Wednesday, 22 July 2015

पीले फूल और फुलचुही चिड़िया - राकेश रोहित

कविता
पीले फूल और फुलचुही चिड़िया
- राकेश रोहित

वो आँखें जो समय के पार देखती हैं
मैं उन आँखों में देखता हूँ।
उसमें बेशुमार फूल खिले हैं
पीले रंग के
और लंबी चोंच वाली एक फुलचुही चिड़िया
उड़ रही है बेफिक्र उन फूलों के बीच।

सपने की तरह सजे इस दृश्य में
कैनवस सा चमकता है रंग
और धूप की तरह खिले फूलों के बीच
संगीत की तरह गूंजती है
चिड़िया की उड़ान
पर उसमें नहीं दिखता कोई मनुष्य!
सृष्टि के पुनःसृजन की संभावना सा
दिखता है जो स्वप्न इस कठिन समय में
उसमें नहीं दिखता कोई मनुष्य!

दुनिया के सारे मनुष्य कहाँ गये
कोई नहीं बताता?
झपक जाती हैं थकी आँखें
और जो जानते हैं समय के पार का सच
वे खामोश हो जाते हैं इस सवाल पर।
सुना है
कभी- कभी वे उठकर रोते हैं आधी रात
और अंधेरे में दिवाल से सट कर बुदबुदाते हैं
हमें तो अब भी नहीं दिखता कोई मनुष्य
जब नन्हीं चिड़ियों के पास फूल नहीं है
और नहीं है फूलों के पास पीला रंग!

इसलिए धरती पर
जब भी मुझे दिखता है पीला फूल
मुझे दुनिया एक जादू की तरह लगती है।
इसलिए मैं चाहता हूँ
सपने देखने वाली आँखों में
दिखती रहे हमेशा फुलचुही चिड़िया
फूलों के बीच
ढेर सारे पीले फूलों के बीच।

पीले फूल और फुलचुही चिड़िया / राकेश रोहित

Friday, 10 July 2015

समय के बारे में एक कविता - राकेश रोहित

कविता
समय के बारे में एक कविता
- राकेश रोहित

किसी समय को जानने के कई तरीके हैं
उनमें से एक यह है कि आप जानें
कि कौन सो रहा है
और जाग कौन रहा है?

माँ जानती है जब सो रहा है बच्चा
तो चुपके से चूल्हे पर अदहन चढ़ा देने का
और बासी रोटी
नमक प्याज के साथ गिल लेने का समय है।

बाहर आवारा घूम रहा लड़का
जो फिर- फिर हार जाता है कर नौकरी का जुगाड़
जानता कब पिता के सोने का वक्त है
और कब माँ के जागने का
कि कब उसे प्रवेश करना है पिछले दरवाजे से
अपने ही घर में अनधिकृत
और चुपके से पूछना है
माँ कुछ खाने को है?
इस समय वह कभी माँ का चेहरा नहीं देखता
इस समय माँ कभी उसका चेहरा नहीं देखती
और चाह कर भी बता नहीं पाती
कि जाग रहे हैं पिता अब भी
कि यह पानी का गिलास उन्हीं के लिए है।

पिता को भी पता होता है
कि अब सो गया होगा उनका बेटा
खाकर माँ के हिस्से का भी खाना
जब उठ कर पीते हैं गिलास भर पानी
कहना नहीं भूलते
सो गई क्या?
सोचते हैं कल फिर साहब को कह कर देखें
कुछ तो जुगाड़ लगा दें इस नालायक का!

वैसे पिता को पता है
लाख जतन करें 
साहब को ठीक खबर हो जाती है उनके आने की
चाहे जो भी समय हो
दरबान यही कहता है साहब सो रहे हैं
बहुत दिनों से उनकी इच्छा हो रही है
कि एक दिन दरबान को गले लगाकर बोलें
क्या भाई इस ठेठ दुपहरिया
जब जाग रहे हैं चिरई चुनमुन
और खदक रहा चूल्हे पर अदहन
जब सूरज माथे पर चमक रहा है
तेरे साहब सो रहे हैं?

ऐसे समय जब भरी- दोपहरी सो जाते हैं लोग
लाखों लोग जाग कर इंतजार करते हैं
कि एक दिन सोये हुए लोग
उनके पक्ष में उनके भाग्य का फैसला लिखेंगे
और तब तक वे चिड़ियों को अपने सपनों की कथा कहें!

बच्चे को ठीक पता होता है
कि कब तक सोती रहेगी राजकुमारी
और कब होगा कहानी में राक्षसों का प्रवेश
हर बार नये उत्साह से वे
पुराने राजकुमारों के आगमन पर उल्लसित होते हैं
और हर बार नानी जान जाती है
कि कब बच्चे को नींद आ गयी है!
और एक दिन बच्चे की आँखों का सपना
नानी की आँख में आ जाता है
तब नानी गाने लगती है कोई अनसुना गीत
और कच्ची नींद से जाग कर माँ देखती रहती है
आँख भर नानी की आँख।
इस समय जानना कठिन होता है
कि माँ जाग रही है
या माँ के भीतर कोई छूट गया समय जाग रहा है?

तो दोस्तों,
यह समय जो सोने और जागने वालों से जाना जाता है
इसमें कुछ अद्भुत बातें होती हैं
जैसे सोने वालों के पास नींद नहीं होती
और जागने वालों के पास सपना होता है!

किसी समय को जानने के कई तरीके हैं
उनमें से एक यह है कि आप जानें
कि किसके पास सपने हैं
और सपने चुरा कौन रहा है?

चित्र / के. रवीन्द्र 

Thursday, 9 July 2015

कविता नहीं यह - राकेश रोहित

कविता 
कविता नहीं यह
- राकेश रोहित 

मेरे पास नहीं हैं उतनी कविताएँ 
जितने धरती पर अनदेखे अनजाने फूल हैं
आकाश में न गिने गये तारे हैं 
और हैं जीवन में अनगिन दुख!

लौट आता हूँ रोज मैं अपनी भाषा में
तलाशता हुए तुम्हें ऐ मेरी खोई हुई आत्मा
निहारता हूँ परिधान बदलते सच को
निरखता हूँ कैसा है उसका अनिर्वचनीय रूप!

उत्सव करते हैं सूखे फूल और जीर्ण पात
हर बार कहने से रह जाती है भीगे मन की बात
हमने हथेलियों पर बर्फ को पिघलते देखा है 
फिर कौन सदियों की जमी बर्फ के पार से पुकारता है
कि मैं सुनता हूँ उसको
उस तक मेरी आवाज नहीं पहुंचती!

इन अनगिन अनजानी आकाशगंगाओं में 
कोई सृष्टि हमारे स्पर्श की प्रतीक्षा में है 
और हमारी इस दुनिया में कोई सच
अभिव्यक्त होने की बेचैनी से भरा है।

हर पल खिलता कोई फूल
हर दिन जनमता कोई बच्चा
यही कहता है 
हर मौसम- बेमौसम में रंग की तरह खिलो
और भाषाहीन इस दुनिया में निश्शब्द न मिलो!

चित्र / के. रवीन्द्र 

Saturday, 4 July 2015

अँधेरी खिड़कियों के अंदर का अँधेरा - राकेश रोहित

पुस्तक समीक्षा / पहला उपन्यास

अँधेरी खिड़कियों के अंदर का अँधेरा
- राकेश रोहित

अनिरुद्ध उमट 

अनिरुद्ध उमट उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने अपने कथा शिल्प को लेकर एक खास पहचान बनायी है पर उनके पहले उपन्यास अँधेरी खिड़कियाँ को पढ़ने से ऐसा लगता है कि उनके रचनाकर्म की खासियत उसका शिल्प नहीं वरन वह अनछुआ कथा-क्षेत्र है जो उनकी रचनात्मकता की पहचान भी है और उसकी ताकत भी विवाह की दैविक अवधारणा को धवस्त कर स्त्री पुरूष को उनकी स्वतंत्र इयत्ता में देखने के अर्थों में यह उपन्यास बोल्ड नहीं है क्योंकि यह विवाह को एक सामाजिक संविदा की तरह स्वीकार करने के उपरांत, सपना और यथार्थ की द्वंद्वात्मकता की पड़ताल करता है

अँधेरी खिड़कियाँ में लेखक ने गोरी मेम का एक रूपक रचा है जो प्यार की दैहिक अभिव्यक्ति है यह एक ऐसा सपना है जो बुढिया और उसके पति दोनों को अपनी जकड़न में लिए है एक तरफ बुढिया का पति उसकी तरफ पीठ कर सोते हुए गोरी मेम की तस्वीर और उसके साथ स्वीमिंग पूल में नहाने का सपना देखते मर जाता है तो दूसरी तरफ बुढिया अपने बूढ़े कंठ में बिसरा दी गयी चहक से याद करती है कि उसकी माँ उसे गोरी मेम कहा करती थी और फिर अपने पति के मरने के बाद वही बुढिया सोचती है कि उसके पति दरअसल गोरी मेम को भी नहीं चाहते थे, वे जानते ही नहीं थे कि उनका चाहना क्या है? बुढिया अंत तक यकीन करना चाहती है कि मरने से एक दिन पहले उसके पति उससे छुपकर उसी की तस्वीर देख रहे थे क्योंकि उन्हें हर काम छुप-छुप कर करने की आदत थी इच्छाओं के भटकाव के बीच यह एक भोली आशा और प्यार को पाने की ललक ही है कि पति के पीठ कर सोने के बाद वह बुढिया भी एक करवट सोती रही ताकि कभी वे अपना चेहरा उसकी ओर करें तो उन्हें उसकी पीठ न मिले कंडीशनिंग की इस प्रक्रिया से बुढिया तभी मुक्त होती है जब उसका पुराना प्रेमी उसकी तलाश करता आता है जिसे वह अब भी गोरी मेम लगती है और इस तरह एक स्त्री के रूप में वह फिर रिड्यूस ही होती है जबकि उस प्रेमी की पत्नी यह पूछते-पूछते मरती है कि क्या सचमुच कोई गोरी मेम की तरह लगती है?

इस तरह समाज की अँधेरी खिड़कियों का जो अँधेरा है वह भयानक और अराजक है जहां एक बुढिया की अदम्य वासना और अतृप्त कामना के जरिए उन स्थितयों की पहचान की गई है जो इनकी कारक हैं और लेखक के मैं का भटकाव इसी सन्दर्भ में है बुढिया अपनी देह में इस तरह घिरी है कि अपने अस्तित्व की पहचान खो बैठी है और अपने भटकाव में इस तरह उलझी है कि वह लेखक से जानना चाहती है कि आधी रात के बाद उसके घर से जो रोने की आवाज आती है वह उसी की है या किसी और की? बुढिया के लिए यह अनस्तित्व से अस्तित्व की यात्रा है, और वह अपनी देह से तभी मुक्त होती है जब वह जान पाती है कि वह गोरी मेम नहीं है विवाह रूपी संस्था में पवित्रता और अराजकता के बीच के अवकाश में प्रेम और वासना के द्वंद्व और उससे जूझ रहे स्त्री-पुरूष की तड़प और खासकर स्त्री की अपनी पहचान की बेचैनी को यह उपन्यास बहुत निर्मम तरीके से सामने रखता है

उपन्यास की बुढिया का चरित्र स्मरणीय है और इन अर्थों में सम्पूर्ण कि अन्य  सारे पात्र उसी के चरित्र से अपनी ऊर्जा ग्रहण करते हैं कहानी कहीं-न-कहीं वह और वे में उलझ जाती है कथ्य की जरूरत से परे जाकर भी जटिलता के प्रति रूझान कई बार कथ्य के विस्तार को बाधित और उसकी संभावना को क्षरित करता है कुछ शब्दों के प्रति लेखक का मोह स्पष्ट झलकता है जैसे पूरे उपन्यास में रोना हे मुक्ति है के अर्थों में गला फाड़ने का प्रयोग सौ से भी अधिक बार हुआ है और यह पढ़ते वक्त बहत खटकता है कुल मिलाकर अँधेरी खिड़कियों के अंदर के अँधेरे की दास्तान को जानने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना चाहिए  



पुस्तक परिचय: 
उपन्यास/अनिरुद्ध उमट 
कवि प्रकाशन,
लखोटियों का चौक 
बीकानेर - 334 005
प्रथम संस्करण: 1998
मूल्य: 90 रूपये 

Friday, 19 June 2015

एक कविता पेड़ के लिए - राकेश रोहित

कविता
एक कविता पेड़ के लिए
- राकेश रोहित

वह छोटे पत्तों और बड़ी छायाओं वाला पेड़ था
जिसकी छांव में ठहरी थी चंचल हवा
और वहीं टहनियों में फंसी
एक पतंग डोल रही थी!
शायद उतारने की कोशिश में फट गया था
पतंग का किनारा
उलझ गये थे धागे
यद्यपि वहां कोई न था
पर किसी बच्चे की हसरत वहीं शायद
पतंग के गिरने के इंतजार में खड़ी थी
और इन सबसे बेपरवाह था पेड़
मुझे लगा शायद बहुत अकेला है यह पेड़।
पेड़ अकेले क्यों पड़ जाते हैं
और कब दूर होता है उनका अकेलापन?

एक दिन फूलों से भर जाता है पेड़
एक दिन गंध से भर जाती है हवा
एक दिन वर्षा आकर करती है श्रृंगार
एक दिन पके फल का आमंत्रण दे
शर्म से दोहरी हो जाती है टहनियां
एक दिन चिड़िया आकर गाती है कानों में
प्रेमोत्सव का गीत।

जब नर्तन करते हैं पत्ते
और गाती है उन्मत्त हवा पेड़ों की डाली के संग
क्या तब अकेले नहीं होते हैं पेड़
और बस यूं ही ठिठके रहते हैं उदास अपनी जड़ों में
तुम्हारे इंतजार में?

आप पूछ कर देखिए कोई दावे से यह नहीं कहेगा
कि पेड़ तब अकेले नहीं होते हैं
जब वे झूम रहे होते हैं हमारे संग
और जब हमारी शरारतों पर
सहलाते हैं झरते पत्ते हमारी पीठ
कोई आकर खामोश तने पर जब लिखता है एक नाम
और पढ़कर खिलखिलाती हैं कुछ लडकियाँ अनाम!

माँ, कब दूर होता है पेड़ों का अकेलापन
जब उसमें सिमट जाती है तुम्हारी याद
या जब उसके नीचे मैं रोता हूँ तुम्हारी याद में?
यह एक ऐसा सवाल था
जिसके जवाब के इंतजार में मैं भटकता रहा
और मुझे बेचैन करते रहे अकेले पड़ते पेड़।


और एक दिन!
एक दिन जब सारे कछुए जीतकर
समंदर में वापस चले गए
मुझसे अचानक भागते हुए एक खरगोश ने कहा
पेड़ तब अकेले नहीं होते जब उनसे
शुरू होता है कोई गाँव
और जब वहाँ बैठकर कोई सुस्ताता है
पीछे छूट गये संगी के इंतजार में।


हर पेड़ एक कविता है / राकेश रोहित 

Thursday, 4 June 2015

सुबह होने से कुछ क्षण पहले की कविता - राकेश रोहित

कविता
सुबह होने से कुछ क्षण पहले की कविता
- राकेश रोहित

उनका अपनी बातों पर जोर है
इतना जोर दे कर कहते हैं
वे अपनी बातों की बात
कि एक दिन अपना ही दुख छोटा लगने लगता है
सस्ती लगने लगती है अपनी ही जान!

अपने मन की ही आवाज को
छुपा लेने की इच्छा होने लगती है
अपना ही जिया हुआ जीवन का पाठ
झूठ लगने लगता है।

...और यह जो बूँद- बूँद
बचाता आया हूँ मैं अपनी घृणा
यह जो समेट कर अपना लाचार दुख
मैं खड़ा हुआ हूँ बमुश्किल
आपके सम्मुख
इसका कोई मतलब नहीं है
क्योंकि आपकी बुद्धिमत्ता
तर्क से ऐसा ही मानती है!

छोड़िये, कुछ नयी बात कीजिए
आपके सिखाये थोड़े ही धड़कती है मेरी सांसें
हम तो जिद के मारे हैं
जो सहते हैं, वो कहते हैं!



चित्र / के. रवीन्द्र

Monday, 1 June 2015

घास हरी नहीं है - राकेश रोहित

कविता
घास हरी नहीं है
- राकेश रोहित

घास हरी नहीं है
उसने कहा।
अगली बार उसने जोर दे कर कहा 
घास हरी नहीं है
वस्तुतः यह पीली हो चुकी है।

यह सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं है
यह हमारे सौन्दर्य बोध से भी जुड़ा है
कि हरी होनी चाहिए घास,
उसने फिर कहा
फिर- फिर कहा!

मैंने एक दिन उसे समझाना चाहा
हाँ पीली पड़ गयी है घास 
और पीले पड़ गये हैं फूल भी
इतनी गर्म है हवा 
कि कुम्हला गये हैं पत्ते 
यह बहुत कठिन दिन है 
उनके लिए जो छांव में नहीं हैं।
हाँ, उसने संयत स्वर में कहा इस बार- 
और यह भी देखिए कि घास भी हरी नहीं है!

हे भाई! 
मैंने उसका कंधा पकड़ झकझोरा 
यह घास हर बार 
आपकी दाढ़ी से तिनके की तरह क्यों अटक जाता है?
बस घास है कि आप हैं
हाँ हरी नहीं है घास
पर यह भी तो देखिए कि खतरे में है हरापन
कि तितलियों के घर उजड़ रहे हैं
कि ओस के अटकने की कोई ओट नहीं बची!
आप हर बार एक ही बात क्यों कहते हैं
कि घास हरी नहीं है?

इस बार मेरी चौंकने की बारी थी
वह फुसफुसा रहा था 
जैसे भय से भरा था,
मैं कहता हूँ कि घास हरी नहीं है
क्योंकि मैं कहना चाहता हूँ 
कि पानी नहीं रहा!
पर आपको क्या लगता है 
मैं जिस स्वर से घास के बारे में कह सकता हूँ
क्या उसी स्वर में सवाल कर सकता हूँ 
कि पानी नहीं रहा? 
कि क्यों पानी नहीं रहा?

आपको क्या लगता है?
क्यों यह घास हरी नहीं है?

चित्र / के. रवीन्द्र 

Saturday, 2 May 2015

चिड़िया की आँख - राकेश रोहित

कविता
चिड़िया की आँख
- राकेश रोहित

शर संधान को तत्पर
व्यग्र हो रहे हैं धनुर्धर
वे देख रहे हैं केवल चिड़िया की आँख!

यह कैसा कलरव है
यह कैसा कोलाहल है?
जो गुरूओं को सुनाई नहीं देता
अविचल आसन में बैठे वे
नहीं दिखाई देता उनको
चिड़िया की आँखों का भय।

यह धनुर्धरों के दीक्षांत का समय है
राजाज्ञा के दर्प से तने हैं धनुष
और दूर दीर्घाओं मे करते हैं कवि पुकार-
राजन चिड़िया की आँख से पहले
चिड़िया दिखाई देती है
और चिड़िया से पहले उसका घोसला
जहाँ बसा है उनका कलरव करता संसार।
राजन इन सबसे पहले दिखाई देता है
यह सामने खड़ा हरा- भरा पेड़
जो अनगिन बारिशों में भींग कर बड़ा हुआ है
और उससे पहले वह बीज
जो किसी चिड़िया की चोंच से यहीं गिरा था
उन बारिशों में।

वह पेड़ दिखाई नहीं देता धनुर्धरों को
जिस पेड़ के नीचे सभा सजी है
पर पेड़ को दिखाई देता है
चिड़िया की आँखों का सपना
जिस सपने में है वह पेड़
चिडियों के कलरव से भरा।

शांत हैं सभी कोई बोलता नहीं
श्रेष्ठता तय होनी है आज और अभी।
कोई खतरे की बात नहीं है
पेड़ रहेंगे, चिड़िया रहेगी
वे बेधेंगे केवल चिड़िया की आँख!

तैयार हैं धनुर्धर
नजर उनकी है एकटक लक्ष्य पर
देख रहे हैं भरी सभा में
वे केवल चिड़िया की आँख!
उन्हें खबर नहीं है
इसी बीच
उनके कंधे पर
आकर वह चिड़िया बैठ गयी है
देख रहे थे सब केवल जिस चिड़िया की आँख!

चित्र / के. रवीन्द्र 

Wednesday, 22 April 2015

लौटने की जगह - राकेश रोहित

कविता
लौटने की जगह
- राकेश रोहित 

जीवन के कुछ बारीक सत्य
हमारे अंदर ही छुपे हुए हमारे दुख थे
जिन्हें हम धूप दिखाने से डरते रहे
और प्रार्थना में रूंधता रहा हमारा गला।

एक दिन सुंदर नृत्य की समाप्ति पर
तालियाँ बजाते हुए हम रो पड़े
कैसे नचाती रही जिंदगी
और दर्शनातुर लोग देखते रहे यह खेल!

जब लौटने की इच्छा बेधती है हृदय
नहीं बची है लौटने की जगह
कितनी प्रार्थनाओं में पृथ्वी
चाहा था मैंने तुम्हें
अपने पैरों के ठीक नीचे
किसी पुरातन भरोसे की तरह!

कैसे हम अंधेरे में गुम हुई इच्छाएं हैं!
और कैसे चाह का चँवर
डुलता है किसी के सर पर?
कैसे इस अपरिमित जगत में
जीवन पूछता है
मेरी जगह कहाँ है?

निराशा के कैनवस सा
टंगा हुआ है जो यह दृश्य
मैं इसपर नित- रोज निरंतर
टांकता हूँ शब्द का फूल
और फिर उसे कविता की तरह खिलते देखता हूँ।

हजार उदास रातों में समेटता रहता हूँ
कविता में अपना बिखरना
हर सुबह उठकर उसे मैं
आत्मा की तरह चूमता हूँ
और हो जाता हूँ अनंग
घुलता हुआ इस जीवन में।

चित्र / के. रवीन्द्र 

Wednesday, 1 April 2015

उदास लड़की, चन्द्रमा और गाने वाली चिड़िया - राकेश रोहित

कविता
उदास लड़की, चन्द्रमा और गाने वाली चिड़िया
- राकेश रोहित 


एक दिन चन्द्रमा ने लड़की से पूछा
चित्र / के. रवीन्द्र 
एक दिन चन्द्रमा ने लड़की से पूछा- 
इजाजत दो
तो तुम्हारी आँखों में छुप जाऊँ!
लड़की मुस्कुरायी और गहरा हो गया
उसकी आँखों का रंग
और उसकी मुस्कराहटों
में बरसने लगी चाँदनी।


अकेली लड़की धरती पर सवार
करती थी आकाशगंगा की सैर
और देखती थी आकाश
जहाँ चाँद की जगह थी पर चाँद नहीं था
और हजार तारे टिमटिमाते थे
सारी - सारी रात!


वह चंचल बहती रही / वह अल्हड़ बहती रही
चित्र / के. रवीन्द्र 
वह नदी की तरह बहती रही                
और सोना बिखरता रहा झील पर
वह चंचल बहती रही
वह अल्हड़ बहती रही।

अब वह खूब भागती थी
खूब बातें करती थी
और बात - बात पर खिलखिलाती थी
पहाड़ से उतरते झरने की तरह।

पर होठों की हँसी छुपा नहीं पाती थी
आँखों का पुराना दुख
और बारिश के बाद बहती हवा की तरह
भींग जाती थी उसकी आवाज
जब वह गा रही होती थी
कोई विस्मृत होता गीत!


एक दिन अनाम फूलों के बीच गुजरते हुए
उसने अचानक
एक बच्चे को जोर से चिपटा लिया
और रोने लगी
जैसे टूटती है बांध में बंधी नदी
सारी रात की खामोश बारिशों के बाद।

इसके बाद जो हुआ वह जादू की तरह था
बच्चे ने, जिसे नहीं आती थी भाषा
अपनी नन्हीं हथेली उसके गाल पर टिकाकर
साफ शब्दों में पूछा तुम रो क्यों रही हो?
यह बात वहाँ से गुजरती चिड़िया ने सुना
और गाने लगी उदासी का गीत!

अब भी किसी चाँदनी रात को
चाँद पर चिड़िया की छाया साफ दिखाई देती है
और चाँद जब छुप जाता है
पृथ्वी की कक्षा से दूर
चिड़िया की आवाज से टूट जाती है
उदास लड़की की नींद!

उदास लड़की और गाने वाली चिड़िया
चित्र / के. रवीन्द्र 

Tuesday, 10 March 2015

एक प्रार्थना, एक भय - राकेश रोहित

कविता
एक प्रार्थना, एक भय
- राकेश रोहित

कवियों में बची रहे थोड़ी सी लज्जा"* - 
मंगलेश डबराल की कविता पढ़ते हुए
पहले प्रार्थना की तरह दुहराता हूँ इसे
फिर डर की तरह गुनता हूँ।

डर कि ऐसे समय में रहता हूँ
जहाँ प्रार्थना करनी होती है
कवियों में मनुष्य के बचे होने की
हे प्रभु क्या बची रहेगी कवियों में थोड़ी सी लज्जा!
क्या साथ देंगी प्रलय प्रवाह में वे नावें
जिन पर हम सवार हैं?

इन बेचैन रातों में अक्सर होता है
जब मन तितली में बदल जाता है
और गुपचुप प्रार्थना करता है
कि वे जो खेल रहे हैं शब्दों से गेंद की तरह
खिलने दें उन्हें फूलों की तरह!

मैं चाहता हूँ संभव हो ऐसा समय
जिसमें यह इच्छा अपराध की तरह न लगे
कि मनुष्यों में बची रहे हजार कविता
और कविता में बचा रहे हजार मनुष्य!
                                  ooo

(* "कवियों में बची रहे थोड़ी सी लज्जा" - मंगलेश डबराल
यह पंक्ति मंगलेश डबराल जी की इसी शीर्षक कविता की अंतिम पंक्ति है और उनसे साभार) 

चित्र / के. रवीन्द्र 

Saturday, 28 February 2015

जिजीविषा - राकेश रोहित

कविता
जिजीविषा
- राकेश रोहित

डूबने वाले जैसे तिनका बचाते हैं
मैं अपने अंदर एक इच्छा बचाता हूँ।

कहने वालों ने नहीं बताया
नूह की नाव को
यही इच्छा
खे रही थी
प्रलय प्रवाह में!
संसार की सबसे सुंदर कविताएँ
और बच्चे की सबसे मासूम हँसी
इसी इच्छा के पक्ष में खड़ी होती हैं।

आप कभी गेंद देखें
और पास खड़ा देखें छोटे बच्चे को
आप जान जायेंगे इच्छा कहाँ है!

जिजीविषा / राकेश रोहित

Tuesday, 4 November 2014

एक सपना, एक जीवन - राकेश रोहित

कविता
एक सपना, एक जीवन 
- राकेश रोहित 

आदम हव्वा के बच्चे
सीमाहीन धरती पर कैसे निर्बाध भागते होंगे
पृथ्वी को पैरों में चिपकाये
कैसे आकाश की छतरी उठाये
ब्रह्मांड की सैर करता होगा उनका मन?

वो फूल नहीं उनकी किलकारियाँ हैं
जिनको हरियाली ने समेट रखा है अपने आँचल में
उनके लिखे खत
तितलियों की तरह हवा में उड़ रहे हैं!
वे जागते हैं तो
चिडियों के कलरव से भर जाता है आकाश
उषा का रंग लाल हो जाता है
हवा भी उनको इस नाजुकी से छूती है
कि सूर्य का ताप कम हो जाता है।

सो जाते हैं वही बच्चे तो
प्रकृति भी अंधेरे में डूबी
चुप सो जाती है।

एक मन मेरा
रोज रात उनके साथ दौड़ता है
एक मन मेरा
रोज जैसे पिंजरे में जागता है!
क्या किसी ने शीशे का टूटना देखा है
क्या किसी ने शीशे के टूटने की आवाज सुनी है?
किरचों की संभाल का इतिहास
ही क्या सभ्यता का विकास है!

हमारे हाथों में लहू है
हमारे हाथों में कांच
हमारे अंदर एक टूटा हुआ दिन है
हमारे हाथों में एक अधूरा आज!
मैं जिंदगी से भाग कर सपने में जाता हूँ
मैं सपने की तलाश में जिंदगी में आता हूँ।
मेरे अंदर एक हिस्सा है
जो उस सपने को याद कर निरंतर रोता है
मेरे अंदर एक हिस्सा है
जो इससे बेखबर सोता है।


जिसने एक छतरी के नीचे
इतने फूलों को समेट रखा है
मैं बार- बार उसके पास जाता हूँ
उसे मेरे सपने का पता है।
मैं लौट आता हूँ अपने निर्वासन से
आपके पास
आपकी आवाज भी सुनी थी मैंने
आपका भी उस सपने से कोई वास्ता है।

चित्र / के. रवीन्द्र 

Thursday, 9 October 2014

गजब कि अब भी, इसी समय में - राकेश रोहित

कविता
गजब कि अब भी, इसी समय में 
- राकेश रोहित

गजब कि ऐसे समय में रहता हूँ
कि खबर नहीं है उनको
इसी देह में मेरी आत्मा वास करती है।

गेंद की तरह उछलती है मेरी देह
और मन मरियल सीटी की तरह बजता है
हमारी भाषा के सारे विस्मय में नहीं
समाता उनकी क्रीड़ा का कौतुक!
गजब कि इस समय में मुग्धता
नींद का पर्याय है। 
गजब कि आत्मा से परे भी
बचा रहता है देहों का जीवन!

रोज मेरी देह आत्मा को छोड़ कर कहाँ जाती है
रोज क्यों एक संशय मेरे साथ रहता है
रोज दर्शन का एक सवाल उठता है मेरे मन में
आत्मा मुझमें लौटती है
या मैं आत्मा में लौटता हूँ!

क्या हमारा अस्तित्व
धुंधलके में खामोश खड़े
पेड़ों की तरह है
लोग तस्वीर की तरह देखने की कोशिश करते हैं हमें
और मैं अपने अंदर समाये
हजार स्वप्न और असंख्य साँसों के साथ
नेपथ्य में खड़ा
आपके विजय रथ के गुजरने का इंतजार करता हूँ?

कैसे हारे हुए सैनिकों की तरह लौट गयी है इच्छायें,
कैसे उदासियों के पर्चे फड़फड़ा रहे हैं?
कैसे अनगिन तारों के बीच
निस्तब्ध सोयी है पृथ्वी,
कैसे कोई जागता नहीं है
कि सुबह हो जायेगी?

गजब कि ऐसे समय में, अब भी,
तुम्हारे हाथों में मेरा हाथ है
गजब कि अब भी,
इसी समय में,
कोई कहता है
कोई सुनता है!

चित्र / के. रवीन्द्र

Monday, 1 September 2014

ऐसे तो मैं - राकेश रोहित

कविता
ऐसे तो मैं
 - राकेश रोहित

ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ                  
जैसे अचानक भूल गया हूँ तुम्हारा नाम
जैसे याद करना है उसे अभी- के-अभी
पर जैसे छूट रहा है जीभ की पहुँच से
दांत में दबा कोई रेशा
जैसे पानी में डूब- उतरा रही है
किसी बच्चे की गेंद
जैसे सामने खड़ी तुम हँस रही हो
पर नहीं देख रही हो मुझे
कि जैसे तुम्हें पुकारना
है दुनिया का सबसे जरूरी काम!

ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ
जैसे तितलियों के साथ नाच रहे हैं
नंग- धड़ंग बच्चे
और फूल खिलखिलाकर हँस रहे हैं
कि जैसे रंग हवा पर सवार हैं
और मन में कोई मिठास जगी है
कि जैसे वक्त की खुशी
इतनी आदिम पहले कभी नहीं हुई
कि जैसे इससे पहले कभी नहीं लगा
कि कुछ कहने- सुनने से बेहतर है
प्यार किया जाए!

ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ
कि इस बार लिखना है मन के पोर- पोर का दर्द
कि जैसे यह समय फिर नहीं आयेगा
कि जैसे न कह दूं तो कम हो जायेगी
किसी तारे की रोशनी
कि जैसे पृथ्वी ठहर कर मेरी बात सुनती है
कि जैसे बात मेरी खामोशियों से भी बयां हो रही है
कि जैसे जान गये हैं सब यूं ही
क्या है कहने की बात
कि जैसे अब दुविधा मन में नहीं है
कि जैसे कहना है कि अब कहना है!

ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ

चित्र / के. रवीन्द्र 

Monday, 11 August 2014

इच्छा, आकाश के आँगन में - राकेश रोहित

कविता 
इच्छा, आकाश के आँगन में
- राकेश रोहित

इच्छा भी थक जाती है
मेरे अंदर रहते- रहते
यह मन तो लगातार भटकता रहता है
आत्मा भी टहल आती है
कभी- कभार बाहर
जब मैं सोया रहता हूँ।

यह बिखराव का समय है
मैं अपने ही भीतर किसी को आवाज देता हूँ
और अपने ही अकेलेपन से डर जाता हूँ।
यह समय ऐसा क्यों लगता है
कि काली अंधेरी सड़क पर
एक बच्चा अकेला खड़ा है?

लोरियों में साहस भरने से
कम नहीं होता बच्चे का भय
खिड़कियां बंद हों तो सारी सडकें जंगल की तरह लगती हैं।
इच्छा ने ही कभी जन्म लिया था मनुष्य की तरह
इच्छाओं ने मनुष्य को अकेला कर दिया है
आत्मा रोज छूती है मेरे भय को
मैं आत्मा को छू नहीं पाता हूँ।

मैं पत्तों के रंग देखना चाहता हूँ
मैं फूलों के शब्द चुनना चाहता हूँ
संशय की खिड़कियां खोल कर देखो मित्र
उजाले के इंतजार में मैं आकाश के आँगन में हूँ।

चित्र / के.  रवीन्द्र