Thursday, 4 June 2015

सुबह होने से कुछ क्षण पहले की कविता - राकेश रोहित

कविता
सुबह होने से कुछ क्षण पहले की कविता
- राकेश रोहित

उनका अपनी बातों पर जोर है
इतना जोर दे कर कहते हैं
वे अपनी बातों की बात
कि एक दिन अपना ही दुख छोटा लगने लगता है
सस्ती लगने लगती है अपनी ही जान!

अपने मन की ही आवाज को
छुपा लेने की इच्छा होने लगती है
अपना ही जिया हुआ जीवन का पाठ
झूठ लगने लगता है।

...और यह जो बूँद- बूँद
बचाता आया हूँ मैं अपनी घृणा
यह जो समेट कर अपना लाचार दुख
मैं खड़ा हुआ हूँ बमुश्किल
आपके सम्मुख
इसका कोई मतलब नहीं है
क्योंकि आपकी बुद्धिमत्ता
तर्क से ऐसा ही मानती है!

छोड़िये, कुछ नयी बात कीजिए
आपके सिखाये थोड़े ही धड़कती है मेरी सांसें
हम तो जिद के मारे हैं
जो सहते हैं, वो कहते हैं!



चित्र / के. रवीन्द्र

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (06-06-2015) को "विश्व पर्यावरण दिवस" (चर्चा अंक-1998) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    विश्व पर्यावरण दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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