Friday, 7 February 2014

हमारे ही बीच का होगा वह, जो सच कहेगा - राकेश रोहित

कविता 
हमारे ही बीच का होगा वह, जो सच कहेगा 
- राकेश रोहित

हमारे ही बीच का होगा वह
जो सच कहेगा
हमारे ही भीतर से आएगा!

देवताओं सी चमक
नहीं होगी उसके चेहरे पर
नहीं होगा,
वह उम्मीद की गाथाओं का रचयिता!
हो सकता है
इंद्रधनुषों की बात करते वक्त भी
उसकी आँखों से
झांक रही हो
रात की थोड़ी बची भूख
और कहीं उसके गहरे अंदर
छूट रही हो
एक नामालूम रुलाई!

एक सामान्य सी सुबह होगी वह
और रोज की तरह का दिन
जब रोज के कामों से
थोड़ा वक्त निकाल कर
जैसे सुस्ताता है कोई पथिक
वह हमसे- आपसे मुखातिब होकर
सरे राह सच कहेगा!

ऐतिहासिक नहीं होगा वह दिन
जब सूरज की तरह
चमकेगा सच
और साफ झलकेगा
भूरी टहनियों पर
हरे पत्तों का साहस।

भूरी टहनियों पर हरे पत्तों का साहस / राकेश रोहित 

1 comment:

  1. बहुत अच्छी कविता है।

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