

मैं हर बार ताजे रंग लेकर
लौटता हूँ कविता में
मैं जानता हूँ
हर बार जादू बाहर रह जाता है।

हरे पत्तों पर पीला फूल / राकेश रोहित 

Friday, 7 February 2014

हमारे ही बीच का होगा वह, जो सच कहेगा - राकेश रोहित

कविता 
हमारे ही बीच का होगा वह, जो सच कहेगा 
- राकेश रोहित

हमारे ही बीच का होगा वह
जो सच कहेगा
हमारे ही भीतर से आएगा!

देवताओं सी चमक
नहीं होगी उसके चेहरे पर
नहीं होगा,
वह उम्मीद की गाथाओं का रचयिता!
हो सकता है
इंद्रधनुषों की बात करते वक्त भी
उसकी आँखों से
झांक रही हो
रात की थोड़ी बची भूख
और कहीं उसके गहरे अंदर
छूट रही हो
एक नामालूम रुलाई!

एक सामान्य सी सुबह होगी वह
और रोज की तरह का दिन
जब रोज के कामों से
थोड़ा वक्त निकाल कर
जैसे सुस्ताता है कोई पथिक
वह हमसे- आपसे मुखातिब होकर
सरे राह सच कहेगा!

ऐतिहासिक नहीं होगा वह दिन
जब सूरज की तरह
चमकेगा सच
और साफ झलकेगा
भूरी टहनियों पर
हरे पत्तों का साहस।

भूरी टहनियों पर हरे पत्तों का साहस / राकेश रोहित 

Thursday, 23 January 2014

उम्मीद का कोई शीर्षक - राकेश रोहित

कविता
उम्मीद का कोई शीर्षक 
- राकेश रोहित

मैं नष्ट हो रही दुनिया से

एक सहमा हुआ शब्द उठाता हूँ
मैं उसे अपनी सबसे प्यारी कविता में
बची रहने की इच्छा के साथ टांक देता हूँ.


हर असंभव के विरुद्ध एक जुगत की तरह
मैं आसमान को रंग-बिरंगी पतंगों से भर देना चाहता हूँ.



इस नश्वर दुनिया में एक हठ की तरह
मैं हर बार बचा लाता हूँ -
कविता के लिए उम्मीद का कोई शीर्षक!

उम्मीद का कोई शीर्षक / राकेश रोहित 

Monday, 21 October 2013

चिड़िया जब बोलती है - राकेश रोहित

कविता 
चिड़िया जब बोलती है 
- राकेश रोहित 

एक चिड़िया जब बोलती है
एक चिड़िया जब...
बस
इसके बाद सारे शब्द बेमानी हो जाते हैं!

हजार शब्दों में उतारी नहीं जाती
उसकी एक आवाज
एक चिड़िया जब बोलती है
कविताएँ उसको खामोश सुनती हैं!!


चिड़िया जब बोलती है / राकेश रोहित 

Friday, 4 October 2013

पंचतंत्र, मेमने और बाघ - राकेश रोहित

कविता 
पंचतंत्र, मेमने और बाघ 
- राकेश रोहित

पानी की तलाश में मेमने
पंचतंत्र की कहानियों से बाहर निकल आते हैं
और हर बार पानी के हर स्रोत पर
कोई बाघ उनका इंतजार कर रहा होता है.

मेमनों के पास तर्क होते हैं,
और बाघ के पास बहाने.
मेमने हर बार नये होते हैं
और बाघ नया हो या पुराना
फर्क नहीं पड़ता.

जिसने यह कहानी लिखी
वह पहले ही जान गया था -
"मेमने अपनी प्यास के लिए मरते हैं
और ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती!"

ताकतवर की भूख तर्क नहीं मानती / राकेश रोहित 

Friday, 16 August 2013

एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि - राकेश रोहित

कविता 
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि 
- राकेश रोहित 

जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?

अंततः एक कवि को
स्वप्न-द्रष्टा होना होता है।
आश्चर्य नहीं,
एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि
वह जानता है बहुत कठिन होता है
अच्छी कविता का जीवन!
आसान नहीं होती राजपथ पर
हजार सपनों से सजे बचपन की राह।

अंधेरे ब्रह्मांड में जो तारों को
हजार सूरज की तरह चमकाता है
कोई नहीं जानता इस कृष्ण- विवर में
कवि इतनी ऊर्जा कहाँ से लाता है?

उम्मीद से भरे शब्द
कवि के लिए
कविता में एक सपना बुनते हैं!
जब दिल देता नहीं साथ,
गहन निराशा में
हम कविता की सुनते हैं।

है ऐसे में सहज यह अचरज
जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?

एक अच्छी कविता लिखकर उदास हो जाता है कवि / राकेश रोहित  

Wednesday, 10 July 2013

मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है - राकेश रोहित

कविता


मुझे लगता है मंगल ग्रह पर एक कविता धरती के बारे में है

- राकेश रोहित 

मुझे लगता है मंगल ग्रह पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में 
कहीं कोई एक कविता धरती के बारे में है!

आँखों से बहे आंसू
जो आँखों से बहे और कहीं नहीं पहुंचे
आवाज जो दिल से निकली और
दिल तक नहीं पहुंची!
उसी कविता की बीच की किन्हीं पंक्तियों में
उन आंसुओं का जिक्र है
उस आवाज की पुकार है.

संसार के सभी असंभव दुःख जो नहीं होने थे और हुए
मुझे लगता है उस कविता में
उन दुखों की वेदना की आवृत्ति है.

पता नहीं वह कविता लिखी जा चुकी है
या अब भी लिखी जा रही है
क्योंकि धरती पर अभी-अभी लुप्त हुई प्रजाति का 
जिक्र उस कविता में है.

मुझे लगता है संसार के सबसे सुंदर सपनों में
कट कर  भटकती  उम्मीद की पतंग
मंगल ग्रह के ही किसी वीराने पहाड़ से टकराती है
और अब भी जब इस सुंदर धरती को बचाने की
कविता की कोशिशें विफल होती है
मंगल ग्रह पर तूफान उठते हैं.

मुझे लगता है
जैसे धरती पर एक कविता
मंगल ग्रह के बारे में है
ठीक वैसे ही मंगल ग्रह पर बिखरे
असंख्य पत्थरों में
कहीं कोई एक कविता धरती के बारे में है!


मुझे लगता है... / राकेश रोहित 

Friday, 21 June 2013

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य - राकेश रोहित

कविता

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य 
- राकेश रोहित 


सब्जियों का रंग बचाने में
उनका स्वाद छूटता जाता है.

कोई हर दिन, सुबह-शाम
रंगता रहता चीजों को.

जैसे कोई मुरझाये होठों को
रंगता है मुस्कान की तरह!
जैसे कोई परछाई घर से निकलती है
रंगकर अपने को मनुष्य की तरह.


दोस्तों! यदि ऐसे ही बाजार
चुराता रहा जीवन का स्वाद,
एक पीढ़ी पुरातत्वविदों की तरह
चीजों के नाम में चीजों को तलाशेगी.

सब्जियाँ, रंग और मनुष्य / राकेश रोहित 

Saturday, 3 November 2012

मोड़ - राकेश रोहित

कविता

मोड़ 
- राकेश रोहित 

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.

देखती हैं टिमटिमाती बत्तियाँ
भौंकते हैं कुछ कुत्ते आवारा
घबराकर कोई खिड़की खुली
छोड़ देता है.

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

दम घुटता है खामोशी का इस मोड़ पर
मोड़ भी कुछ कम नहीं परेशान है
मरने से पहले कोई करता है क्या बयान
कि शेष रह जाती उसकी पहचान है!

यूँ तो यह मोड़ भी रहता नहीं खामोश है
है जारी भारी चहल-पहल
महलों का पहरा ठोस है.

पर कोई-ना कोई
यह किस्सा तो जोड़ देता है
हर दिन कोई इस मोड़ पर दम तोड़ देता है.

हर दिन कोई
इस मोड़ पर
दम तोड़ देता है.

मोड़ / राकेश रोहित 


Thursday, 11 October 2012

ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं - राकेश रोहित

कविता 

ज्ञान की तरह अपूर्ण नहीं 
- राकेश रोहित 

हर रोज नया कुछ सीखता हूँ मैं
हर दिन बढ़ता है कुछ ज्ञान
ओ ईश्वर! मैं क्या करूं इतने ज्ञान का
हर दिन कुछ और कठिन होता जाता है जीवन.

पत्तों की तरह सोख सकूँ
धूप, हवा और चाँदनी
फूल की तरह खिलूँ
रंगों की ऊर्जा से भरा.

पकूं एक दिन फल की तरह
गंध के संसार में
फैल जाऊं बीज की तरह
अनंत के विस्तार में.

हरियाली की तरह बिखरा रहूँ
सृष्टि के समवाय में
ना कि ज्ञान की तरह
अपूर्ण, असहाय मैं!

हरसिंगार / राकेश रोहित 

Saturday, 14 July 2012

मेरे अंदर एक गुस्सा है... / राकेश रोहित


मेरे अंदर एक गुस्सा है...
- राकेश रोहित

मेरे अंदर एक गुस्सा है,   गुस्से को दबाये बैठा हूँ
मैं जिस गम के दरिया में डूबा हूँ, उस गम को भुलाये बैठा हूँ.

लहरों ने साहिल पर तोड़ दिये, घरौंदे कितने बचपन के
इन लहरों से मैं सपने की उम्मीद लगाये बैठा हूँ.

दुनिया अनजानी हँसती थी - मंजिल का पता भी भूल गये?
वो क्या जाने मैं कागज की कश्ती बचपन से बनाये बैठा हूँ.

वो रात बड़ी अंधियारी थी, जब तुम आये मेरे घर में
तब से आंगन में सौ-सौ दीपक यादों के जलाये बैठा हूँ.

एक जंग जैसे है दुनिया, एक दिन जीता एक दिन हारा
कुछ मन में छुपाये बैठा हूँ, कुछ सब को बताए बैठा हूँ.


कुछ मन में छुपाये बैठा हूँकुछ सब को बताए बैठा हूँ / राकेश रोहित