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Saturday, 2 January 2016

वृक्ष के सपने में उड़ान है - राकेश रोहित

कविता
वृक्ष के सपने में उड़ान है
- राकेश रोहित

वह इतनी अकेली थी सफर में
कि वृक्ष के नीचे खड़ी हो गयी
वृक्ष ने उसे देखा और हरा हो गया!

उसके मन में दुख था
सो झरे कुछ पत्ते
और दुख से पीले पड़ गये!

कहना था उसको
सो गाने लगा पेड़
और घर लौटीं चिड़ियाएं संग संगीत लेकर!

वह रो रही थी
तो वृक्ष ने डाल दी चादर अंधेरे की
जड़ों में भरते रहे उसके आंसू और वह वृक्ष हो गयी!

सुंदर सुबहों में वह हँसती चिड़ियाओं के साथ उठी
उसने विस्तृत नभ में फैलाए अपने हाथ
पर निश्चल जड़ों ने रोक लिया उसे!

वह अब वृक्ष थी
वह सफर का सपना देखती थी
और तेज हवाओं संग उड़ जाना चाहती थी!

वृक्ष के सपने में उड़ान है / राकेश रोहित