Tuesday, 10 November 2015

सुमन प्रसून - राकेश रोहित

कविता
सुमन प्रसून
- राकेश रोहित

सुमन प्रसून को
क्या सिर्फ कविताओं से जाना जा सकता है
जिसके नीचे लिखा होता है उसका नाम
या कविता पाठ के समय
उसकी उन आँखों को भी पढ़ना होगा
जो ऐसे डबडबाई रहती हैं
जैसे दो छिपली भर जल हो
और उनमें डूब रहा हो चाँद
उदास!

सुमन प्रसून क्या तुम सुनती हो
कभी अपनी ही आवाज?
जहाँ तुम्हारे खुशरंग शब्द भी
अपनी उदासी छुपा नहीं पाते
और ऐसे थरथराते हैं
जैसे बंसवारी में सीटी बजाती गुजर गयी हो हवा
किसी एकांत शाम में किसी अधूरे गीत की तरह
जैसे एक स्वर धीरे- धीरे मन के अंदर फैल गया है
और हम अपने अंदर ही
कोई बंद पड़ी किताब पढ़ रहे हैं!

एक दिन जब दुख का रंग थोड़ा अधिक हरा था
और पृथ्वी गुन रही थी कोई धुन अपने मन में
हवा वीराने में बेसबब भटक रही थी
और एक बेचैन पुकार के बाद भी
गूंजती रह जाती थी अनाम चिड़िया की आवाज
मैने उसे देखा प्राथमिक रंगों से रंगे दृश्य की तरह
ठीक अपने पास के समय से गुजर जाते हुए
क्या वह सुमन प्रसून थी?
क्या उसे पुकार कर उसे जाना जा सकता है?

चित्र / के. रवीन्द्र

4 comments:

  1. एक दिन जब दुख का रंग थोड़ा अधिक हरा था और पृथ्वी गुन रही थी कोई धुन अपने मन में हवा वीराने में बेसबब भटक रही थी और एक बेचैन पुकार के बाद भी गूंजती रह जाती थी अनाम चिड़िया की आवाज मैने उसे देखा प्राथमिक रंगों से रंगे दृश्य की तरह ठीक अपने पास के समय से गुजर जाते हुए क्या वह सुमन प्रसून थी? क्या उसे पुकार कर उसे जाना जा सकता है?
    ...बहुत सुन्दर ....

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  2. प्रभावशाली रचना......बहुत बहुत बधाई.....

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  3. समस्या यह है कि कई हैं , कोई समाधान नहीं है

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